चौदह सितारे हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स) पार्ट- 9

हारून रशीद का पहला हज और इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की पहली गिरफ़्तारी

मोहम्मद अबुल फि़दा लिखता है कि एनाने हुकूमत लेने के बाद हारून रशीद ने 173 हिजरी मे पहला हज किया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की तहरीर फ़रमाते हैं कि ‘‘ कि जब हारून रशीद हज को आया तो लोगों ने इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के बारे में चुग़ली खाई कि उनके पास हर तरफ़ से माल चला आता है। इत्तेफ़ाक़ से एक रोज़ हारून रशीद ख़ानाए काबा के नज़दीक हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से मुलाक़ी हुआ और कहने लगा तुम ही हो जिनसे लोग छुप छुप कर बैयत करते है। इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि हम दिलों के इमाम हैं और आप जिसमों के। फिर हारून रशीद ने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) से पूछा कि तुम किस दलील से कहते हो कि हम रसूल (स अ व व ) की ज़ुर्रियत हैं हालांकि तुम अली की औलाद हो और हर शख़्स अपने दादा से मुन्तसिब होता है नाना से मुन्तसिब नहीं होता। हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि ख़ुदा ए करीम क़ुरान मजीद में इरशाद करता है ‘‘वमन ज़मुरैत दाऊद सुलैमान व अयूबा व ज़करया व यहया व इसा ” और ज़ाहिर है कि हज़रत ईसा बे बाप के पैदा हुए थे तो जिस तरह महज़ अपनी वालेदा की निस्बत से ज़ुर्रियत अम्बिया में मुल्हक़ हुए उसी तरह हम भी अपनी मादरे गिरामी जनाबे फ़ात्मा (स अ व व ) की निस्बत से जनाबे रसूले खुदा (स अ व व ) की ज़ुर्रियत में ठहरे। फिर फ़रमाया कि जब आयत मुबाहेला नाजि़ल हुई तो मुबाहेले के वक़्त पैग़म्बरे ख़ुदा (स अ व व ) ने सिवा अली (अ.स.) और फ़ात्मा (स अ व व ) और हसन हुसैन (अ.स.) के किसी को नहीं बुलाया इस लिहाज़ से हज़रत हसन (अ.स.) व हज़रत हुसैन (अ.स.) ही रसूल अल्लाह (स. अ.) के बेटे क़रार पाए।

(सवाएके़ मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122, नूरूल अबसार पृष्ठ 134 अरजहुल मतालिब पृष्ठ 452 )

अल्लामा इब्ने ख़ल्क़ान लिखते हैं कि हारून रशीद हज करने के बाद मदीना मुनव्वरा आया और ज़्यारत करने के लिये रौज़ा ए मुक़द्देसा नबी (स. अ.) पर हाजि़र हुआ। उस वक़्त उसके गिर्द क़ुरैश और दीगर क़बाएले अरब जमा थे , नीज़ हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) भी साथ थे। हारून रशीद ने हाज़ेरीन पर अपना फ़ख़्र ज़ाहिर करने के लिये क़ब्रे मुबारक की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा , सलाम हो आप पर ऐ रसूल अल्लाह (स. अ.) ऐ इब्ने अम (मेरे चचा जा़द भाई) हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने फ़रमाया कि सलाम हो आप पर मेरे पदरे बुजुर्गवार यह सुन कर हारून के चेहरे का रंग फ़क़ हो गया और उसने हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को अपने हमराह ले जाकर क़ैद कर दिया।

(दफ़ायात अल अयान जिल्द 2 पृष्ठ 131 व तारीख़े अहमदी पृष्ठ 349 )

अल्लामा इब्ने शहर आशोब तहरीर फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में आप हारून रशीद के क़ैद ख़ाने में थे हारून ने आप का इम्तेहान करने के लिये नेहायत हसीन जमील लड़की , आपकी खि़दमत करने के लिये क़ैद ख़ाने में भेज दी। हज़रत ने जब उसे देखा तो लाने वाले से फ़रमाया कि हारून से जा कर कह देना कि उन्होंने यह हदिया वापस दिया हैं। ‘‘ बल अन्तुम बहदयातकम तफर हूना ’’ वह अताए तौबा लक़ा तो इससे तुम ही ख़ुशी हासिल करो। उसने हारून से वाकि़या बयान किया। हारून ने कहा कि इसे ले जाकर वहीं छोड़ आओ और इब्ने जाफ़र से कहो कि न मैंने तुम्हारी मरज़ी से क़ैद किया और न तुम्हारी मरज़ी से तुम्हारे पास यह लौंड़ी भेजी है , मैं जो हुक्म दूँ तुम्हे वह करना होगा। अल ग़रज़ वह लौंड़ी हज़रत के पास छोड़ दी गई।

चन्द दिनों के बाद हारून ने एक शख़्स को हुक्म दिया कि जा कर पता लगाए कि इस लौंड़ी का क्या रहा। उस ने जो क़ैद ख़ाने में जा कर देखा तो वह हैरान रह गया। वह भागा हुआ हारून के पास आ कर कहने लगा कि वह लौंड़ी तो ज़मीन पर सजदे में पड़ी हुई सुब्बूहुन क़ुद्दूसुन कह रही है और इसका अजब हाल है। हारून ने हुक्म दिया कि उसे इसके सामने पेश किया जाए , जब वह आई तो बिल्कुल मबहूस थी। हारून ने पूछा कि बात क्या है ? उसने कहा कि जब हज़रत के पास गई और उनसे कहा कि मैं आपकी खि़दमत के लिये हाजि़र हुईं हूँ तो आपने एक तरफ़ इशारा कर के फ़रमाया कि यह लोग जब कि मेरे पास मौजूद हैं मुझे तेरी क्या ज़रूरत है। मैंने जब उस सिम्त को नज़र की तो देखा कि जन्नत आरास्ता है और हूरो गि़लमान मौजूद हैं , उनका हुस्नों जमाल देख कर मैं सज्दे में गिर पड़ी और इबादत करने पर मजबूर हो गई। ऐ बादशाह ! मैंने वह चीज़े कभी नहीं देखीं जो क़ैद ख़ाने में मेरी नज़र से गुज़रीं। बादशाह ने कहा कि कहीं तूने सोने की हालत में ख़्वाब न देखा हो। उसने कहा ऐ बादशाह! ऐसा नहीं है मैंने आलमे बेदारी में बचश्मे ख़ुद सब कुछ देखा है। यह सुन कर बादशाह ने उस औरत को किसी महफ़ूज़ मुक़ाम पर पहुँचा दिया और उसके लिये हुक्म दिया कि इसकी निगरानी की जाय ताकि यह किसी से यह वाक़ेया बयान न करने पाय। रावी का बयान है कि इस वाकि़ये के बाद वह ता हयात मशग़ूले इबादत रही और जब कोई उसकी नमाज़ वग़ैराह के बारे में कुछ कहता था तो यह जवाब में कहती थी कि मैंने अब्दे सालेह हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को इसी तरह करते देखा है। यह पाक बाज़ औरत हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की वफ़ात से कुछ दिनों पहले फ़ौत हो गई।(मनाक़िब इब्ने शहर आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 63 )

क़ैद ख़ाने से आपकी रेहाई आप क़ैद खा़ने में तकलीफ़ से दो चार थे और हर कि़स्म की सखि़्तयां आप पर की जा रही थीं कि नागाह बादशाह ने एक ख़्वाब देखा जिससे मजबूर हो कर उसने आपको रेहा कर दिया।

अल्लामा इब्ने हजर मक्की बहवाला अल्लामा मसूदी लिखते हैं कि एक शब को हारून रशीद ने हज़रत अली (अ.स.) को ख़्वाब में इस तरह देखा कि वह एक तेशा (एक तरह का हथियार) लिये हुए तशरीफ़ लाये हैं और फ़रमाते हैं कि मेरे फ़रज़न्द को रेहा कर दे वरना मैं अभी तुझे कैफ़रे किरदाद तक पहुँचा दूँगा। इस ख़्वाब को देखते ही उसने रेहाई का हुक्म दे दिया और कहा कि अगर आप यहां रहना चाहें तो रहिये और मदीना जाना चाहते हैं तो वहां तशरीफ़ ले जाइये आपको इख़्तेयार है।

अल्लामा मसूदी का कहना है कि इसी शब को हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) ने हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स अ ) को ख़्वाब में देखा था।(सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 प्रकाशित मिस्र) अल्लामा जामी लिखते हैं कि मदीने रवाना करते वक़्त हारून ने आप से ख़ुरूज का शुबहा जा़हिर किया। आपने फ़रमाया कि ख़ुरूज व बग़ावत मेरे शायाने शान नहीं है , ख़ुदा की क़सम मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकता।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 192 )


हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) और अली बिन यक़तीन बग़दादी

क़ैद ख़ाना ए रशीद से छूटने के बाद हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) मदीना ए मुनव्वरा पहुँचे और बदस्तूर अपने फ़राएज़े इमामत की अदायगी में मशग़ूल हो गये। आप चूंकि इमामे ज़माना थे इस लिये आपको ज़माने के तमाम हवादिस की इत्तेला थी। एक मरतबा हारून रशीद ने अली बिन यक़तीन बिन मूसा कूफ़ी बग़दादी को जो कि हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) के ख़ास मानने वाले थे और अपनी कार करदिगी की वजह से हारून रशीद के मुक़र्रेबीन में से थे। बहुत सी चीज़ें दीं जिनमें ख़ेलअते फ़ाख़ेरा और एक बहुत उमदा कि़स्म का सियाह ज़रबफ़त का बना हुआ चोग़ा था जिस पर सोने के तारों से फूल कढ़े हुये थे और जिसे सिर्फ़ ख़ुल्फ़ा औद बादशाह पहना करते थे। अली बिन यक़तीन ने अज़ राहे तक़र्रूब व अक़ीदत उस सामान में और बहुत सी चीज़ों का इज़ाफ़ा कर के हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) की खि़दमत में भेज दिया। आपने उनका हदिया क़ुबूल कर लिया लेकिन उसमें से इस लिबास मख़सूस को वापस कर दिया जो ज़रबफ़त का बना हुआ था और फ़रमाया कि उसे अपने पास रखो यह तुम्हारे उस वक़्त काम आयेगा जब ‘‘ जान जोखम ’’ में पड़ी होगी। उन्होंने यह ख़्याल करते हुए कि इमाम ने न जाने किस वाकि़ये की तरफ़ इशारा फ़रमाया हो उसे अपने पास रख लिया। थोड़े दिनों के बाद इब्ने यक़तीन अपने एक ग़ुलाम से नाराज़ हो गये और उसे अपने घर से निकाल दिया। इसने जा कर रशीद ख़लीफ़ा से इनकी चुग़ली खाई और कहा कि आप ने जिस क़दर खि़लअत उन्हें दी है उन्होंने सब का सब हज़रत इमाम मूसा काजि़म (अ.स.) को दे दिया है और चूंकि वह शिया हैं इस लिये इमाम को बहुत मानते हैं। बादशाह ने जैसे ही यह बात सुनी वह आग बबूला हो गया और उसने फ़ौरन सिपाहियों को हुक्म दिया कि अली बिन यक़तीन को इसी हालत में गिरफ़्तार कर लाऐं जिस हाल में वह हों। अलग़रज़ इब्ने यक़तीन लाए गये , बादशाह ने पूछा मेरा दिया हुआ चोग़ा कहाँ है ? उन्होंने कहा बादशाह मेरे पास है। इसने कहा मैं देखना चाहता हूँ और सुनों ! अगर तुम इस वक़्त उसे न दिखा सके तो मैं तुम्हारी गरदन मार दूँगा। उन्होंने कहा बादशाह मैं अभी पेश करता हूँ। यह कह कर उन्होंने एक शख़्स से कहा कि मेरे मकान में जा कर मेरे फ़ुलां कमरे से मेरा सन्दूक उठा ला। जब वह बताया हुआ सन्दूक ले आया तो आपने उसकी मोहर तोड़ी और चोग़ा निकाल कर उसके सामने रख दिया। जब बादशाद ने अपनी आंखों से चोग़ा देख लिया तो उसका ग़ुस्सा ठन्डा हुआ और ख़ुश हो कर कहने लगा कि अब मैं तुम्हारे बारे में किसी की कोई बात न मानूँगा।

(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 194 )

अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि फिर उसके बाद रशीद ने और बहुत सा अतिया दे कर उन्हें इज़्ज़त व ऐहतराम के साथ वापस कर दिया और हुक्म दिया कि चुग़ली करने वालों को एक हज़ार कोड़े लगाए जाऐं चुनान्चे जल्लादो ने मारना शुरू किया और वह पाँच सौ कोड़े खा कर मर गया।

(नूरूल अबसार पृष्ठ 130 )

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