घर वालों में और दर वालों में फ़र्क़

घर वालों में और दर वालों में फ़र्क़ है साहेब…जब तक ये नही समझोगे तब तक मीठे मीठे मरवानियों नासबियों के धोखे से बच नही पाओगे

* हुज़ूर ﷺ के घर वाले वो हैं जिन पर नमाज़ में दर वाले भी दुरूद ओ सलाम पढ़ते हैं

* सहाबा केराम ये फ़र्क़ जानते थे सहाबा की पूरी जमआत में किसी एक सहाबी की कभी जुर्रत नही पड़ी के वो कह सके मैं रसूलुल्लाह ﷺ के घर वालों में से हूं

घर वालों से #बेहतर हूं ये कहना तो दूर की बात

बल्कि सहाबा केराम दर वाला होने पर ही फ़ख़र् करते थे

सहीह बुख़ारी में है हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ फ़रमाते हैं : “रसूलुल्लाह ﷺ की मुहब्बत को रसूलुल्लाह ﷺ के अहलेबैत में तलाश करो”

हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ ने फ़ैसला दे दिया “घर वाला बनने की कोशिश मत करो बल्कि रसुलुल्लाह ﷺ की मुहब्बत चाहते हो तो रसुलुल्लाह ﷺ के घर वालों से मुहब्बत करो”

अगर अहलेबैत से मुहब्बत नही अहलेबैत का हया नही तो तुम कुछ भी नही

इसी तरह हज़रत उमर का फ़रमान सही सनद से मौजूद है
जब हज़रत उमर माले ग़नीमत तक़सीम फ़रमा रहे थे तो आप ने सैय्यदना इमामे हसन और इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम को माल ए ग़नीमत का ज़्यादा हिस्सा दिया और अपने बेटे अब्दुल्लाह इब्ने उमर को एक हिस्सा दिया अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने इस पर सवाल किया अब्बा जान आप ने ऐसा क्यों किया तो हज़रत उमर बिन ख़त्ताब ने जवाब दिया

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* तुम उन जैसे नही (वो रसुलुल्लाह ﷺ के घर वाले हैं और तुम दर वाले)

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