Month: May 2024
Hazrat Sultan Bahu Ki Nazar Main Mureed Kon Hota Hai | Mureed Ki Iqsam
चौदह सितारे पार्ट 29

उम्मुल आइम्मा हज़रत फातेमा ज़हरा (स.अ) ख़ातूने जन्नत
ख़दीजा को मिला बेटी, नबी को बिज़अतो मिन्नी
हुई तकमीले तबलीग़ अमल तन्ज़ीमे ईमां में
रिसालत आमदे ज़हरा पा, यह एलान करती है
करेंगी फातेमा (स.अ), कारे रिसालत सिन्फ़े निस्वां में
जलवा नुमा ए शम्मे हक़ीक़त हैं फातेमा |
आइना ए कमाले नबूवत हैं, फातेमा ।।
यह मानता हूं इनको रिसालत नहीं मिली।
लेकिन, शरीके कारे रिसालत हैं फातेमा । ।
हज़रत फातेमा (स.अ), पैग़म्बरे इस्माल हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ( स.व.व.अ.) और जनाबे ख़दीजातुल कुबरा की इकलौती बेटी हज़रत अली अ0 की रफ़ीक़ा ए हयात और इमाम हसन (अ. स.) व इमामे हुसैन (अ. स.) जनाबे ज़ैनब व उम्मे कुलसूम की मादरे गिरामी और नौ, (9) इमामों की जद्दे माजेदा थीं। आपकी मशहूर कुन्नियत उम्ममुल आइम्मा, उम्मुल हसनैन और इमाम अल सिबतैन थी । मशहूर अलक़ाब ज़हरा व सय्यातुलनिस्सां थे। एक रवायत में है कि आपकी
कुन्नियत उम्मे अबीहा भी थी जो मेरे नज़दीक़ यह उम्मे इब्नीहा है यानी हसन व हुसैन की माँ ।
आप की विलादत
आप का नूरे वजूद नूरे रिसालत ( स.व.व.अ.) के साथ ख़िलक़ते कायनात से बहुत पहले पैदा हो चुका था। अलबत्ता आपके ज़ाहिरी नमूद व शहूद के लिए उलमा ने लिखा है कि आप मेराजे रिसालत मआब ( स.व.व.अ.) के बाद 5 बैअसत में तारीख़ 20 जमादुस्सानी जुमे के दिन मक्का मोअज़्ज़मा में पैदा हुईं। आप का साले विलादत आमुल फ़ील के लिहाज़ से 46 और इसवी नुक़्ताये निगाह से 614, 615 ई0 था। आपकी विलादत के वक़्त जन्नत से हूरों और आसिया बिन्ते मज़ाहम, मरयम बिन्ते इमरान, सफ़रा बिन्ते शुऐब, कुल्सूम हमशीरा ए, मूसा का आना किताबों से साबित है। जनाबे ख़दीजा का बयान है कि चूंकि मैंने अपने क़बीले के मनशा के बर ख़िलाफ़ सरवरे काएनात से शादी कर ली थी, इस लिए मेरी क़ौम ने मेरा बाईकाट कर दिया था। मैंने विलादत के वक़्त हसबे दस्तूर इत्तेला दी लेकिन कोई न आया। अल्लाह की रहमत शामिले हाल हुई, हूरों और पाक बीबीयों ने क़ाबला और दाया का काम किया बच्ची पैदा हुई। हुज्जतुल आलमीन का घर बुक़्क़ा ए नूर बन गया ।
(तारीख़े ख़मीस जिल्द 1 स. 313 व दम ए साढ़ेबा पृष्ठ 53 )
आप का इकलौती बेटी होना
मुनाबि इब्ने शहर आशोब में है कि जनाबे ख़दीजा के साथ जब आं हज़रत (स.व.व.अ.) की शादी हुई तो आप बाकरह थीं। यह तसलीम शुदा अमर है कि क़ासिम अब्दुल्ला यानी तैय्यब व ताहिर और फातेमा ज़हरा बतने ख़दीजा से रसूले इस्लाम की औलाद थीं। इस में इख़्तेलाफ़ है कि ज़ैनब, रूकय्या, उम्मे कुल्सूम, आं हज़रत की लड़कियां थीं या नहीं, यह मुसल्लम है कि यह लड़कियां ज़हूरे इस्लाम से क़ब्ल काफ़िरों अतबा, पिसराने अबू लहब और अबू आस, इब्ने रबी के साथ ब्याही थीं। जैसा कि मवाहिबे लदुनिया जिल्द 1 स. 197 मुद्रित मिस्र व मुरव्वज उज ज़हब मसूदी जिल्द 2 स. 298 मुद्रित मिस्र से वाज़े है। यह माना नहीं जा सकता कि रसूले इस्लाम अपनी लड़कियों को काफ़रों के साथ ब्याह देते। लेहाज़ा यह माने बग़ैर चारा नहीं है कि यह औरतें हाला बिन्ते ख़वैला हमशीर जनाबे ख़दीजा की बेटियां थीं। इन के बाप का नाम अबू लहनद था। जैसा कि अल्लामा मोतमिद बदख़शानी ने मरजा उल अनस, में लिखा है। यह वाकेया है कि यह लड़कियां ज़माना ए कुफ़ में हाला और अबू लहनद में बाहमी चपकलिश की वजह से जनाबे ख़दीजा के ज़ेरे केफ़ालत और तहते तरबीयत रहीं और हाला के मरने के बाद मुतलक़न उन्हीं के साथ हो गईं और ख़दीजा की बेटी कहलाईं। इसके बाद बा ज़रिया ए जनाबे ख़दीजा आं हज़रत से मुनसलिक हो कर उसी तरह रसूल ( स.व.व.अ.) की बेटियां कहलाईं। जिस तरह जनाबे जैद मुहावरा अरब के मुताबिक़ रसूल के बेटे कहलाते थे। मेरे नज़दीक इन औरतों के शौहर मुताबिक़ दस्तूरे अरब के मुताबिक़ दामादे रसूल कहे जाने का हक़ रखते हैं। यह किसी तरह नहीं माना जा सकता कि रसूल की सुलबी बेटियां थीं क्यों कि हुज़ूरे सरवरे आलम (स.व.व.अ.) का निकाह जब बीबी ख़दीजा से हुआ था तो आपके ऐलाने नबूवत से पहले इन लड़कियों का निकाह मुशरिकों से हो चुका था और हुज़ूर सरकारे दो आलम का निकाह 25 साल के सिन में ख़दीजा से हुआ और 30 साल तक कोई औलाद नहीं हुई और चालीस साल के सिन में आपने ऐलाने नबूवत फ़रमाया और इन लड़कियों का निकाह मुशरिकों से आप की चालीस साल की उम्र से पहले हो चुका था, और इस दस साल के अर्से में आपके फ़रज़न्द का भी पैदा होना और तीन लड़कियों का पैदा होना तहरीर किया गया है। जैसा कि मदारिज अल नबूवत में तफ़सील मौजूद है। भला ग़ौर तो कीजिए की दस साल की उमर में चार, पांच औलादें भी पैदा हो गईं और इतनी उमर भी हो गई के निकाह मुशरिक़ों से हो गया। क्या यह अक़ल व फ़हम में आने वाली बात है कि चार साल की लड़कियों का निकाह मुशरिक़ों से हो गया और हज़रत उस्मान से भी एक लड़की का निकाह हालते शिर्क ही में हो गया। जैसा कि मदारिज अल नबूवत में मज़कूर है। इस हक़ीक़त पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि लड़कियां हुज़ूर की न थीं बल्कि हाला ही की थीं और इस उम्र में थीं कि इनका निकाह मुशरिकों से हो गया था ।
Masala e Afzaliyat | Mufakir e islam Pir Syed Abdul Qadir Shah Jelani.
Syedina Imam Jaffar Sadiq A.S


