चौदह सितारे पार्ट 56

हज़रत अली (अ.स.) और इस्लाम में सड़कों की तामीरी बुनियाद

हज़रत अली (अ.स.) बजाते खुद सीराते मुस्तकीम थे और आपको रास्तो से ज़्यादा दिलचस्पी थी। आप फ़रमाते थे कि मैं ज़मीन व आसमान के रास्तों से वाकिफ़ हूँ। हाफिज़ हैदर अली कलन्दर सीरते अलविया में लिखते हैं कि जजिये का माल व रूपया लशकर की आरास्तगी सरहद की हिफ़ाज़त और किलों की तामीर में सर्फ़ होता था और जो उससे बच रहता था वह सड़को पुलों की तय्यारी और बढ़ाते थे। इसी तरह तीन तीन पत्थर ले जा कर हर मील पर संगे मील नस्ब करते थे। अल्लामा शिब्ली ने हज़रत उमर के मोहक़मए जंगी की ईजाद को अल फ़ारूख़ में बड़े शद्दो मद से लिखा है, लेकिन हज़रत अली (अ.स.) की इस अहम रिफ़ाही खिदमत का कहीं भी कोई जिक्र नहीं किया हालाकि हज़रत अली (अ.स.) की यह वह बुनियादी खिदमत है जिसका जवाब ना मुमकिन है।

हज़रते उस्मान की खिलाफ़त

मुर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि हज़राते शेख़ैन की वफ़ात के बाद मसलए खिलाफ़त फिर ज़ेरे बहस लाया गया और हज़रत अली (अ.स.) से कहा गया कि आप सीरते शेख़ैन पर अमल पैरा होने का वायदा कीजिये तो आपको ख़लीफ़ा बना दिया जाए। आपने फ़रमाया कि मैं खुदा व रसूल स. और अपनी साएब राय पर अमल करूंगा लेकिन सीरते शेख़ैन पर अमल नहीं कर सकता। (तबरी जिल्द 5 सफ़ा 37 व शरह फिक़हे अकबर सफ़ा 80 और तारीखुल क़ुरआन सफ़ा 36 प्रकाशित जद्दा) इस फ़रमाने के बाद लोगों ने इसी इक़रार के ज़रिये हज़रत उस्मान को ख़लीफ़ा बना दिया। हज़रत उस्मान ने अपने अहदे खिलाफ़त में ख़ुवेश परवरी, अक़रेबा नवाज़ी की। बड़े बड़े अस्हाबे रसूल स. को जिला वतन किया। बैतुल माल के माल में बेजा तसरूफ़ किया। अपनी लड़की के लिये महर तामीर कराये। मरवान बिन हकम को अपना दामाद और वज़ीरे आज़म बना लिया। हालांकि रसूल अल्लाह स. उसे शहर बदर कर चुके थे, और शेख़ैन ने भी इसे दाखिले मदीना नहीं होने दिया था। फिदक इसके हवाले कर दिया।


हज़रत अली (अ.स.) की खिलाफ़ते जाहेरी

पैग़म्बरे इस्लाम स. के इन्तेक़ाल के बाद हज़रत अली (अ.स.) गोशा नशीनी के आलम में फ़राएज़े मन्सबी अदा फ़रमाते रहे यहां तक कि खिलाफ़त के तीन दौरे इस्लाम की तक़दीर के चक्कर बन कर गुज़र गये और 35 ई0 में तख़्ते खिलाफ़त ख़ाली हो गया। 23, 24 साल की मुद्दते हालात को परखने और हक़ व बातिल के फ़ैसले के लिये काफ़ी होती हैं। बिल आखिर असहाब इस नतीजे पर पहुँचे कि तख़्ते ख़िलाफ़त हज़रत अली (अ.स.) को बिला शर्त हवाले कर देना चाहिये। चुनाचे असहाब का एक अज़ीम गिरोह हज़रत अली (अ.स.) की खिदमत में हाजिर हुआ । इस गिरोह में ईराक़, मिस्र, शाम, हिजाज़, फिलस्तीन और यमन के नुमाइन्दे शामिल थे। उन लोगों ने खिलाफ़त क़ुबूल करने की दरख्वास्त की ।

हज़रत अली (अ.स.) ने फ़रमाया मुझे इसकी तरफ़ रग़बत नहीं है तुम किसी और को ख़लीफ़ा बना लो। इब्ने ख़लदून का बयान है कि जब लोगों ने इस्लाम के अन्जाम से हज़रत को डराया, तो आपने रज़ा ज़ाहिर फ़रमाई । नहजुल बलाग़ा में है कि आपने फ़रमाया कि मैं ख़लीफ़ा हो जाऊंगा तो तुम्हे हुक्मे ख़ुदावन्दी मानना पड़ेगा। बहर हाल आपने जाहेरी खिलाफ़त क़ुबूल फ़रमा ली। मुसन्निफ़ बिरीफ़ सरवे लिखा है कि अली (अ.स.) 655 ई0 में तख़्ते खिलाफ़त पर बिठाए गये। जो हक़ीक़त के लेहाज़ से रसूल स. के बाद ही होना चाहिये था। (तारीख़े इस्लाम जिल्द 3 सफ़ा 26) रौज़ातुल अहबाब में है कि खिलाफ़ते ज़ाहिरया क़ुबूल करने के बाद आपने

जो पहला ख़ुतबा पढ़ा उसकी इब्तेदा इन लफ़्ज़ो से थी। अलहम्दो लिल्लाह अला एहसाना क़द रजअल हक़ अला मकानेह ख़ुदा का लाख लाख शुक्र और उसका एहसान है कि उसने हक़ को अपने मरकज़ और मकान पर फिर ला मौजूद किया । तारीखे इस्लाम और जामए अब्बासी में है कि 18 जिल्हिज्जा को हज़रत अली (अ. स.) ने खिलाफ़ते जाहेरी क़ुबूल फ़रमाई और 25 जिल्हिज्जा 35 हिजरी को बैयते आम्मा अमल में आई । इन्साइक्लोपीडिया बरटानिका में है कि जब मौहम्मद साहब स. ने इन्तेक़ाल फ़रमाया तो अली (अ.स.) में मज़हबे इस्लाम के मुसल्लम अल सुबूत सरदार होने के हुकूक़ मौजूद थे  656 हिजरी में अली (अ.स.) ख़लीफ़ा हो गये, अली (अ.स.) के अहदे खिलाफ़त में सब से पहला काम तलहा व जुबैर की बग़ावत को फ़रो करना था।

आपके पास ख़िलाफ़त की खिदमत उस वक़्त आई जब लोगों की नियतें फ़ासिद हो गईं थीं और इन्तेज़ामाते मुल्की और उसूली हुकूमत के मुताअल्लिक़ वालियो और मातहतों के दिलों में हिरस व लालच पैदा हो गई थी और इन सब से ज़्यादा लालची और मक्कार माविया इब्ने अबू सुफियान था क्योकि इसने अपनी हुकूमत जमाने के लिये लोगों को धोका फ़रेब दे कर उनके साथ मक्र व हीला कर के और मुसलमानों का माल बे दरेग़ लुटा कर लोगों को अपनी तरफ़ कर लिया था । (तारीख़ अल तमदुन अल इस्लामी 4 सफ़ा 37 प्रकाशित मिस्र)

फ़ाज़िल माअसर सैय्यद इब्ने हसन जारचावी लिखते हैं कि अगर अली (अ.स.) रसूल स. के बाद ही ख़लीफ़ा तसलीम कर लिये जाते तो दुनिया मिनहाजे रिसालत पर चलती और राहवारे सलतनत व हुकूमत दीने हक़ की शाहराह पर सरपट दौड़ता मगर मसलेहत और दूर अन्देशी के नाम से जो आइन व रूसूम हुकमरां जमाअत का जुज़वे जिन्दगी और औढना बिछोना बन गये थे, उन्होंने अली (अ.स.) की पोज़ीशन नाहमवार और उनका मौकफ़ ना इस्तेवार बना दिया था। पिछलों दौर की गैर इस्लामी रसमों और इम्तियाज़ पसन्द ज़ेहनियतों की इस्लाह करने में उनको बड़ी दिक़्क़त हुई और फिर भी खातिर ख़्वाह कामयाबी हासिल न हो सकी। तबीयते आदम मसावात की खूगर और माअशरती अदल से कोसों दूर हो चुकी थीं।

अली (अ.स.) ने बैअत के दूसरे रौज़ बैतुल माल का जायज़ा लिया और सब को बराबर तक़सीम कर दिया। हबशी गुलाम और कुरैशी सरदार दोनों को दो दोदिरहम मिले| इस पर पेशानी पर सिलवटें पड़ने लगीं। बनी उमय्या को इस दौर में अपनी दाल गलते नज़र न आई। कुछ माविया से जा मिले, कुछ उम्मुल मोमेनीन आयशा के पास मक्के जा पहुँचे। आसम कूफ़ी का बयान है कि आयशा हज से वापस आ रहीं थीं कि उन्हें क़त्ले उस्मान की ख़बर मिली। उन्होने निहायत इशतेयाक़ से पूछा कि अब कौन ख़लीफ़ा हुआ। कहा गया, अली यह सुन कर बिल्कुल ख़ामोश हुईं। अब्दुल्लाह इब्ने सलमा ने कहा, क्या आप उस्मान की मज़म्मत और अली (अ.स.) की तारीफ़ नहीं करती थीं, अब नाख़ुश का सबब क्या है? फ़रमाया आखिर वक़्त में उसने तौबा कर ली थी। अब उसका क़सास चाहती हूं। इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि आयशा ने ऐलान कराया कि जो शख़्स इस्लाम की हमदर्दी करना और ख़ूने उस्मान का बदला लेना चाहता हो और उसके पास सवारी न हो, वह आय उसे सवारी दी जायेगी ।

हज़रत अली (अ.स.) को एक दूसरी दिक़्क़त यह दरपेश थी कि सारा आलमे इस्लाम इन उमवी आमिलो और हाकिमों से तंग आ गया था जो हज़रत उस्मान के अहद में मामूर थे, अगर अली (अ.स.) उनको ब दस्तूर रहने देते तो हुकूमत के वजूद जमहूर को चैन न मिलता, और अगर हटाते हैं तो मुखालिफ़ों की तादाद में इज़ाफ़ा करते हैं। हुक्काम व आमिल मुद्दत से ख़ुदसरी के आदी और बैतूल माल



Huzoor ﷺ Ke 2 Phool Kon Hain*

*Huzoor ﷺ Ke 2 Phool Kon Hain*

Hazrat Abdur Rahman Bin Abi Nuaim Razi Allahu Tala Anhu Se Riwayat Hain Ek Iraqi Ne Hazrat Abdullah Bin Umar Razi Allahu Tala Anhu Se Poucha Ke Kapde Par Macchar Ka Khoon Lag Jaye To Kya Hukum Hain ? Hazrat Abdullah Bin Umar Razi Allahu Tala Anhu Ne Farmaya :- Iski Taraf Dekho Macchar Ke Khoon Ka Masla Pouchta Hain Halanke Inhone Nabi e Kareem ﷺ Ke Bete (Hazrat Imaam Hussain Alahis Salam) Ko Shaheed Kiya Hain Aur Mene Huzoor Nabi e Kareem ﷺ Ko Farmate Hu Suna :- Hasan Aur Hussain Hi To Mere Gulshan e Duniya Ke 2 Phool Hain.

📚 *Reference* 📚
*1.* Bukhari, As Sahih, Jild 5, Safa 2234, Kitab ul Adab, Hadees No 5648.
*2.* Tirmizi, Jame Al Sahih, Jild 5, Safa 657, Hadees No 3770.
*3.* Nasai, As Sunan Al Kubra, Jild 5, Safa 50, Hadees No 8530.
*4.* Ahmad Bin Hanbal, Al Musnad, Jild 2, Safa 93, Hadees No 5675.
*5.* Ahmad Bin Hanbal, Al Musnad, Jild 2, Safa 114, Hadees No 5940.
*6.* Abu Yala, Al Musnad, Jild 10, Safa 106, Hadees No 5739.
*7.* Tabrani, Al Muajjam Al Kabeer, Jild 3, Safa 127, Hadees No 2884.

Taziya jaiz hai

ताज़ियादारी न तो किसी बादशाह के शुरू करने से शुरू हुई है न किसी रज़ा खानी या वहाबी के बंद करने से बंद होगी ये वो रूहानी यादगार और पाकीज़ा अमल या फेल है जिसमे पाक पंजतन का फ़ैज़ शामिल है, जब अहमद रज़ा खान बरेलवी ने रिसाला ताज़ियादारी में लिखा के ताज़िया शिर्क व बिदअत है और ताज़ियादार जहन्नुमी कुत्ते हैं तो हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के तमाम सूफियों के दिल पर इक चोट सी लगी लिहाज़ा उस दौर के एक बहुत बड़े बुजुर्ग हस्ती(जिन से इफ्तेखारिया सिलसिला मनसूब है ) सूफी हज़रत मौलाना इफ्तेखारुलहक़ सुम्मुल कलकतवी र.अ. ने action लेते हुवे किताब जवाज़े ताज़िया तहरीर की जिस में ताज़िया व ताज़ियादारी को तमाम दलीलों से सही व जायज़ साबित कर दिया,जब जवाज़े ताज़िया का अहमद रज़ा खान से जवाब नहीं बन पड़ा तो अपनी तक़रीरों और तहरीरों के ज़रिए हज़रत मौलाना इफ़्तेख़ारुलहक़ र.अ. को भला बुरा कहने लगे यहां तक के बद ज़बानी पर भी उतर आए तब  हज़रत मौलान इफ्तेखारुलहक़ र.अ. ने एक किताब तहरीर की जिसका नाम हामिज़ुन असनान है उस किताब में सिर्फ कलमा लाइलाह इल्लल्लाह पर 79 सवाल किये और सफ़हये अव्वल पर लिखा के ख़सुसन(ख़ास तौर से) अहमद रज़ा खान बरेलवी और अमूमन( आम तौर से ) दुनिया के तमाम ओलेमा अगर इल्म रखते हैं तो मेरे सवालों का जवाब दें अगर जवाब न बन पड़े तो आइंदा किसी सूफी से उलझने की कोशिश ना करें जब किताब मन्ज़रे आम पर आई तो अहमद रज़ा खान के साथ सभी मसलक के ओलेमा को सांप सूंघ गेया न किसी से जवाब बन पड़ा और ना ही किसी ने जवाब दिया अहमद रज़ा खान का सारा इल्म धरा का धरा रह गेया अगर रज़ा खानियों को लगता है के जवाब अब भी दिया जा सकता है तो किताब मौजूद है उस वक़्त न सही अब सही.

      इमसाल रज़ाखानी ओलमा ताज़िया शरीफ बन्द कराने के लिये छोटा बड़ा गरोह बनाकर मैदान में उतरे हुए थे जगह जगह जहां ताज़िये बनाये जारहे थे जाकर उन्हें रोका जा रहा था, ऐसा नहीं के उनकी ये कोशिश किसी एक शहर के लिए थी बलके उनका ये मुहिम पूरे हिंदुस्तान में चल रहा था इस मुहिम के ज़रिए जहां वो लोग सूफियों के अक़ाएद पर हमला आवर थे वहीं जनाब सरवर चिश्ती और जनाब कामरान चिश्ती साहबान अजमेर की तहरीक और पैग़ाम को नाकाम व बे असर भी करना चाहते थे मगर नतीजा इसके  बरअक्स निकला यानी लोगों में ताज़ियादारी के लिए इस क़दर जोश व जज़्बा पैदा हुआ के ताज़िया की तादाद पहले से कहीं ज़्यादा हो गई, अब रज़ा खानी ओलमा कह रहे हैं के अहमद रज़ा खान ने ताज़िया की मुखालिफत नहीं कि है वो ताज़िया को जायज़ समझते थे, अगर ऐसी बात है तो रज़ाखानी हज़रात अपने मरकज़ी एदारा बरेली से एलान करें के ताज़िया जाएज़ ही नहीं हर उम्मते मोहम्मदिया के लिए ज़रूरी भी है जिस में अना मिनल हुसैन का राज़ पोशीदा है और ये भी एलान करें के अबु सुफियान, हिन्दा, और मोआविया से बेज़ारी ज़ाहिर करते हुए हुज़ूर स.अ. के चचा हज़रत अबू तालिब अलैहिस्सलाम के ईमान पर ईमान रखते हैं अगर ऐसा होता है तब हम सुन्नी सूफी कुछ सोच सकते हैं अगर ऐसा नहीं होता है तो उनका हर क़ौल व फ़ेल फरेब समझा जाएगा.
                  
                    

          बेदम यही तो पांच हैं मक़सूदे कायनात
          खैरुन्निसा, हुसैनो, हसन,मुस्तफा,अली

जो लोग कहते हैं कि ग़म ए हुसैन अलैहिस्सलाम क्यों मनाते हों،सोग तो सिर्फ तीन दिन का होता है उनको बताता चलूं कि मौला मुहम्मद ﷺ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कि  शहादत के बाद मौला मुहम्मद ﷺ  ग़म ए हुसैन अलैहिस्सलाम से हालत क्या थी

मुलाहिजा फरमाएं “बुखारी” के उस्ताद “अहमद बिन हमबल रदी अल्लाहू अनहू ने अपनी मुसनद में सहीह रिवायत दर्ज की है 👇👇👇
۔ (۱۲۴۲۳)۔ عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ قَالَ: رَأَیْتُ النَّبِیَّ صَلَّی اللّٰہُ عَلَیْہِ وَسَلَّمَ فِیمَایَرَی النَّائِمُ بِنِصْفِ النَّہَارِ وَہُوَ قَائِمٌ أَشْعَثُ أَغْبَرُ، بِیَدِہِ قَارُورَۃٌ فِیہَا دَمٌ، فَقُلْتُ: بِأَبِی أَنْتَ وَأُمِّییَا رَسُولَ اللّٰہِ، مَا ہٰذَا؟ قَالَ: ((ہٰذَا دَمُ الْحُسَیْنِ وَأَصْحَابِہِ۔)) لَمْ أَزَلْ أَلْتَقِطُہُ مُنْذُ الْیَوْمِ، فَأَحْصَیْنَا ذٰلِکَ الْیَوْمَ، فَوَجَدُوہُ قُتِلَ فِی ذٰلِکَ الْیَوْمِ۔ (مسند احمد: ۲۵۵۳)

सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदी अल्लाहू अनहू से रिवायत है,,वह कहते हैं कि:-
मेने दोपहर के वक्त ख्वाब में नबी करीम ﷺ को देखा कि आप रसूल अल्लाह ﷺ खड़े थे और आप रसूल अल्लाह ﷺ के सर के बाल बिखरे हुए और गुबार आलूद है और आप के हाथ में एक शीशी है जिस में खून था-
मेंने कहा: ए अल्लाह के रसूल ﷺ मेरे मां बाप आप पर फिदा हो,,,ये क्या हैं?
आप मौला मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया ये हुसैन और उसके साथियों का खून है,,,जिसे मैं आज जमा कर रहा हूं –
हम ने उस दिन का हिसाब लगाया तो वह वहीं दिन था जिस दिन सैय्यदना हुसैन अलैहिस्सलाम शहीद हुए थे

Musnad Ahmed#12423
کتاب الفضائل

ग़म ए हुसैन अलैहिस्सलाम

ग़म ए हुसैन अलैहिस्सलाम

✍️ अहले सुन्नत की मशहूर और मोतबर किताब ‘कंजुल-उम्माल’ के जिल्द नं 15 के सफा नं 312 पर हदीस नं 42908 में इमाम मुत्तक़ी हिंदी ने हजरत अब्दुल्ला बिन अकरमह से रिवायत किया है कि-
“लोगों की बात पर ताज्जुब है कि हजरत उमर बिन खत्ताब रजि. ने नोहा करने से मना किया फ़रमाया जबकि खालिद बिन वलीद पर मक्का और मदीना में बनी मुगैरा की औरतें सात दिन रोती रहीं, उन्होंने गिरेबान चाक किए, चेहरों पर मारा और लोगों को इन अयाम में खाना खिलाया। यहां तक कि वो दिन गुजर गए- हज़रत उमर रजि. उन्हें मना नहीं करते थे।”
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अगर खालिद बिन वलीद पर हफ्तों तक नोहा, गिरया करने पर कोई आपत्ति नहीं तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ग़म मनाने पर पाबंदी क्युं.??
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ग़म ए हुसैन अलेहिस्लाम
जो आँख हमारे ग़म में रोई या एक कतरा आँसू हमारे लिए गिराया अल्लाह उसे बहिश्त(ज़न्नत) अता करेगा
📚फजायल ए सहाबा ईमाम अहमद बिन हम्बल जिल्द 2 सफ़ह 675, हदीस 1154

*_﷽_*
*_ए महबूब तुम फरमाओ मैं तुम्हें तबलीगे के दिन अजरे रिसालत का कोई मुआबजा नहीं चाहता बस यही कि मेरे कराबतदार (अहलेबैतع हुजूरﷺ के घरवाले ) से मवद्दत करो_*
_📔पारा 26 सुराह शूअरा आयत नं 23_

*_कुरआन ए पाक मैं अल्लाह रब्बुल इज्जत ने अहलेबैतع की मोहब्बत को फर्ज करार दिया है आज से 1400 साल पहले उम्मत ने मौला हुसैनع को और उनके  तमाम घरवालों को शहीद किया क्या ए अजरे रिसालत है और आज का मुसलमान मौला हुसैनع और अहलेबैतع के जिक्र से चढ़ता है उनके जिक्र को रोकता है और क्या अजरे रिसालत है जो लोग अनजाने में नए साल की मुबारकबाद देते हैं उन्हें हुजूरﷺ की हदीसे मुबारक का पढ़नी चाहिए की हुजूरﷺ ने इमाम हसनع और इमाम हुसैनع के बारे में क्या फरमाया है और जो लोग जानबूझकर नए साल की मुबारकबाद देते हैं उनका शजरा यजीद लानती से मिलता है_*

_शाह  ए  ग़म  ए हुसैन अलैहिस्सलाम_
_कहता है मुसलमान नया साल मुबारक_
*_आवाज़ ये आई गम में है नानाﷺ हुसैनع के_*
*_क्यो दिल में हो खुशी नये साल की इकबाल_*
_जैनबس मना रही गम हुसैनع का_ 
  *_सलाम माह ए  मुहर्रम_* 
_सलाम 72शहीदान ए कर्बला_
*_अस्सलाम या अब़ा अब्दील्लाह-अल हुसैनع_*

Allama Ibn Jawzi Farmate Hain, Jab Sayyedna Abbas Ko Badr Waale Din Qaid Kiya Gaya Aur Rasoolullah (ﷺ) Ne Unke Karahne Ki Awaaz Suni Toh Aap So Na Sake, Us Waqt Kya Aalam Hoga Jab Rasoolullah (ﷺ) Ne Sayyedna Imam Hussain Ke Karahne Ki Awaz Suni Hogi.

Jab Sayyedna Hamza Ke Qatil Wahshi Ne Islam Qubul Kiya Toh Aap (ﷺ) Ne Usse Farmaya Apna Chehra Mere Samne Na Laya Karo, Bakhuda! Musalmaan Se Jo Kuch Halate Kufr Mein Hua Uska Muwakhaza Nahi Kiya Jaata, Toh Rasoolullah (ﷺ) Imam Hussain Ke Qatil Ko Kaise Dekh Sakenge?

Tasawwur Kijiye Jab Rasoolullah (ﷺ) Un Logo’n Ko Dekhnenge Jinhone Aapke Ladle Hussain Ko Zabah Kiya, Unhein Qatl Karne Ka Hukm Diya, Aur Ahle Bait Ko Kajawon Ke Baghair Oonto’n Ki Nangi Zinon Par Rassiyo’n Mein Jakad Kar Sawar Kiya Aur Rasoolullah (ﷺ) Ki Betiyo’n Ko Be-Hijab Kiya Toh Aapke Dil Ki Kaifiyat Kya Huyi Hogi.

(At-Tabsirah, Ibn Jawzi, Safah-17)
(Sawaiq al-Muhriqah, Safah-194,195)

*885 Saal Purane Buzurgh Silsila e Qadriya Ke Imaam Auliya Allah Ke Sardar Peero Ke Peer Huzoor Ghous ul Aazam Shaikh Sayyed Abdul Qadir Jilani Razi Allahu Tala Anhu Apni Kitaab Guniyatut Talibeen Me Gham e Hussain Me Farishto Ke Rone Se Mutalliq Ek Riwayat Naqal Karte Hain* 👇🏻

Hazrat Osama Razi Allahu Tala Anhu Hazrat Imaam Jafar Sadiq Alaihis Salam Se Riwayat Farmate Hain Ke :- Jis Din Hazrat Imaam Hussain Alaihis Salam Shaheed Hue Us Din Se 70,000 (70 Hazaar) Farishte Qayamat Tak Rote Rahenge.

📚 *Reference* 📚
*1.* Guniyatut Talibeen, Safa 432.
*2.* Sham e Karbala, Safa 235.

*Ab Pouchna Ye Tha Un Farishto Par Bhi Shia/Rafzi Ka Fatwa Lagega Ya Wo Sunni Hi Rahenge ?*

इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने हुरमत काबा शरीफ के लिए कर्बला मोअल्ला की हिजरत की

इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने हुरमत काबा शरीफ के लिए कर्बला मोअल्ला की हिजरत की ,

▪ इमाम तबरानी ने रिवायत नकल किया है की _

अब्दुल्लाह बिन अब्बास (राजी अल्लाह अन्हो) फरमाते हैं कि हुसैन (राजी अल्लाह अन्हो) ने मुझसे (कूफा की तरफ) रवानगी की इजाजत तलब की तो मैंने कहा- अगर मेरी और आपकी शान के खिलाफ ना होता तो मैं आपको मजबूती से पकड़कर रखता। अब्दुल्लाह बिन अब्बास (राजी अल्लाह अन्हो) कहते हैं कि इस पर हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने जवाब दिया कि मैं फुलां फुलां मुकाम पर कत्ल कर दिया जाऊंगा- ये मेरे नजदीक इस बात से ज्यादा बेहतर है कि मेरी वजह से मक्के की हुरमत पामाल हो।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं कि यह बात कहकर हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने मुझे मुतमाईन (संतुष्ट) कर दिया।
      – इमाम तबरानी, मुअज्जमल कबीर, 3/119, सनद सही.

इमाम हैसमी ने मजमुअल जवाएद में रकम नं 15131 के तहत इमाम तबरानी की उसी रिवायत को लिखकर तखरीज की है कि इसके सभी रावी सिकह यानी सच्चे हैं।

मुअज्मल कबीर, इमाम तबरानी, रकम नं 2790.
वही रिवायत है दीगर दूसरी किताबो  में ली गई है

रिवायत से पता चला की इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) को पता था की मक्का में जबरदस्ती  बैअत ली जाएगी या शहीद कर दिया जायेगा । इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने ये पसंद न फरमाया की काबा की हुरमत पमाल हो इस लिए आप ने वहा से हिजरत की और जैसा आप ने सोचा था वही याज़ीद ने किया की इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) के पूरे घर को जुलमन कर्बला में शहीद करवा दिया,,,

Note:– अब कोई ये ना कहे की इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) को धोखे से कूफा बुलाया गया था और इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) उनके नवासे है जिनके नाना मोहम्मद मुस्तफा (सल,अल्लाहो अलैहे व अलैहि व सल्लम) के पास इल्म ए गैब था और रसूल अल्लाह (सल,अल्लाहो अलैहे व अलैहि व सल्लम) ने पहले ही इसकी पेसनगोही करदी थी की इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) को केसे शहीद कर दिया जाएगा और जो ये मौलवी चिला चिला कर कहते है माइक पर की इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) को धोखे से कुफा बुलाया गया वो दर हकीकत मौला इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की शान ए पाक को (घाटा) ने का काम करते है और सारा कसूर कुफा वाले पर डाल कर यजीद लानती को और यजीद से बैत करने वालो को बचाना के काम करते है