अफज़लियत ए मौला अली अलैहिस्सलाम…

अफज़लियत ए मौला अली अलैहिस्सलाम…

✍️ इमाम काज़ी अबू बकर अल बाक़लानी रह० [मतवफ्फह 403 हिजरी] ने ‘मनाकिब अइम्मा ए अरबा’ में रकम नंबर 351 के तहत लिखते हैं कि-
” والقَوْلُ بِتَفْضِيل عَليٍّ رِضْوَانُ الله عنه مَشْهُورٌ عِنْدَ كَثِيرٍ مِنَ الصَّحَابَةِ كالذي يَرْوِي عن عَبْدَ الله بن عَبَّاس وحُذَيْفَة بن اليمان وعمار وجابر بن عبدالله وأبي الهيثم بن التّيهان وغيرِهم، وإنْ كانَتْ الرِوَايَةُ في تفضيل أبي بكرٍ أشهر عند أصْحَاب الحَدِيث..”

यानि ‘और मौला अली [अलैहिस्सलाम] की अफ़ज़लियत का कौल कसीर सहाबा किराम रिजवानुल्लाह अलैहिम अजमआईन में मशहूर था जैसा कि अब्दुल्ला बिन अब्बास, हुजैफा बिन यमान, अम्मार बिन यासिर, जाबिर बिन अब्दुल्लाह, अबू हैसिम बिन तैहान रजिअल्लाह अन्हुम व बाकी लोगों से मरवी है।
और जहां तक ताल्लुक रहा अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत का तो यह कौल असहाब उल हदीस (यानि मुहद्दिसीन) में ज्यादा मशहूर है।’
                       – सफा नंबर 294 पर

फिर रकम नंबर 369 के तहत लिखते हैं कि-
فكذلِكَ قد رَوَى عن عَبدِ الله بَنْ عَباس والحَسَن بَنْ عَلي وأُبَيّ وزَيْدِ وعَمَّارَ بَنْ يَاسر، وسلمان الفارسي، وجَابِرَ ابْنِ عبد الله ، وأبي الهَيْثم بن التّيهان الأنصاري، وحذيفة بن اليمان، وعمرو ابن الحمق، وأبي سعيد الخُذري، وغيرهم من الصحابةِ رَضِيَ الله عنهم، كانوا يقولون: إِنَّ عَلياً خَيْرُ البَشَرِ ، وخَيْرُ النَّاسِ بعد رسول الله، وأعْلَمُهم، وأوَّلُهم إسلاماً، وأحبهم إلى رسول الله ، إلى نَظَائِرِ هذه، فيَجِبُ دَلالَهُ قَوْلِهِم على تَفْضِيله.

यानि ‘अब्दुल्ला बिन अब्बास, हसन बिन अली, अबू दरदा, ज़ैद बिन अरक़म, अम्मार बिन यासिर, सलमान फारसी, जाबिर बिन अब्दुल्ला, अबू हैसिम बिन तैहान, हुजैफा बिन यमान, अम्र बिन अल हमक़, अबू साईद खुदरी और दीगर सहाबा किराम और गैरहिम रजिअल्लाह अन्हुम अजमाईन से रिवायत किया गया है कि इन्होंने फरमाया- अली [अलैहिस्सलाम] दर-हक़ीकत खैरुल-बसर (इंसानों में सबसे बेहतरीन शख्स) और रसूल ए खुदा सल्ल० के बाद लोगों में सबसे बेहतर हैं और लोगों में सबसे ज्यादा इल्म रखने वाले और सबसे पहले इस्लाम लाने वाले और रसूल-अल्लाह सल्ल० के नजदीक सबसे ज्यादा महबूब हैं।’
         – सफा नंबर 294.

फिर रकम नंबर 617 के तहत लिखते हैं कि-
“وقد روى أن قوماً من الصحابة كانوا يذهبون إلى تفضيل على على أبي بكر..”

यानि ‘नि:संदेह (बिना किसी शक ओ शुबह) के सहाबा किराम की एक जमाआत हजरत अली [रजिअल्लाह अन्हु] को हजरत अबू बकर पर तफ़्ज़ील का मज़हब रखती थी।’
           – सफा नंबर 471.
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इमाम बाक़लानी की किताब ‘मनाकिब अइम्मा ए अरबा’ का आनलाइन पीडीएफ लिंक 👇
https://archive.org/details/Heliopolis1957_gmail_20180407_1604/page/n295/mode/1up?view=theater

इमाम शमशुद्दीन ज़हबी की किताब ‘सियर अलामिन नुबला’ की जिल्द नंबर 17 में सफा नंबर 190 पर इमाम बाक़लानी की तौसीक देखें 👇
https://archive.org/details/saanz/17/page/n190/mode/1up?view=theater
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मसला ए अफजलियत पर चौथी सदी के मशहूर मुज़द्दिद व मुहद्दिस इमाम बाक़लानी की इन सभी बातों पर गौर किया जाए तो दो बातें सामने आता है कि-
1) अगर इमाम बाक़लानी की बात सही है तो पता चलता है कि हजरत अबू बकर की अफजलियत पर इजमा नहीं है बल्कि अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत पर खुद में इख्तिलाफ है क्योंकि बहुत से सहाबा किराम मौला अली अलैहिस्सलाम को सबसे अफजल मानते थे तो इस तरह से अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु की अफजलियत पर इजमा वाली बात का सत्यानाश हो जाता है।

2) अगर मान लिया जाए कि नबी करीम सल्ल० के बाद उम्मत में सबसे अफजल हजरत अबू बकर रजिअल्लाह अन्हु ही हैं और इनकी अफजलियत पर इजमा है तो फिर अपने इन चौथी सदी के मुज़द्दिद व मुहद्दिस इमाम बाक़लानी पर फतवा लगाना पड़ेगा कि इन्होंने सहाबा किराम पर झूठी तोहमत लगाया और इस तरह से अपने इन अकाबिरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, कैसे इमाम और कैसे हमारे अकाबिर हैं…
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