


#_इब्न_ख़लदून मुसलमान वैज्ञानिक पोस्ट 9
इब्न ख़लदून का पूरा नाम “अबू ज़ैद अब्दुर्रहमान बिन मुहम्मद बिन ख़लदून हज़रमी” (Arabic: أبو زيد عبد الرحمن بن محمد بن خلدون الحضرمي ) है, इनकी पैदाइश (जन्म) 27 मई 1332 को ट्यूनिश, सल्तनत आफ ईफरीकिया (अब ट्यूनिशिया ) में हुई थी, वो अपनी ऑटोबायोग्राफी में जन्म स्थान, परिवार के अतिरिक्त बताते हैं कि उनके पूर्वज पैग़म्बर मुहम्मद (PBUH) के साथी थे, उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के शुरुवाती साल ग्रेनेडा, फेज़ जैसी जगहों पर गुज़ारे , वो एक छोटे से इलाक़े के अमीर परिवार से थे,
अपने ज़माने के सबसे बड़े हिस्टोरिओग्रफेर और इतिहासकार इब्न ख़लदून को जदीद (मॉडर्न) सोशियोलॉजी, हिस्टोरिओग्राफ़ी, डेमोग्राफी और इकोनॉमिक्स का पिता (फौन्डिंग फ़ादर) भी कहा जाता है,
उन्होंने इतिहास से लेकर कई सब्जेक्ट्स पे अपनी समझ साझा की, एगों ओरोवन ने उन्हें सोसाइटीज की उत्पत्ति का जनक भी माना है वहीँ मशहूर इकोनॉमिस्ट आर्थर लैफ़र जिन्होंने लैफ़र कर्व ( Laffer curve) का कांसेप्ट दिया वो भी अपने कांसेप्ट को इब्न ख़लदून की देन बताते हैं, इब्न ख़लदून को कुछ फ़लसफ़ी दुनिया का सबसे बड़ा थिंकर भी मानते हैं..
अर्थशास्त्र पर इब्न खल्दुन ने कहा कि विकास और विकास सकारात्मक रूप से आपूर्ति और मांग दोनों को प्रोत्साहित करते हैं, और यह कि आपूर्ति और मांग की ताकतें माल की कीमतों का निर्धारण करती हैं, उन्होंने जनसंख्या वृद्धि, मानव पूंजी विकास, और विकास पर तकनीकी विकास के प्रभावों की व्यापक आर्थिक शक्तियों पर भी ध्यान दिया,
उन्होंने यह समझा कि धन एक मानक मूल्य, विनिमय (Exchange) का एक माध्यम और मूल्य का एक संरक्षक के रूप में कार्य करता है, हालांकि उन्हें यह एहसास नहीं था कि आपूर्ति और मांग के बल पर सोने और चांदी का मूल्य बदल गया है, इब्न खल्दुन ने भी मूल्य के श्रम सिद्धांत का परिचय दिया, उन्होंने श्रम को मूल्य के स्रोत के रूप में वर्णित किया, सभी आय और पूंजी संचय के लिए आवश्यक, शिल्प के मामले में स्पष्ट,
उन्होंने तर्क दिया कि भले ही “किसी शिल्प के अलावा किसी और चीज से परिणाम” अर्जित किया जाए, जिसके परिणामस्वरूप प्राप्त लाभ और अधिग्रहित (पूंजी) का मूल्य उस श्रम का मूल्य भी शामिल होना चाहिए जिसके द्वारा इसे प्राप्त किया गया था, श्रम (labour) के बिना यह हासिल नहीं हो सकता,
इब्न खल्दून ने अक्सर “अंधविश्वासों और ऐतिहासिक आंकड़ों की अलौकिक स्वीकृति” की आलोचना की, नतीजतन, उन्होंने सामाजिक विज्ञान के लिए वैज्ञानिक पद्धति का परिचय दिया, जिसे “अपनी उम्र के लिए कुछ नया” माना जाता था, और उन्होंने अक्सर इसे अपने “नए विज्ञान” के रूप में संदर्भित किया और इसके लिए अपनी खुद की नई शब्दावली विकसित की,
इब्न खल्दुन अपने साथी इतिहासकारों द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली गलतियों की गहन आलोचना और अपने काम में इतिहासकार की प्रतीक्षा कर रहे मुकद्दमे की शुरुआत करते हैं। उन्होंने सात महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान दिया जो सभी रिकॉर्ड, उनके स्वभाव से, त्रुटि के लिए उत्तरदायी हैं,
इनके ‘मुक़द्दमाह’ (Prolegomena) का अधिकांश युरोपीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, युरोप ने इस मुस्लिम विद्वान का लोहा माना, ‘इब्ने खलदून’ बहुत से विषयों पर युरोप के प्रसिद्ध विचारकों से बहुत पहले अपनी महत्वपूर्ण राय प्रकट कर चुके थे,
इब्न खलदुम ने 1377 में पहला इतिहास का पुस्तक “किताब उल इबर (Book of Lessons”) लिखा, अरबों और विदेशियों और बर्बर (Berbers) और उनके शक्तिशाली समकालीनों के इतिहास में शुरुआत और घटनाओं का रिकॉर्ड किया,
युरोपीय समझते थे कि ‘इतिहास’ के दर्शन पर विश्व में सब से पहले चर्चा करने वाले ‘वीको’ थे, किंतु ‘इब्ने खलदून’ का मुक़द्दमा पढ़ने के बाद उन्हें पता चला कि ‘वीको’ से तीन शताब्दी पहले ही ‘इब्ने खलदून’ इस विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा कर चुके हैं,
युरोपीय यह भी समझते थे कि ‘समाज शास्त्र’ के संस्थापक वाले जर्मन दार्शनिक ‘आगस्त कैन्ट’ हैं किंतु इब्ने ख़लदून का ‘मुक़द्दमा’ पढ़ने के बाद उन्हें मानना पड़ा कि कैन्ट से 400 साे साल पहले ‘इब्ने खलदून’ ने इस ज्ञान की बुनियाद रखी थी और इस नये ज्ञान का नाम “इमरानियात (समाजशास्त्र)” रखा था,
इब्ने ख़लदून का इंतिक़ाल 19 मार्च 1406 को क़ाहिरा (मामलूक सल्तनत, मिस्र) में हुआ था,

