
इमाम रज़ा (अ.स.) और वक़्ते निकाह
सक़तुल इस्लाम हज़रत क़ुलैनी किताब उसूले काफ़ी में तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से दरयाफ़्त किया गया कि तजवीज़ व निकाह किस वक़्त होना चाहिये ? आपने इरशाद फ़रमाया कि निकाह रात को सुन्नत है इस लिये कि रात लज़्ज़त और सुकून के लिये बनाई गई है और औरतें मर्दों के लिये लुत्फ़ व लज़्ज़त और सुकून का मरकज़ है।( मुनाक़िब जिल्द 1 पृष्ठ 91 ब हवाला काफ़ी )
हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के बाज़ मरवीयात व इरशादात
हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) से बुशामर अहादीस मरवी हैं जिनमें से बाज़ यह हैं।
1. बच्चों के लिये माँ के दूध से बेहतर कोई दूध नहीं। 2. सिरका बेहतरीन सालन है , जिसके घर में सिरका होगा वह मोहताज न होगा। 3. हर अनार में एक दाना जन्नत का होता है। 4. मुनक़्क़ा सफ़रे को दुरूस्त करता है , बलग़म को दूर करता है , पठ्ठो को मज़बूत करता है , नफ़्स को पाकीज़ा बनाता और रंजो ग़म दूर करता है। 5. शहद में शिफ़ा है , अगर कोई शहद हदिया करे तो वापस न करो। 6. गुलाब जन्नत के फूलों का सरदार है। 7. बनफ़शे का तेल सर में लगाना चाहिये इसकी तासीर गर्मियों में सर्द और सर्दियों में गर्म हेती है। 8. जो ज़ैतुन का तेल सर में लगाए या खाए उसके पास चालीस दिन तक शैतान न आयेगा। 9. सेलाए रहम और पड़ोसियों के साथ अच्छा सुलूक करने से माल में ज़्यादती होती है। 10. अपने बच्चों को ख़तना सातवें दिन करा दिया करो इससे सेहत ठीक होती है और जिस्म पर गोश्त चढ़ता है। 11. जुमे के दिन रोज़ा रखना 10 दस रोज़ों के बराबर है। 12. जो किसी औरत का महर न दे या मज़दूर की उजरत रोके या किसी को फ़रोख़्त कर दे वह बख़्शा न जायेगा। 13. क़ुरआन पढ़ने , शहद खाने और दुध पीने से हाफ़ेज़ा बढ़ता है। 14. गोश्त खाने से शिफ़ा होती है और मर्ज़ दूर होता है। 15. खाने की इब्तेदा नमक से करनी चाहिये क्यों कि इस से सत्तर बीमारियों से हिफ़ाज़त होती है जिनमें जुज़ाम भी है। 16. जो दुनियां में ज़्यादा खायेगा क़यामत में भूखा रहेगा। 17. मसूर , 70 सत्तर अम्बिया की पसन्दीदा खुराक है इस से दिल नरम होता है और आंसू बनते हैं। 18. जो चालीस दिन गोश्त न खायेगा बद इख़्लाक़ हो जायेगा। 19. खाना ठंडा कर के खाना चाहिये। 20. खाना प्याले के किनारे से खाना चाहिये। 21. तूले उम्र के लिये अच्छा खाना , अच्छी जूती पहन्ना और क़र्ज़ से बचना , कसरते जिमा से परहेज़ करना मुफ़ीद है। 22. अच्छे इख़्लाक़ वाला पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के साथ क़यामत में होगा। 23. जन्नत में मुत्तक़ी और हुस्ने खुल्क़ वालों की और जहन्नम में पेटू , ज़िना कारों की कसरत होगी। 24. इमाम हुसैन (अ.स.) के क़ातिल बख़्शे न जायेंगे। उनका बदला खुदा खुद लेगा। 25. हसन व हुसैन (अ.स.) जवानाने जन्नत के सरदार हैं और उनके पदरे बुज़ुर्गवार दोनों से बेहतर हैं। 26. अहले बैत (अ.स.) की मिसाल सफ़ीना ए नूह जैसी है , नजात वही पायेगा जो इस पर सवार होगा। 27. हज़रत फ़ात्मा (स.अ.) साक़े अर्श पकड़ कर क़यामत के दिन वाक़िये करबला का फ़ैसला चाहेंगी। उस दिन उनके हाथ में इमाम हुसैन (अ.स.) का ख़ून भरा लिबास होगा। 28. ख़ुदा से रोज़ी सदक़ा दे कर मांगो। 29. सब से पहले जन्नत में वह शोहदा और अयाल दार जायेंगे जो परहेज़गार होंगे और सब से पहले जहन्नम में न इंसाफ़ हाकिम और मालदार जायेंगे। (मसनद इमाम रज़ा (अ.स.) प्रकाशित मिस्र 1341 हिजरी) 30. हर मोमिन का कोई न कोई पड़ोसी अज़ियत का बाएस ज़रूर होगा। 31. बालों की सफ़ेदी का सर के अगले हिस्से से शुरू होना सलामती और इक़बाल मन्दी की दलील है और रूख़्सारों , दाढ़ी के अतराफ़ से शुरू होना सख़ावत की अलामत है और गेसूओं से शुरू होना शुजाअत का निशान है और गुद्दी से शुरू होना नहूसत है। 32. क़ज़ा व क़द्र के बारे में आपने फ़ज़ील बिन सुहैल के जवाब में फ़रमाया कि इंसान न बिल्कुल मजबूर है और न बिल्कुल आज़ाद है।( नूरूल अबसार पृष्ठ 140)
हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) और मजलिसे शोहदाऐ करबला
अल्लामा मजलिसी बेहारूल अनवार में तहरीर फ़रमाते हैं कि शायरे आले मोहम्मद (स.अ.) देबले ख़ेज़ाई का बयान है कि एक मरतबा आशूर के दिन मैं हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) की खि़दमत में हाज़िर हुआ तो देखा कि आप असहाब के हल्क़े में इन्तेहाई ग़मगीन व हज़ीं बैठे हुये हैं। मुझे हाज़िर होते देख कर फ़रमाया , आओ , आओ हम तुम्हारा इन्तेज़ार कर रहे हैं। मैं क़रीब पहुँचा तो आपने अपने पहलू में जगह दे कर फ़रमाया कि ऐ देबल चूंकि आज यौमे आशूरा है और यह दिन हमारे लिये इन्तेहाई रंजो ग़म का दिन है लेहाज़ा तुम मेरे जद्दे मज़लूम हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के मरसिए से मुताअल्लिक़ कुछ शेर पढ़ो। ऐ देबल जो शख़्स हमारी मुसीबत पर रोये या रूलाय उसका अज्र ख़ुदा पर वाजिब है। ऐ देबल जिस शख़्स की आंख हमारे जद्दे नामदार हज़रत सय्यदुश शोहदा हुसैन (अ.स.) के ग़म में रोयेगा खुदा उसके गुनाह बख़्श देगा। यह फ़रमा कर इमाम (अ.स.) ने अपनी जगह से उठ कर परदा खींचा और मुख़द्देराते असमत को बुला कर उसमें बिठा दिया। फिर आप मेरी तरफ़ मुख़ातिब हो कर फ़रमाने लगे। हां देबल ! अब मेरे जद्दे अमजद का मरसिया शुरू करो। देबल कहते हैं कि मेरा दिल भर आया और मेरी आंखों से आंसू जारी थे और आले मोहम्मद (अ.स.) में रोने का कोहरामे अज़ीम बरपा था।
साहेबे दारूल मसाएब तहरीर फ़रमाते हैं कि देबल का मरसिया सुन कर मासूमाए क़ुम जनाबे फ़ात्मा हमशीरा हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) इस क़द्र रोईं कि आपको ग़श आ गया।
इस इजतेमाई तरीक़े से ज़िक्रे हुसैनी को मजलिस कहते हैं। इसका सिलसिला अहदे इमाम रज़ा (अ.स.) में मदीने से शुरू हो कर मर्व तक जारी रहा।
अल्लामा अली नक़ी लिखते हैं कि अब इमाम रज़ा (अ.स.) को तबलीग़े हक़ के लिये नामे हुसैन (अ.स.) की इशाअत के काम को तरक़्क़ी देने का भी पूरा मौक़ा हासिल हो गया जिसकी बुनियाद उसके पहले हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) और इमाम ज़ाफ़रे सादिक़ (अ.स.) क़ायम कर चुके थे मगर वह ज़माना ऐसा था कि जब इमाम की खि़दमत में वही लोग हाज़िर होते थे जो बा हैसियत इमाम या बा हैसियत आलिमे दीन आपके साथ अक़ीदत रखते थे , और अब इमाम रज़ा (अ.स.) तो इमामे रूहानी भी हैं और वली अहदे सलतनत भी , इस लिये आपके दरबार में हाज़िर होने वालों का दायरा वसी है। ‘‘ मर्वका ’’ वह मक़ाम है जो ईरान से तक़रीबन वसत वाक़े है। हर तरफ़ के लोग यहां आते हैं और यहां यह आालम कि इधर मोहर्रम का चान्द निकला और आंखों से आंसू जारी हो गये। दूसरों को भी तरग़ीब व तहरीस की जाने लगी कि आले मोहम्मद (स.अ.) के मसाएब को याद करो और असराते ग़म को ज़ाहिर करो। यह भी इरशाद होने लगा कि जो इस मजलिस में बैठे जहां हमारी बाते ज़िन्दा की जाती हैं उसका दिल मुर्दा न होगा , उस दिन कि जब सब के दिल मुर्दा होंगे। तज़किराए इमाम हुसैन (अ.स.) के लिये जो मजमा हो उसका नाम इसलाही तौर पर ‘‘ मजलिस ’’ इसी इमाम रज़ा (अ.स.) की हदीस से माख़ूज़ है। आपने अमली तौर पर भी खुद मजलिसें करना शुरू कर दीं। जिनमें कभी खुद ज़ाकिर हुए और दूसरे सामेईन जैसे रियान इब्ने शबीब की हाज़री के मौक़े पर आपने मसाएबे इमाम हुसैन (अ.स.) बयान फ़रमाये और कभी अब्दुल्लाह बिन साबित या देबले खेज़ाई ऐसे किसी शायर के हाज़री के मौक़े पर उस शायर को हुक्म हुआ कि तुम ज़िक्रे इमाम हुसैन (अ.स.) में अशआर पढ़ो , वह ज़ाकिर हुआ और हज़रत सामेईन में दाखि़ल हुए।
1. किताब अल काफ़ी जिल्द 7 पृष्ठ 7 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक दिन सय्यद हिमयरी को हुक्म दिया कि मरसिया पढ़ो। उन्होंने मरसिया पढ़ा। इमाम खुद भी बे हद रोय और पसे परदा मुख़दे्देरात (औरतों) ने भी बे पनाह गिराया किया।

