
मौला अली عَلَیهِالسَّلام खलीफ़ा ऐ बिला फ़स्ल हैं
अल्लाह ﷻ ने कुरआन मजीद के सूरह हूद (सूरह नंबर 11) की आयत नंबर 17 में कहा कि-
اَفَمَنۡ کَانَ عَلٰی بَیِّنَۃٍ مِّنۡ رَّبِّہٖ وَ یَتۡلُوۡہُ شَاہِدٌ…
यानि ‘भला वोह शख्स जो अपने रब की तरफ़ से वाज़ेह दलील रखता हो और उसके पीछे उसके रब की ओर से एक शाहिद (गवाही देने वाला) भी आया हो..’
इस आयत में रब की तरफ़ से वाज़ेह दलील रखने वाले शख्स से मुराद ‘मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ’ हैं और अल्लाह ﷻ ने इस रसूल की रिसालत की गवाही देने के लिए एक शाहिद भेजा।
ऐहले’सुन्नत के नज़दीक कोई इख्तिलाफ़ नहीं है कि इस आयत में शाहिद से मुराद ‘हज़रत मौला इमाम अली मुर्तजा अलैहिस्सलाम’ हैं।
ऐहले’सुन्नत वल जमाआत के मशहूर आलिमे दीन ‘हज़रत अल्लामा क़ाज़ी मोहम्मद सनाउल्लाह उस्मानी मुजद्दिदी पानीपती रह०’ ने अपनी मशहूर किताब ‘तफ़सीरे मज़हरी’ में इसी आयत की तफ़सीर में लिखा है कि – “आप (अली अलैहिस्सलाम) तमाम कमालात-ऐ-विलायत के मर्कज़ी नुक्ता (केंद्रीय बिंदु) थे, कुतबे विलायत थे। तमाम औलिया [ही नहीं] बल्कि तमाम सहाबा [रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमाईन] भी मक़ामे विलायत में आपके पीछे (अनुगामी) और ताबेह (अधीन) थे।”
खलीफ़ा-ऐ-बिला फ़स्ल कहते ही उसे हैं कि तमाम सहाबा जिसके पीछे हों और सभी सहाबा उसके ताबेह हों।
अब बताओ कि ऐहले’सुन्नत का कौन सा बुनियादी अक़ीदा सही सलामत रह गया जो शियाओं से अलग हो?????

👑 नबी-ऐ-क़रीम रऊफ़-ओ-रहीम ﷺ के बाद बातिनी ख़िलाफ़त में मौला अली अलैहिस्सलाम खलीफ़ा ऐ बिला फ़स्ल हैं..
इमाम आलूसी बगदादी हनफ़ी ने तफ़सीर ऐ रूहुल मआनी में सूरह माइदा की तफ़सीर में लिखा है कि-
والآية عند معظم المحدثين نزلت في علي كرم الله تعالى وجهه، والإمامية – كما علمت – يستدلون بها على خلافته بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم بلا فصل، وقد علمت منا ردهم – والحمد لله سبحانه – رد كلام، وكثير من الصوفية قدس الله تعالى أسرارهم يشير إلى القول بخلافته كرم الله تعالى وجهه بعد الرسول عليه الصلاة والسلام بلا فصل أيضا إلا أن تلك الخلافة عندهم هي الخلافة الباطنة التي هي خلافة الإرشاد والتربية والإمداد والتصرف الروحاني لا الخلافة الصورية التي هي عبارة عن إقامة الحدود الظاهرة وتجهيز الجيوش والذب عن بيضة الإسلام ومحاربة أعدائه بالسيف والسنان، فإن تلك عندهم على الترتيب الذي وقع كما هو مذهب أهل السنة، والفرق عندهم بين الخلافتين كالفرق بين القشر واللب، فالخلافة الباطنة لب الخلافة الظاهرة، وبها يذب عن حقيقة الإسلام، وبالظاهرة يذب عن صورته، وهي مرتبة القطب في كل عصر، وقد تجتمع مع الخلافة الظاهرة كما اجتمعت في علي كرم الله تعالى وجهه أيام أمارته، وكما تجتمع في المهدي أيام ظهوره..
यानि “आयत-ऐ-मुबारकह – इन्नमा वली युकुमुल्लाहु व रसूल वल्लज़ी न आमनू..[बेशक तुम्हारा वली अल्लाह और उसका रसूल हैं और ईमान वाले..).
यह आयत अकसर मोहद्दिसीन के नज़दीक हज़रत मौला अली करमुल्लाह वज़हु० के हक़ में नाज़िल हुई। सूफ़िया-ऐ-क़िराम की कसीर तादाद फ़रमाती है कि इस आयत में हज़रत अली मुर्तज़ा अलैहिस्सलाम की रसूल अल्लाह ﷺ के बाद खिलाफ़ते-बिला-फ़स्ल की तरफ़ इशारा है। हां, मगर यह खिलाफ़त-ऐ-बातिनिया है- जो इरशाद, रुहानी मदद तरबियत की सूरत में होती है। खिलाफ़त ऐ ज़ाहिरी मुराद नहीं- जिससे मुराद हदूद (सीमाएं) कायम करना, लश्कर तैयार करना, इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए कोशिश करना और जिहाद शैफ़ी वा शनानी के लिए तैयार करना है,- क्योंकि ख़िलाफ़त ऐ ज़ाहिरी इस तरतीब पर बर-हक़ है जो ऐहले’सुन्नत का मज़हब है।
इन दोनों ख़िलाफ़तों में फ़र्क ऐसा है [कि] जैसे मगज़ (मेवा) और छिलके (भूसी) में है, खिलाफ़त ऐ ज़ाहिरी के ज़रिए इस्लाम के ज़ाहिर की हिफ़ाज़त (वाह्य सुरक्षा) होती है और खिलाफ़त-ऐ-बातिनी के ज़रिए से इस्लाम के बातिनी निज़ाम की हिफ़ाज़त की जाती है और यह मुकाम हर ज़माने के पेशवा (قطب الاقطاب) को हासिल होता है। कभी खिलाफ़त ज़ाहिरी वा बातिनी- दोनों किसी हस्ती के लिए साबित होती है जैसे हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने ज़माने में ज़ाहिरी वा बातिनी- दोनों खिलाफ़तों के वारिस थे और इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम भी दोनों खिलाफ़तों पर फ़ाएज़ होंगे..।”
अरबी मतन देखें, रूहुल मआनी, जिल्द 6, सफ़ाह नंबर 186 पर👇
https://archive.org/details/ROOH-UL-MAANI/ROOH-UL-MAANI-06/page/n186/mode/1up?view=theater
इमाम जलालुद्दीन सुयूती की ‘कल कौलुल जल्ली फ़ि फज़ायल ऐ अली करमुल्लाह वज़हुल्करीम’ में सफ़ाह नंबर 29 से 30 पर हज़रत अल्लामा पीर सय्यद खिज्र हुसैन चिश्ती ने तफ़सीर ऐ रूहुल मआनी की इस पूरी अरबी इबारत का उर्दू में तर्जुमा किया है।

