चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 11

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क़रिया सना बाद में हज़रत का नुज़ूले करम

शहरे तूस से रवाना हो कर आप क़रिया सना बाद पहुँचे और आपने मोहल्ला नौख़ान में क़याम फ़रमाया और लिबास उतार कर धुलने को दे दिया। हमीद बिने क़ैबता का बयान है कि आपकी जेब में एक दोआ कनीज़ ने पाई। उसने मुझे दिखाई मैंने उसे हज़रत तक पहुँचाते हुए दरियाफ़्त किया कि इस दुआ का फ़ायदा क्या है ? फ़रमाया यह शरीरों के शर से हिफ़ाज़त का हिर्ज़ है। फिर आप कु़ब्बाए हारून में तशरीफ़ ले गए और आपने क़िबले की तरफ़ ख़त खैंच कर फ़रमाय कि मैं इस जगह दफ़्न किया जाऊँगा और यह जगह मेरी ज़्यारत गाह होगी। इसके बाद आपने नमाज़ अदा फ़रमाई और वहां से चलने का इरादा किया।


इमाम रज़ा (अ.स.) का दारूल खि़लाफ़ा मर्व में नुज़ूल

इमाम (अ.स.) तय मराहिल और के़तय मनाज़िल करने के बाद जब मर्व पहुँचे जिसे सिकन्दर ज़ुलकरनैन ने बारवाएते मोअज़्ज़मुल बलदान आबाद किया था और जो उस वक़्त दारूल सलतनत था , तो मामून ने चन्द रोज़ ज़ियाफ़तो तकरीम के मरासिम अदा करने के बाद क़ुबूले खि़लाफ़त का सवाल पेश किया। हज़रत ने उस से इसी तरह इनकार किया जिस तरह हज़रत अमीरल मोमेनीन (अ.स.) चौथे मौक़े पर खि़लाफ़त पेश किए जाने के वक़्त इनकार फ़रमा रहे थे। मामून को खिलाफ़त से दस्त बरदार होना दर हक़िक़त मन्ज़ूर न था वरना वह इमाम को इसी पर मजबूर करता चुनान्चे जब हज़रत ने खि़लाफ़त के कु़बूल करने से इन्कार फ़रमाया तो उसने वली अहदी का सवाल पेश किया। हज़रत इसके भी अन्जाम से न वाक़िफ़ न थे। नीज़ बाख़ुशी जाबिर हुकूमत की तरफ़ से कोई मन्सब कु़बूल करना आपके ख़ानदान के उसूल के खि़लाफ़ था। हज़रत ने उस से भी इन्कार फ़रमाया। मगर उस पर मामून का इक़रार जब्र की हद तक पहुँच गया और उसने साफ़ कह दिया कि ‘‘ लाबद मन क़बूलक़ ’’ अगर आप इसको मन्ज़ूर नहीं कर सकते तो इस वक़्त आपको अपनी जान से हाथा धोना पड़ेगा। जान का ख़तरा क़ुबूल किया जा सकता है जब मज़हबी मफ़ाद का क़याम जान देने का मौक़ूफ़ हो वरना हिफ़ाज़ते जान शरीअते इस्लाम का बुनियादी हुक्म है। इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , यह है तो मैं मजबूरन क़ुबूल करता हूँ मगर कारो बारे सलतनत में बिल्कुल दख़्ल न दूँगा , हाँ अगर किसी बात में मुझ से मशविरा लिया जाएगा तो नेक मशविरा ज़रूर दूंगा। इसके बाद यह वली अहदी से बरा नाम सलतनते वक़्त के एक ढखोसले से ज़्यादा वक़त न रखती थी। जिससे मुम्किन है कि कुछ अर्से तक सियासी मक़सद में कामयाबी हासिल कर ली गई हो मगर इमाम की हैसियत अपने फ़राएज़ के अन्जाम देने में बिल्कुल वह थी जो उनके पेश रौ अली मुर्तुज़ा (अ.स.) अपने ज़माने के बाइख़्तेदार ताक़तों के साथ इख़्तियार कर चुके थे। जिस तरह उनका कभी कभी मशविरा दे देना उन हुकूमतों को सही व जाएज़ नहीं बना सकता वैसे ही इमाम रज़ा (अ.स.) का इस नौइय्यत से वली अहदी का क़ुबूल फ़रमाना इस सलतनत के जवाज़ का बाएस नहीं हो सकता था सिर्फ़ मामून की एक राज हट थी जो सियासी ग़रज़ के पेशे नज़र इस तरह पूरी हो गई मगर इमाम (अ.स.) ने अपने दामन को सलतनते जु़ल्म के इक़्दामात और नजमो नस्ख़ से बिल्कुल अलग रखा। तवारीख़ में है कि मामून ने हज़रते इमाम रज़ा (अ.स.) से कहा उसके बाद आपने दोनों हाथ आसमान की तरफ़ बलन्द किये और बारगाहे अहदीयत में अर्ज़ की परवरदीगार तू जानता है कि इस अमर को मैंने बामजबूरत और नाचारी और ख़ौफ़ो क़त्ल की वजह से क़ुबूल कर लिया है। ख़ुदा वन्दा तू मेरे इस फे़ल पर मुझसे उसी तरह मवाखि़ज़ा ना करना जिस तरह जनाबे युसूफ़ और जनाबे दानियाल से बाज़पुर्स नहीं फ़रमाई। इसके बाद कहा मेरे पालने वाले तेरे अहद के सिवा कोई अहद नहीं तेरी अता की हुई हैसियत के सिवा कोई इज़्ज़त नहीं। ख़ुदाया तू मुझे अपने दीन पर क़ाएम रहने की तौफ़ीक़ इनायत फ़रमा।

ख़्वाजा मोहम्मद पासी का कहना है कि वली अहदी के वक़्त आप रो रहे थे। मुल्ला हुसैन लिखते हैं कि मामून की तरफ़ से इसरार और हज़रत की तरफ़ से इन्कार का सिलसिला दो माह जारी रहा इसके बाद वली अहदी क़ुबूल की गई।


जलसा ए वली अहदी का इन्एक़ाद

पहली रमज़ान 201 हिजरी ब रोज़े पंज शम्बा जलसा ए वली अहदी मुनक़िद हुआ। बड़ी शानो शौकत और तुज़ुको एहतिशाम के साथ तक़रीब अमल में लाई गई। सब से पहले मामून ने अपने बेटे अब्बास को इशारा किया और उसने बैअत की फिर और लोग बैअत से शरफ़याब हुए। सोने और चांदी के सिक्के सरे मुबारक पर निसार किये गए और तमाम अरकाने सलतनत और मुलाज़मीन को इनामात तक़सीम हुए।

मामून ने हुक्म दिया कि हज़रत के नाम का सिक्का तैय्यार किया जाए। चुनान्चे दिरहम और दीनार पर हज़रत के नाम का नक़्श हुआ और तमाम शहरों में वह सिक्का चलाया गया। जुमे के खु़त्बे में हज़रत का नामे नामी दाखि़ल किया गया। यह ज़ाहिर है कि हज़रत के नामें मुबारक का सिक्का अक़ीदत मन्दों के लिये तबरूक और ज़मानत की हैसियत रखता था। इस सिक्के को सफ़रो हज़र में हिफ़्जे़ जान के लिये साथ रखना यक़ीनी अमर था। साहेबे जिन्नातुल खुलूद ने बहरो बर के सफ़र में तहफ़्फ़ुज़ के लिए आपके तवस्सुल का ज़िक्र किया है। उसी के याद गार में बतौरे ज़मानत ब अक़ीदा ए तहफ़्फ़ुज़ हम अब भी सफ़र में बाज़ू पर इमाम ज़ामिन सामिन का पैसा बांधते हैं।

अल्लामा शिब्ली नोमानी लिखते हैं कि 33,000 (तेतिस हज़ार) मरदो ज़न वग़ैरा की मौजूदगी में आपको वली अहदे खि़लाफ़त बना दिया गया। उसके बाद उसने तमाम हाज़ेरीन से हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) के लिये बैएत ली और दरबार का लिबास बजाय काले के हरा क़रार दिया गया। जो सादात का इम्तेयाज़ी लिबास था। फ़ौज की वर्दी भी बदल दी गई। तमाम मुल्क में एहकामे शाही नाफ़िज़ हुए कि मामून के बाद अली रज़ा (अ.स.) ही तख़्त के मालिक है और उनका लक़ब है ‘‘ अल रज़ा मन आले मोहम्मद ’’ । हसन बिन सहल के नाम भी फ़रमान गया कि उनके लिये बैअते आम ली जाय और उमूमन अहले फ़ौज व अमाएदे बनी हाशिम सब्ज़ (हरे) रंग के फ़रहरे और सब्ज़ कुलाह व क़बाएं इस्तेमाल की जाएं।

अल्लामा शरीफ़ जरजानी ने लिखा है कि क़ुबूले वली अहदी के मुताअल्लिक़ जो तहरीर हज़रत इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने मामून को लिखी। उसका मज़मून यह था कि ‘‘ चंूकि मामून ने हमारे उन हुक़ूक़ को तसलीम कर लिया है जिनको उनके आबाओ अजदाद ने नहीं पहचाना था लेहाज़ा मैंने उनकी दरख़्वास्ते वली अहदी क़ुबूल कर ली अगरचे जफ़र व जामेए से मालूम होता है कि यह काम अंजाम को न पहुँचेगा । ’’

अल्लामा शिब्लन्जी लिखते हैं कि क़ुबूले वली अहदी के सिलसिले में आपने जो कुछ तहरीर फ़रमाया था उस पर गवाह की हैसियत से फ़ज़ल बिन सहल , सहल बिन फ़ज़ल , यहिया बिन अक़सम , अब्दुल्लाह इब्ने ताहिर , समाना बिन अशरस , बशर बिन मोतमर , हम्माद बिन नोमान वग़ैरा के दस्तख़त थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि इमाम अली रज़ा (अ.स.) ने इस जलसे वली अहदी में अपने मख़्सूस अक़ीदत मन्दों को क़रीब बुला कर कान में फ़रमाया था कि इस तक़रीब पर दिल में ख़ुशी को जगह न दो। मुलाहेज़ा हों( सवाएक़े मोहर्रेका़ पृष्ठ 122, मतालेबुल सूऊल पृष्ठ 282, नूरूल अबसार पृष्ठ 142, आलामुल वुरा पृष्ठ 193, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 112, जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31, अल मामून पृष्ठ 82, वसीलतुन नजात पृष्ठ 379, अरजहुल मतालिब पृष्ठ 454, मसन्द इमाम रज़ा पृष्ठ 7, तारीख़े तबरी , शरह मवाक़िफ़ , तारीख़े आइम्मा पृष्ठ 472, तारीख़े अहमदी पृष्ठ 354, शवाहेदुन नबूवत , नियाबुल मोअद्दता , फ़सलुल ख़त्ताब , हिलयातुल अवलिया , रौज़तुल सफ़ा , उयून अख़बारे रज़ा , दमए साकेबा , सवानए इमाम रज़ा ( . . )

क्या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का यौमे विलादत (जन्मदिन) 25 दिसंबर है?

#सवाल :
क्या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का यौमे विलादत (जन्मदिन) 25 दिसंबर है?

#जवाब :
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह भाई साहब,

▪इस सवाल पर पहले ज़रा ग़ौर फरमाएं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का दिसम्बर के महीने से क्या तआल्लुक हो सकता है ? यानी इबरानी (Hebrew) और अरब एकवाम (समुदाय) तो ज़माना ए कदीम (प्राचीनकाल) से कमरी (lunar) महीनो पर चलते थे तो फिर ये दिसम्बर और वह भी 25 कहा से आ गए ? और जब ईसा अलैहिस्सलाम पैदा हुए तो किसी मोवर्रिख (इतिहासकार) को क्या मालूम था कि यह नौमोलूद (नवजात) नबी और रसूल होगा ? यह तो अल्ल्लाह की किताब क़ुरआन हक़ीम का अहसान माने कि तारीख के औराक़ से मफ़कूद वाकियात हमारे इल्म में आये l जैसा  कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश के बाद हज़रत मरियम अलैहिस्सलाम के किरदार की गवाही और अपनी नबुवत की खबर जैसे वाकियात l जबकि ये वाकियात उस वक़्त के मोवर्रिखीन (Historian) , बाइबिल और यहूदी क़ुतुब (books) सभी से गायब है l

▪दर हकीकत तकरीबन यही मामला नबी ए आखिरुज़्ज़माँ रसूले अकरम अलैहिस्सलाम का भी है। ये भी अम्र (तथ्य) ग़ौरतलब है कि दीनी ऐतबार से पहले अदवार (युगों) में सालगिरह (जयंती) का कोई रिवाज भी न था, न हम (मुस्लिम) में और न ही बनी इसराईल मेंl

▪लिहाज़ा न तो हमारे नबी अलैहिस्सलाम ने अपनी तारीखें विलादत का कभी ज़िक्र किया और न ही ईसा अलैहिस्सलाम ने , भले कमरी (lunar) तारीख हो या शम्सी (solar) तारीख!!!

▪बाइबल में तो आज भी ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत (जन्म) बहार (बसंत) के दिनों में मालूम पड़ती है। और सुब्हानअल्लाह क़ुरआन क़रीम में भी मरियम अलैहिस्सलाम रूअतब खजूर , ज़चगी के करीब खाती हैं।  खजूर उगाने वाले जानते हैं कि रूअतब, यानी ताज़ा ठन्ढ़ी खजूर कभी भी दिसम्बर में नहीं पैदा होती l  तो फिर ये 25 दिसम्बर का क्या किस्सा है ???

📍इस सिलसिले में मुख्तसरन बताता चलूँ कि 25 दिसम्बर अल्लाह के रसूल सय्यदना ईसा रुहुल्लाह का यौमे विलादत कतअन नहीं – बल्कि ये दिन रूमी मुश्रिको के सूरज देवता ज़ोस (deus sol Invictus) का दिन था जिसे ईसाई दुनिया ने सन 325 ई में रूमियों के ईसाई होने पर अपना लिया ताकि वह अपना पुराना त्यौहार अब ईसाईयत के नाम पर मनाएं।, यानी मज़हब तबदील कराने के लिए ईसाईयत ने एक समझौता किया जिसे वह खुद भी मानते हैं।

वल्लाहु आलम ,

कुछ धर्मशास्त्री मानते हैं कि उनका जन्म वसंत में हुआ था, क्योंकि इस बात का जिक्र है कि जब ईसा का जन्म हुआ था, उस समय गड़रिये मैदानों में अपने झुंडों की देखरेख कर रहे थे। अगर उस समय दिसंबर की सर्दियां होतीं, तो वे कहीं शरण लेकर बैठे होते। और अगर गड़रिये मैथुन काल के दौरान भेड़ों की देखभाल कर रहे होते तो वे उन भेड़ों को झुंड से अलग करने में मशगूल होते, जो समागम कर चुकी होतीं। ऐसा होता तो ये पतझड़ का समय होता।

25 दिसंबर को चुनने के पीछे का इतिहास क्या है?

इतिहासकारों के अनुसार रोमन काल से ही दिसंबर के आखिर में पैगन परंपरा के तौर पर जमकर पार्टी करने का चलन रहा है। यही चलन ईसाइयों ने भी अपनाया और इसे नाम दिया ‘क्रिसमस’। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के हवाले से कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चर्च के नेतृत्व कर्ता लोगों ने यह तारीख शायद इसलिए चुनी ताकि यह उस तारीख से मेल खा सके, जब गैर-ईसाई रोमन लोग सर्दियों के अंत में ‘अजेय सूर्य का जन्मदिन मनाते’ थे।’

एक रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं के अनुसार रोमन कैथोलिक चर्च ने इस दिन को ‘बड़े दिन’ के रूप में चुना था। कहते हैं कि इसे विंटर सोलिस्टिस से जोड़ा गया, जो कि उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है। उसके अगले दिन से दिन की लंबाई धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। इस दिन रोमन संस्कृति के शनि के देवता का पर्व ‘सैटर्नालिया’ भी मनाते हैं। इसीलिए रोमनों ने यह दिन चुना। ऐसे में चर्च ने इस तारीख को ईसा मसीह के जन्मदिन के तौर पर सेलिब्रेट करने का निर्णय लिया। उस समय यूरोप में गैर ईसाई लोग इस दिन को सूर्य के जन्मदिन के रूप में मनाते थे। ऐसे में चर्च के भी चाहता था कि गैर ईसाईयों के सामने एक बड़ा त्योहार खड़ा किया जाए। क्योंकि सभी लोग इस दिन उत्सव मनाते थे तो उन्होंने इसी दिन को ईसा मसीह का जन्मदिन घोषित करके सेलिब्रेट करने का निर्णय लिया। एक अन्य मान्यता अनुसार यीशू मसीह ईस्टर के दिन अपनी मां के गर्भ में आए थे, इस तरह उसके 9 महीने बाद लोग उनका जन्मदिन मानाने लगे। गर्भ में आने के दिन को रोमन और कई लोगों ने 25 मार्च माना था। वहीं, ग्रीक कैलेंडर के मुताबिक इसे 6 अप्रैल माना जाता है। इसके अनुसार 25 दिसंबर और 6 जनवरी की तारीखें सामने आईं थीं।