क्या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का यौमे विलादत (जन्मदिन) 25 दिसंबर है?

#सवाल :
क्या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का यौमे विलादत (जन्मदिन) 25 दिसंबर है?

#जवाब :
अस्सलाम अलैकुम व रहमतुल्लाह भाई साहब,

▪इस सवाल पर पहले ज़रा ग़ौर फरमाएं कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का दिसम्बर के महीने से क्या तआल्लुक हो सकता है ? यानी इबरानी (Hebrew) और अरब एकवाम (समुदाय) तो ज़माना ए कदीम (प्राचीनकाल) से कमरी (lunar) महीनो पर चलते थे तो फिर ये दिसम्बर और वह भी 25 कहा से आ गए ? और जब ईसा अलैहिस्सलाम पैदा हुए तो किसी मोवर्रिख (इतिहासकार) को क्या मालूम था कि यह नौमोलूद (नवजात) नबी और रसूल होगा ? यह तो अल्ल्लाह की किताब क़ुरआन हक़ीम का अहसान माने कि तारीख के औराक़ से मफ़कूद वाकियात हमारे इल्म में आये l जैसा  कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश के बाद हज़रत मरियम अलैहिस्सलाम के किरदार की गवाही और अपनी नबुवत की खबर जैसे वाकियात l जबकि ये वाकियात उस वक़्त के मोवर्रिखीन (Historian) , बाइबिल और यहूदी क़ुतुब (books) सभी से गायब है l

▪दर हकीकत तकरीबन यही मामला नबी ए आखिरुज़्ज़माँ रसूले अकरम अलैहिस्सलाम का भी है। ये भी अम्र (तथ्य) ग़ौरतलब है कि दीनी ऐतबार से पहले अदवार (युगों) में सालगिरह (जयंती) का कोई रिवाज भी न था, न हम (मुस्लिम) में और न ही बनी इसराईल मेंl

▪लिहाज़ा न तो हमारे नबी अलैहिस्सलाम ने अपनी तारीखें विलादत का कभी ज़िक्र किया और न ही ईसा अलैहिस्सलाम ने , भले कमरी (lunar) तारीख हो या शम्सी (solar) तारीख!!!

▪बाइबल में तो आज भी ईसा अलैहिस्सलाम की विलादत (जन्म) बहार (बसंत) के दिनों में मालूम पड़ती है। और सुब्हानअल्लाह क़ुरआन क़रीम में भी मरियम अलैहिस्सलाम रूअतब खजूर , ज़चगी के करीब खाती हैं।  खजूर उगाने वाले जानते हैं कि रूअतब, यानी ताज़ा ठन्ढ़ी खजूर कभी भी दिसम्बर में नहीं पैदा होती l  तो फिर ये 25 दिसम्बर का क्या किस्सा है ???

📍इस सिलसिले में मुख्तसरन बताता चलूँ कि 25 दिसम्बर अल्लाह के रसूल सय्यदना ईसा रुहुल्लाह का यौमे विलादत कतअन नहीं – बल्कि ये दिन रूमी मुश्रिको के सूरज देवता ज़ोस (deus sol Invictus) का दिन था जिसे ईसाई दुनिया ने सन 325 ई में रूमियों के ईसाई होने पर अपना लिया ताकि वह अपना पुराना त्यौहार अब ईसाईयत के नाम पर मनाएं।, यानी मज़हब तबदील कराने के लिए ईसाईयत ने एक समझौता किया जिसे वह खुद भी मानते हैं।

वल्लाहु आलम ,

कुछ धर्मशास्त्री मानते हैं कि उनका जन्म वसंत में हुआ था, क्योंकि इस बात का जिक्र है कि जब ईसा का जन्म हुआ था, उस समय गड़रिये मैदानों में अपने झुंडों की देखरेख कर रहे थे। अगर उस समय दिसंबर की सर्दियां होतीं, तो वे कहीं शरण लेकर बैठे होते। और अगर गड़रिये मैथुन काल के दौरान भेड़ों की देखभाल कर रहे होते तो वे उन भेड़ों को झुंड से अलग करने में मशगूल होते, जो समागम कर चुकी होतीं। ऐसा होता तो ये पतझड़ का समय होता।

25 दिसंबर को चुनने के पीछे का इतिहास क्या है?

इतिहासकारों के अनुसार रोमन काल से ही दिसंबर के आखिर में पैगन परंपरा के तौर पर जमकर पार्टी करने का चलन रहा है। यही चलन ईसाइयों ने भी अपनाया और इसे नाम दिया ‘क्रिसमस’। इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के हवाले से कुछ लोग यह भी कहते हैं कि चर्च के नेतृत्व कर्ता लोगों ने यह तारीख शायद इसलिए चुनी ताकि यह उस तारीख से मेल खा सके, जब गैर-ईसाई रोमन लोग सर्दियों के अंत में ‘अजेय सूर्य का जन्मदिन मनाते’ थे।’

एक रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं के अनुसार रोमन कैथोलिक चर्च ने इस दिन को ‘बड़े दिन’ के रूप में चुना था। कहते हैं कि इसे विंटर सोलिस्टिस से जोड़ा गया, जो कि उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटा दिन होता है। उसके अगले दिन से दिन की लंबाई धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। इस दिन रोमन संस्कृति के शनि के देवता का पर्व ‘सैटर्नालिया’ भी मनाते हैं। इसीलिए रोमनों ने यह दिन चुना। ऐसे में चर्च ने इस तारीख को ईसा मसीह के जन्मदिन के तौर पर सेलिब्रेट करने का निर्णय लिया। उस समय यूरोप में गैर ईसाई लोग इस दिन को सूर्य के जन्मदिन के रूप में मनाते थे। ऐसे में चर्च के भी चाहता था कि गैर ईसाईयों के सामने एक बड़ा त्योहार खड़ा किया जाए। क्योंकि सभी लोग इस दिन उत्सव मनाते थे तो उन्होंने इसी दिन को ईसा मसीह का जन्मदिन घोषित करके सेलिब्रेट करने का निर्णय लिया। एक अन्य मान्यता अनुसार यीशू मसीह ईस्टर के दिन अपनी मां के गर्भ में आए थे, इस तरह उसके 9 महीने बाद लोग उनका जन्मदिन मानाने लगे। गर्भ में आने के दिन को रोमन और कई लोगों ने 25 मार्च माना था। वहीं, ग्रीक कैलेंडर के मुताबिक इसे 6 अप्रैल माना जाता है। इसके अनुसार 25 दिसंबर और 6 जनवरी की तारीखें सामने आईं थीं।

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