
हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) की ख़ाना तलाशी
मुवर्रेख़ीन का बयान है कि 243 हिजरी में हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) सामरा पहुंच कर नज़र बन्द हो गए , लेकिन आपने इस हालत में भी फ़रीज़ाए इमामत अदा करने में ज़रा भी पसो पेश नहीं फ़रमाया और फ़रीज़ाए मन्सबी तबलीग़े दीने इस्लाम बराबर फ़रमाते रहे चूंकि आप फ़रज़न्दे रसूल स. और आलिमें अहले ज़माना थे इस लिए आपका विक़ार लोगों की निगाहों में रोज़ बरोज़ बढ़ता गया। आप लोगों को उसूले इस्लाम और इबादत की तालीम फ़रमाया करते थे और ख़ुद भी शबो रोज़ इबादत गुज़ारी में मशग़ूल रहा करते थे। आप यह तहय्या किए हुए थे कि उमूरे सलतनत में कोई दख़ल किसी तरह से न देंगे और अपने को हर वक़्त मशग़ूले हक़ रखेगें और यही कुछ रहे लेकिन दुनिया वाले कब किसी अल्लाह वाले को चैन लेने देते हैं। वह लोग यह भी बर्दाश्त न कर सके कि इमाम इज़्ज़त व विक़ार और सुकून व इतमिनाने ज़ाहेरी की जि़न्दगी बसर करें। बिल आखि़र ज़ालिम मुतावक्किल से चुग़ली ख़ाना शुरू कर दिया और इसे इस दर्जा भड़काया कि वह आपकी हैसीयत से क़ता नज़र कर के आपकी ख़ाना तलाशी पर आमादा हो गया। अल्लामा इब्ने ख़लक़ान लिखते हैं कि बाज़ लोगों ने मुतावक्किल से चुग़ली की कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के घर मे हतियार और ख़ुतूत वग़ैरा इनके शियों के भेजे हुए जमा हैं। नीज़ मुतावक्किल को यह भी वहम दिलाया गया कि हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) अपने लिए अमरे खि़लाफ़त के तालिब हैं। मुतावक्किल ने चन्द सिपाही मुक़र्रर किये कि रात को उन्हें गिरफ़्तार कर लाएं। सिपाहीयों ने अचानक हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के घर में पहुंच कर देखा कि वह बालों का कुर्ता पहने सौफ़ की चादर ओढ़े तन्हा अपने हुजरे में रेग और संग रेज़ों के फ़र्श पर रू बा कि़ब्ला बैठे हुए आहिस्ता आहिस्ता क़ुरान मजीद की तिलावत कर रहे हैं। सिपाहीयां ने उन्हें इसी हालत में ले जा कर मुतावक्किल के सामने पेश किया। मुतावक्किल उस वक़्त शराब लिए हुए मै नोशी कर रहा था। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को देख कर इसने ताज़ीम की और उनको अपने पहलू मे बैठा लिया। सिपाहीयों ने बयान किया कि इनके घर में कोई शै अज़ कि़स्म कुतुब वग़ैरा नहीं मिली और न कोई ऐसी बात पाई गई जिससे इन पर शक व इल्ज़ाम क़ायम हो , यह सुन कर मुतावक्किल ने वह जाम शराब जो इसके हाथों में था हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) जानिब बढ़ाया। उन्होंने फ़रमाया मेरा गोश्त व ख़ून कभी शराब से आलूदा नहीं हुआ। मुझे इससे माफ़ रख। मुतावक्किल ने कहा कि अगर शराब न पियो तो कुछ अश्आर पढ़ूं। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने फ़रमाया कि मुझे अश्आर से कम दिलचस्पी है। मुतावक्किल न माना कि ज़रूर कुछ पढ़ो। इमाम नक़ी (अ.स.) ने मजबूर हो कर चन्द शेर इरशाद फ़रमाये , जिनका हासिले मक़सद यह है कि जिन लोगों ने अपनी हिफ़ाज़त की ग़रज़ से पहाड़ों की चोटियों पर सुकूत इख़्तेयार की इनको भी मौत ने न छोड़ा और इज़्ज़त की बुलन्दी से ख़ाके जि़ल्लत पर गिर कर कशां कशां क़ब्रों पर पहुंचा दिया , बाद अज़ां इनको हातिफ़ ने आवाज़ दी के ऐ ! क़ब्र वालों कहां गऐ तुम्हारे तख्त ताज और कहां हैं तुम्हारे लिबासे नफ़ीस और क्या हुए वह नाज़ परवर्दा वह चेहरे जिनके लिए ख़ेमें सरा पर्दे नसब किए जाते थे। इस वक़्त क़ब्र ने इनकी जानिब से जवाब दिया कि दुनिया में वह मुद्दत तक खाते पीते रहे आखि़र कार खुद लुक़्माए हशरातुल अर्ज़ हो गये और अब इन पर कीड़े रेंग रहे हैं। अल्लामाऐ मआसिर मौलाना सैय्यद अली नक़ी साहब कि़ब्ला ने हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) के अश्आर का तरजुमा इस नज़म में फ़रमाया है।
रहे पहाड़ों की चोटी पर पहरे बिठला कर
बहादुरों की हरासत में बच न सके मगर
बुलन्द कि़लों की इज़्ज़त जो पस्त होके रही
तो कुन्ज क़ब्र में मन्जि़ल भी क्या बुरी पाई
सदा ये उनको दी हातिफ़ ने बादे दफ़ने लहद
कहां हैं वह तख्त व ताज और वह लिबासे जस्द
कहां वह चेहरे हैं जो थे हमेशा ज़ेरे नक़ाब
ग़ुबार जिन पे कभी आने देते थे न हिजाब
ज़बाने हाल से बोले जवाब में मदफ़न
वह रूख़ ज़मीन के कीड़ों का बन गए मसकन
ग़ेजा़एं खाईं शराबें जो पी थीं हद से सिवा
नतीजा इसका है खुद आज बन गए वह गि़ज़ा।।
जब हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने यह अशआर पढ़े तो मुतावक्किल और हाज़ेरीन पर कमाले रिक़्क़त तारी हुई और मुतावक्किल इस क़दर रोया कि इसकी दाढ़ी आंसूओं से तर हो गई। बाद इसने हुक्म दिया कि शराब उठा ली जाए और हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) को उनके घर पहुंचा दिया जाए।
अल्लामा शिबलन्जी ने इन अश्आर के चार इब्तेदाई अश्आर सैफ़ बिन ज़ीयज़ हमीरी के क़स्त्र पर लिखे हुए देखे गए हैं। कंज़ुल फ़वाएद कन्ज़ुल मदफ़ून में है कि मुतावक्किल रोते , रोते अपने हाथ से जाम ज़मीन पर फेंक देता था।
हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) और शेरे क़ालीन
मुल्ला जामी लिखते हैं कि एक दिन मुतावक्किल के पास एक मशहूर हिन्दी शोबदे बाज़ आया और उसने बहुत से करतब दिखालाए। मुतावक्किल ने उससे कहा मेरे दरबार में एक निहायत शरीफ़ शख़्स अनक़रीब आने वाला है अगर तू अपने करतब से उसे शर्मिन्दा कर दे तो मैं तुझे एक हज़ार अशरफ़ी इनाम दूगां। उसने कहा ऐ बादशाह ज बवह आजाए तो खाने का बन्दोबस्त कर और मुझे पहलू में बिठा दे मैं ऐसा करूंगा कि सख्त शर्मिन्दा होगा। यह सुन कर मुतावक्किल ख़ुश हो गया और जब आप तशरीफ़ लाए तो खाना लाया गया और सब खाने के लिये बैठे। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) ने ज्यों ही लुक़मा उठाया और तनावुल फ़रमाना चाहा उसने जादू के ज़ोर से उड़ाना दिया। इसी तरह उसने तीन मरतबा ऐसा किया , आखि़र यह सारा मजमा हंस पड़ा। हज़रत इमाम अली नक़ी (अ.स.) यह देख कर उस क़ालीन की तरफ़ मुतावज्जा हुए जो दीवार में लगा हुआ था और उस पर शेर की तस्वीर बनी हुई थी। आपने शेरे क़ालीन को हुक्म दिया कि मुज्जसम हो कर इस काफि़रे अज़ली को निगल ले। शेर मुज्जसम हुआ और उसने बढ़ कर काफि़रे हिन्दी को मुसल्लम निगल लिया। इस वाकि़ये से दरबार में हलचल मच गई। मुतावक्किल सर निगूं हो गया और इमाम (अ.स.) से दरख्वास्त करने लगा कि इस शेरे क़ालीन को जो फिर अपनी हालत पर आ गया है। हुक्म दीजिए कि इस काफि़रे हिन्दी को उगल दे। आपने फ़रमाया यह हरगिज़ न होगा और उठ कर चले गए। एक रिवायत की बिना पर आपने जवाब दिया कि अपर मूसा के अज़दहे ने फि़रऔन के सांपों को निगल लेने के बाद उगल दिया होता तो यह शेर भी उगल देता। चूंकि उसने नहीं उगला था , इस लिए यह भी नहीं उगले गा।