चौदह सितारे पार्ट 44

18 जिल्हिज्जा

अल्लामा जलाल उद्दीन स्यूती ने लिखा है कि हज़रत उमर ने इस तारीख़ को यौमे ईद क़रार दिया है। रईसुल उलेमा हज़रत अल्लामा बहावुद्दीन आमेली तहरीर फ़रमाते हैं कि सरवरे कायनात स. की विलादत से 4 साल बाद 18 जिल्हिज्जा 10 हिजरी को हज़रत अली (अ.स.) की जांनशीनी अमल में आई और आपके इमाम अल इन्सो जिन होने का ऐलान किया गया और इसी तारीख़ 34 हिजरी में हज़रते उस्मान क़त्ल हुए और हज़रत अली (अ.स.) की बैअत की गई। इसी तारीख़ हज़रते मूसा (अ.स.) साहिरों पर ग़ालिब आये और हज़रते इब्राहीम (अ.स.) को आग से नजात मिली और इसी तारीख़ को हज़रते मूसा (अ. स.) ने जनाबे यूशा इब्ने नून को, हज़रते सुलैमान ने जनाबे आसिफ़ इब्ने बरखिया को अपना जांनशीन मुक़र्रर किया और इसी तारीख़ को तमाम अम्बिया ने अपने जांनशीन मुक़र्रर फ़रमाए ।

( जामेए अब्बासी या नज़द वबाबी पृष्ठ 58, 1914 ई0 देहली में छपा व इख़्तेयारात मजलिसी रहमतउल्लाह इलैह )

दस्तावेज़े खिलाफ़त

सरवरे कायनात स. ने इब्तेदाए इस्लाम से ले कर जिन्दगी के आखिरी दिनों तक हज़रत अली (अ.स.) की जांनशीनी का बार बार मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ व उन्वान से ऐलान करने के बाद वफ़ात के वक़्त यह चाहा कि उसे दस्तावेज़ी शक्ल दे दें लेकिन हज़रत उमर ने बनी बनाई इस्कीम के तहत रसूले करीम स. को कामयाब न होने दिया और उनके आखिरी फ़रमान ( क़लम दवात की तलबी) को बकवास और हिज़यान से ताबीर कर के उन्हें मायूस कर दिया जिसके मुताअल्लिक़ आपका ख़ुद बयान है कि जब आं हज़रत स. ने वक़्ते आखिर मरज़ुल मौत में हक़ को छोड़ कर बातिल की तरफ़ जाना चाहा ताके अली (अ.स.) की सराहत कर दें तो ख़ुदा की क़सम मैंने आं हज़रत स. को मना कर दिया और आं हज़रत स. अली (अ. स.) के नाम को तहरीरन ज़ाहिर न कर सके।

(तारीख़े बग़दाद व शरह इब्ने अबिल हदीद, जिल्द 1 पृष्ठ 51 तेहरान में छपी )

इमामें ग़ज़ाली फ़रमाते हैं कि रसूल अल्लाह स. ने अपनी वफ़ात से पहले असहाब से कहा कि मुझे क़लम दवात और काग़ज़ दे दो। ला ज़ैल अनकुम इशक़ाल अल मरज़ा जिक्र लकुम मिनल मुस्तहक़ बादी काला उमरा औ अल रजल फ़ाना हजर ताके मैं तुम्हारे लिये इमारत व खिलाफ़त की मुश्किलात को तहरीरन दूर कर दूँ कि मेरे बाद इमारत व खिलाफ़त का मुस्तहक़ कौन है। मगर हज़रत उमर ने उस वक़्त यह कह दिया कि इस मर्द को छोड़ दो यह हिज़यान बक रहा है और बकवास कर रहा है। (माअज़ अल्लाह)

मुलाज़ा हो :-

(सेरा आलेमीन बम्बई में छपी, पृष्ठ 9, सतर 15 किताब अल शिफ़ा, काज़ी अयाज़, बरेली में छपी, पृष्ठ 308 व नसीम अल रियाज़ शरह शिफ़ा, शरह मिश्क़ात, मोहद्दिस देहलवी व मदारिजे नबूवत, हबीब अल सैर जिल्द 1 पृष्ठ 144, रौज़तुल अहबाब जिल्द 1 पृष्ठ 550, बुखारी जिल्द 6 पृष्ठ 656, अल फ़ारूक़ जिल्द 2 पृष्ठ 48)