
Rukhsati Syeda Fatima (A.S).






आपका ज़ोहद व तक़वा
मिस्र के मशहूर मोरिख़ अल्लामा जरजी ज़ैदान लिखते हैं कि अली (अ.स.) की हालत क्या बयान हो। ज़ोहद और तक़वे के मुताअल्लिक़ आपके वायात बहुत कसरत से हैं। उसूले इस्लाम की पाबन्दी करने में आप बहुत सख़्त और अपने हर क़ौलो फ़ेल में निहायत शरीफ़ व आज़ाद थे। जाल, फ़रेब, धोका, मक्र को आप जानते तक न थे और अपनी जिन्दगी के मुख्तलिफ़ ज़मानों से किसी हालत में भी आपने चाल, हीला, ग़द्दारी वग़ैरा की तरफ़ ज़र्रा बराबर भी रूख़ न किया। आपकी तमाम तर तवज्जे महज़ दीन के मुताअल्लिक़ रहती थी और आपका कुल एतेमाद और भरोसा सिर्फ़ सच्चाई और हक़ पर था। चुनान्चे आपके जोहद और फ़क़ीराना जिन्दगी की मिसालों में से एक यह भी है कि आपने जिस वक़्त रसूल स. की बेटी फ़ात्मा (स.अ.) से शादी की तो आपके पास फ़र्श की किस्म से कोई चीज़ नहीं थी
सिवाय दुम्बे की एक खाल के कि उसी पर दोनों शब में पड़ कर सो रहते थे और दिन के वक़्त इसी चमड़े पर अपने ऊँट को दाना खिलाते थे। आपके पास एक मुलाजिम भी न था जो आपकी खिदमत करता। आपकी खिलाफ़ते जाहेरी के ज़माने में एक दफ़ा असफ़हान के (ख़राज) का माल आया तो आपने उसको सात हिस्सों पर तक़सीम कर दिया फिर उसमें एक रोटी मिली तो उसके भी सात टुकड़े किये। आप ऐसे कपड़ों का लिबास पहनते थे जो सर्दी से ज़रा भी महफ़ूज़ नहीं रख सकता था। बाज़ लोगों ने आपको देखा कि अपने ओढ़ने की चादर में खजूरें उठा कर खुद ला रहे हैं जिनको एक दिरहम में खरीदा था। यह देख कर अर्ज़ कि ऐ अमीरुल मोमेनीन यह हमें दे दें ताके हम पहुँचा दें। आपने जवाब दिया कि जिसके अयाल हैं उन्हीं को उनका बोझ उठाना चाहिये। आपके ज़र्री अक़वाल से यह भी है कि मुसलमान को चाहिये कि इतना कम खाएं कि भूख से उनके पेट हल्के रहें और इतना कम पियें कि प्यास से उनके पेट सूखे रहें और खुदा के ख़ौफ़ से इतना रोयें कि उनकी आंखें ज़ख़्मी रहें।
(तारीख़े तमददुने इस्लामी, जिल्द 4 पृष्ठ 37 व तारीख़े कामिल जिल्द 3 पृष्ठ 204)
आपकी सही राय
आप की राय इतनी सही थी कि कभी लग़जिश नहीं हुई। जिसको जो मशवेरा दे दिया वह अटल साबित हुआ । अल्लामा इब्ने अबिल हदीद शरह नहजुल बलाग़ह में लिखते हैं कि तमाम लोगों से ज़्यादा हज़रत अली (अ.स.) की राय साएब और मोहकम व सही हुआ करती थी और आपकी तदबीर तमाम लोगों की तदबीरों से बलन्द व बरतर होती थी अलबत्ता आप इसी मामले में राय देते थे जो शरीयत के मुताबिक़ और इस्लाम की रौशनी में हो यानी ग़लत उमूर में आपका कोई मशवेरा न था।
आपकी सियासत
अल्लामा इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं काना शदीद अल सियासत खशनन फ़ी जात अल्लाह आप बे नज़ीर सियासी थे। आप की सियासत उन लोगों जैसी न थी जो दीन और ख़ुदा को पहचानते नहीं। आप की सियासत हुक्मे खुदा व रसूल स. की मिसाल हुआ करती थी। आप अल्लाह की ज़ात के बारे में निहायत ही सख़्त और शदीद अल अमल थे। इस सिलसिले में उन्होंने कभी अपने भाई तक की परवाह नहीं की। अक़ील और इब्ने अब्बास की नाराज़गी मशहूर है। ( सवाएके मोहर्रेका)
हिल्म, सदाक़त, अदल
ख़ालिद इब्नल अमीर का बयान है कि मैं अली (अ.स.) को तीन बातों की वजह से महबूब रखता
1. यह कि जब वह ख़फ़ा होते थे तो मुकम्मल इल्म का इस्तेमाल करते थे। 2. जो बात कहते थे सच कहते थे।
3. जो फ़ैसला करते थे पूरे अदल के साथ करते थे।
माअक़ल इब्नुल यसार का बयान है कि सरवरे कायनात स. ने एक दिन फात्मा ज़हरा स. से फ़रमाया कि मैंने तुम्हारी शादी बहुत बड़े आलिम और उम्मत में सब से बड़े ईमानदार और अज़ीम तरीन हिल्म करने वाले अली से की है। (अरजहुल मतालिब पृष्ठ 202)
मौला ए कायनात हज़रत अली(अ.स.) के बाज़ करामात यह मुसल्लम है कि मौला ए कायनात, मुशकिल कुशा, आलिम, हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ. स.) मज़हरूल अजाएब वल ग़राएब थे। ख़िल्क़ते जाहेरी से क़ब्ल अम्बिया (अ.स.) की मद्द करना, सलमाने फ़ारसी को दश्त अरज़न में शेर से छुड़ाना और ज़हूरो शहूद के बाद एक शब में चालीस जगह बयक वक़्त दावत में शिरकत करना, दुनिया के हर गोशे में आपके क़दम के निशानात का पत्थर पर मौजूद होना । ग़ारे असहाबे कहफ़ में निशाने क़दम का मौजूद होना। काबुल में
मज़ारे सख़ी का वजूद और दीगर निशानात का मौजूद होना । तूरे ख़ुम के क़रीब मस्जिदे अली की तामीर पेशावर में असाए शाहे मरदां की जियारत गाह का होना । ‘ कोटा के रास्ते में क़दम के निशानात का पाया जाना । हैदराबाद में क़दम गाह मौला अली का होना। आलम में हर शख़्स की मुश्किल कुशाई का हो जाना। नीज़ बाबे ख़ैबर का उखाड़ना । रसूल करीम स. की आवाज़ पर चश्मे ज़दन में पहुच जाना। चादर पर बैठ कर ग़ारे असहाबे कहफ़ तक जाना और उनसे कलाम करना वग़ैरा वग़ैरा आपके मजहरूल अजाएब वल ग़राएब होने का बय्यन सुबूत है। हम ज़ैल में किताब (इमामे मुबीन ) से वाक़ेयात का खुलासा दर्ज करते हैं।