
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के इल्मी फ़ुयूज़ व बरकात
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) जिन्हें रासेख़ीन फिल इल्म में होने का शरफ़ हासिल है और जो इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन से आगाह और दुनिया की तमाम ज़बानों से वाक़िफ़ हैं। जैसा कि मुवर्रेख़ीन ने लिखा है , मैं उनके तमाम इल्मी फ़यूज़ व बरकात पर थोड़े अवराक़ में क्या रौशनी डाल सकता हूँ। मैंने आपके हालात की छान बीन भी की है और यक़ीन रखता हूँ कि अगर मुझे फ़ुरसत मिले तो तक़रीबन 6 महीने में आपके उलूम और फ़ज़ाएलो कमालात का काफ़ी ज़ख़ीरा जमा किया जा सकता है। आपके मुताअल्लिक़ इमाम मालिक बिन अनस लिखते हैं ‘‘ मेरी आंखों ने इल्मो फ़ज़ल , वरा व तक़वे में इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) से बेहतर देखा ही नहीं जैसा कि ऊपर गुज़रा वह बहुत बड़े लोगों में से थे और बहुत बड़े ज़ाहिद थे। ख़ुदा से बेपनाह डरते थे। बे इन्तेहा हदीसें बयान करते थे , बड़ी पाक मजलिस वाले और कसीरूल फ़वाएद थे। आपसे मिल कर बे इन्तेहा फ़ायदा उठाया जाता था। ’’(मनाक़िब शहरे आशोब जिल्द 5 पृष्ठ 52 प्रकाशित बम्बई)
इल्मी फ़यूज़ रसानी का मौक़ा यूं तो हमारे तमाम आइम्मा ए अहलेबैत (अ.स.) इल्मी फ़यूज़ व बरकात से भरपूर थे और इल्मे अव्वलीन व आख़ेरीन के मालिक , लेकिन दुनिया वालों ने उनसे फ़ायदा उठाने के बजाय उन्हें क़ैदो बन्द में रख कर उलूमो फ़ुनून के ख़ज़ाने पर हतकड़ियों और बेड़ियों के नाग बिठा दिये थे। इस लिये इन हज़रात के इल्मी कमालात कमा हक़्क़ा मंज़रे आम पर न आ सके। वरना आज दुनिया किसी इल्म में ख़ानदाने रिसालत के अलावा किसी की मोहताज न होती। फ़ाज़िल मआसिर मौलाना सिब्तुल हसन साहब हंसवी लिखते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) अल मतूफ़ी 148 हिजरी का अहद मआरफ़ परवरी के लिहाज़ से एक ज़र्री अहद था। वह रूकावटें जो आप से पहले आइम्मा अहलेबैत (अ.स.) के लिये पेश आया करती थीं उनमें किसी हद तक कमी थीं। उमवी हुकूमत की तबाही और अब्बासी सलतनत का इस्तेहकाम आपके लिये सुकून व अमन का सबब बना। इस लिये हज़रत को मज़हबे अहलेबैत (अ.स.) की इशाअत और उलूमव फ़ुनून की तरवीज (फ़ैलाने) का बेहतरीन मौक़ा मिला। लोगों को भी इन आलिमाने रब्बानी की तरफ़ रूजु करने में अब कोई ख़ास ज़हमत न थी जिसकी वजह से आपकी खि़दमत में अलावा हिजाज़ के दूर दराज़ मक़ामात मिस्ले ईराक़ , शाम , ख़ुरासान , काबुल , सिन्ध और बलादे रोम , फ़िरहंग के तुल्बा शाएक़ीने इल्म हाज़िर हो कर मुस्तफ़ीद होते थे। हज़रत के हलक़ा ए दर्स में चार हज़ार असहाब थे। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (अ.र.) किताबे इरशाद में फ़रमाते हैं।
तरजुमा लोगों ने आपके उलूम को नक़ल किया जिन्हें तेज़ सवार मनाज़िल बईदा की तरफ़ ले गये और आपकी शोहरत तमाम शहरों में फ़ैल गई और उलेमा ने अहले बैत (अ.स.) में किसी से भी इतने उलूम व फ़ुनून को नहीं नक़्ल किया है जो आप से रवायत करते हैं और जिनकी तादाद 4000 (चार हज़ार) है। ग़ैर अरब तालेबान इल्म से एक रूमी नसब बुज़ुर्ग ज़रार बिन ऐन मतूफ़ी 150 हिजरी में क़ाबिले ज़िक्र है। जिनके दादा सुनसुन बिला दरदम के एक मुक़द्दस राहिब (छवदा) थे। ज़रारा अपनी खि़दमाते इल्मिया के एतेबार से इस्लामी दुनियां में काफ़ी शोहरत रखते थे और साहेबे तसानीफ़ थे। किताब अल इस्तेताअत वल जबरान की मशहूर तसनीफ़ है।(ख़ुलासतुल अक़वाल अल्लामा जल्ली पृष्ठ 38, मिन्हाजुल मक़ाल पृष्ठ 142 व मोअल्लेफ़ा शिया फ़ी सदरूल इस्लाम पृष्ठ 51 )
कुतुबे उसूले अरबा मिया
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के चार सौ ऐसे मुसन्नेफ़ीन थे जिन्होंने अलावा दीगर उलूम व फ़ुनून के कलामे मासूम को ज़ब्त कर के चार सौ कुतुब उसूल तैयार कीं। असल से मुराद मजमूए अहादीसे अहलेबैत (अ.स.) की वह किताबें हैं जिनमें जामे ने ख़ुद बराहे रास्त मासूम से रवायत कर के अहादीस को ज़ब्ते तहरीर किया है या ऐसे रावी से सुना है जो ख़ुद मासूम से रवायत करता है। इस क़िस्म की किताब में जामे की दूसरी किताब या रवायत से अन फ़लां अन फ़लां के साथ नक़ल करता जिसकी सनद में और सवाएत की ज़रूरत हो। इस लिये कुनुबे उसूल में ख़ता व ग़लत सहो व निसयान का एहतेमाल ब निसबत और दूसरी किताबों के बहुत कम है। कुतुबे उसूल के ज़माना ए तालीफ़ का इन्हेसार अहदे अमीरल मोमेनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) से ले कर इमाम हसन असकरी (अ.स.) के ज़माने तक है जिसमें असहाबे मासूमीन ने बिल मुशाफ़ा मासूम से रवायत कर के अहादीस को जमा किया है या किसी ऐसे सुक़्क़े रावी से हदीसे मासूम को अख़ज़ किया है जो बराहे रास्त मासूम से रवायत करता है। शेख़ अबुल क़ासिम जाफ़र बिन सईद अल मारूफ़ बिल मोहक़क़्िक अल हली अपनी किताब अल मोतबर में फ़रमाते हैं कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के जवाबात मसाएल को चार सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे इमाम ने तहरीर कर के चार सौ तसानीफ़ मुकम्मल की है।
सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) के असहाब की तादाद और उनकी तसानीफ़
आगे चल कर फ़ाज़िल माअसर अल जव्वाद में बा हवाला ए किताब व कुतुब ख़ाना लिखते हैं कुतुब रेजाल में असहाबे आइम्मा के हालात व तराजिम मज़कूर हैं। उनकी मजमूई तादाद चार हज़ार पांच सौ असहाब है। जिनमें से सिर्फ़ चार हज़ार असहाब हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) के हंै। सब का तज़किरा अबुल अब्बास अहमद बिन मोहम्मद बिन सईद बिन अक़्दा 249 से 333 ने अपनी किताब रेजाल में किया है और शेख़ अल ताएफ़ा अबू जाफ़र अल तूसी ने भी इन सब का ज़िक्र अपनी किताब रिजाल में किया है। मासूमीन (अ.स.) के तमाम असहाब में से मुसन्नेफ़ीन की जुमला तादाद एक हज़ार तीन सौ से ज़्यादा नहीं है। ज़िन्होंने सैकड़ो की तादाद में कुतुबे उसूल और हज़रों की तादाद में दूसरी किताबें तालीफ़ और तसनीफ़ की हैं जिनमें से बाज़ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा तो ऐसे थे जिन्होंने तन्हा सैकड़ों किताबें लिखीं। फ़ज़ल बिन शाज़ान ने एक सो अस्सी किताबें तालीफ़ कीं। इब्ने दवल ने सौ किताबें लिखीं। इसी तरह बरक़ी ने भी तक़रीबन सौ किताबें लिखीं। इब्ने अबी अमीर ने 90 नब्बे किताबें लिखीं और अक्सर असहाबे आइम्मा ऐसे थे जिन्होंने तीस या चालीस से ज़्यादा किताबें तालीफ़ कीं। ग़रज़ की एक हज़ार तीन सौ मुसन्नेफ़ीन असहाबे आइम्मा ने तक़रीबन पांच हज़ार तसानीफ़ कीं। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जबर के मातहत है कि सिर्फ़ जाबिर अल जाफ़ेई इमाम सादिक़ (अ.स.) के सत्तर हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे।(अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन ज़्यादा मशहूर है।)
तारीख़े इस्लाम जिल्द 5 पृष्ठ 3 में है कि ‘‘ अब्बना बिन शग़लब बिन रबाह(अबू सईद) कूफ़ी सिर्फ़ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तीस हज़ार अहादीस के हाफ़िज़ थे। ’’ उनकी तसानीफ़ में तफ़सीर ग़रीबुल क़ुरआन , किताब अल मुफ़रद , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल सिफ़्फ़ीन क़ाबिले ज़िक्र हैं। यह क़ारी फ़क़ीह लग़वी मोहद्दीस थे। इन्हें हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.स.) और हज़रत इमाम मोहम्मद बाक़र (अ.स.) हज़रत इमाम जा़फ़रे सादिक़ (अ.स.) के सहाबी होने का शरफ़ हासिल था। 141 हिजरी में इन्तेक़ाल किया।
हज़रत सादिक़े आले मोहम्मद (अ.स.) और इल्मे जफ़र
हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) को चूंकि नशरे उलूम का मौक़ा मिल गया था लेहाज़ा आपने इल्मी इफ़ादात के दरिया बहा दिये। आपको जहां दीगर उलूम में कमाल था और आपने मुख़्तलिफ़ उलूम के नशर में कोशिश की है। इल्मे जफ़र में भी आप यकताए ज़माना थे और इस इल्म में भी आपकी तसानीफ़ हैं।
इल्मे जफ़र किसे कहते हैं इसके मुताअल्लिक़ ‘‘ अलाब लौलैस मालूफ़ अल यसवा ’’ किताब अल मन्जद के पृष्ठ 91 प्रकाशित बैरूत में लिखते हैं कि इल्मे जफ़र को इल्मे हुरूफ़ भी कहते हैं। यह ऐसा इल्म है कि इसके ज़रिये से हवादिसे आलम को मालूम कर लिया जाता है। मौलवी वहीदुज़्ज़मां अपनी किताब अनवारूल लुग़त पृष्ठ 15 ब हवाला ए बहरे मुहीत लिखते हैं कि इल्मे जफ़र जो इल्मे तकसीर का दूसरा नाम है इससे मुराद यह है कि सायल के सवाल के हुरूफ़ में तग़य्युर व तबद्दुल कर के हालात मालूम किये जायें। मजमउल बैहरैन में लफ़्ज़े जफ़र के मातहत लिखा है कि इल्म अल हुरूफ़ के उसूल पर हवादिसे आलम के मालूम करने का नाम इल्मे जफ़र है। तारीख़े आइम्मा बा हवाला ए तारीख़े इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पृष्ठ 85 में है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स.) ने एक किताब कीमिया और जफ़र और रमल पर लिखी थी।
1 अल्लामा सय्यद अब्दुल हुसैन शरफ़उद्दीन अपनी किताब ‘‘ मोअल्लेफ़ा अल शिया फ़ी सदरूल इस्लाम ’’ प्रकाशित बग़दाद के पृष्ठ 36 में लिखतें हैं कि जनाबे जाबिर जाफ़ेई का असली नाम और सिलसिला ए नसब यह था। जाबिर बिन यज़ीद बिन हरस बिन अब्दुल ग़ौस बिन क़आब बिन अल हरस बिन माविया बिन वाएल अल जाएफ़ी अल कूफ़ी था। उनकी तसानीफ़ में किताब अल तफ़सीर , किताब अल नवादर , किताब अल फ़ज़ाएल , किताब अल जमल , किताब अल सिफ़्फ़ीन , किताब अल नहरवान , किताब मक़तल अमीरल मोमेनीन , किताब मक़तल अल हुसैन , ज़्यादा मशहूर हैं।



