चौदह सितारे पार्ट 18

5 हिजरी के अहम वाक़यात

जंगे ख़न्दक़ इस जंग को ग़ज़वाए अहज़ाब भी कहते हैं। यह जंग ज़ीकाद 5 हिजरी में वाक़े हुई । इसकी तफ़सील के मुतालुक़ अरबाबे तवारीख़ लिखते हैं कि मदीने से निकाले हुए बनी नुज़ैर के यहूदी जो ख़ैबर में ठहरे हुए थे वह शब व रोज़ और सुबह शाम मुसलमानों से बदला लेने के लिये इसकीमे बनाया करते थे। वह चाहते थे की कोई ऐसी शक्ल पैदा हो जाए कि जिससे मुसलमानों का तुखम तक न रहे। चुनान्चे उसमें से कुछ लोग मक्का चले गये और अबू सुफ़ियान को बुला कर बनी ग़तफ़ान और क़ैस से रिश्तए अख़ूवत क़ाएम कर लिया और एक मोआहेदे में यह तय किया कि हर क़बीले के सूरमा इकठ्ठा हो कर मदीने पर हमला करें ताकि इस्लाम की बढ़ती हुई ताक़त का क़ला क़मा हो जाए। स्कीम मुकम्मल होने के बाद इसको अमली जामा पहनाने के लिये अबू सुफ़ियान 4 हज़ार का लश्कर ले कर मक्का से निकला और यहूदियों के दीगर क़बाएल ने 6 हज़ार के लश्कर से पेश क़दमी की ग़रज़ कि 10 हज़ार की जमीयात मदीने पर हमला करने के इरादे से आगे बढ़ी।

आं हज़रत को इस हमले की इत्तेला पहले हो चुकी थी इसी लिये आपने मदीने से निकल कर कोहे सिला को पुश्त पर ले लिया और जनाबे सलमाने फ़ारसी की राय से पांच गज़ चौड़ी और पांच गज़ गहरी खन्दक खुदवाई और ख़न्दक़ खोदने में खुद भी कमाले जां फ़िशानी के साथ लगे रहे। इस जंग में अन्दरूनी ख़लफ़िशार और मुनाफ़िको की रेशादवानियां भी जारी रहीं । जलालउद्दीन स्यूती का कहना है कि अन्दरूनी हालात की हिफ़ाज़त के लिये आं हज़रत ( स.व.व.अ.) ने अबू बकर फिर उमर को भेजना चाहा लेकिन इन हज़रात के इन्कार कर देने की वजह से हज़रत ने हुज़ैफ़ा को भेजा।

(दुर्रे मन्शूर जिल्द 5 पृष्ठ 185)

ख़न्दक़ की खुदाई का काम 6 रोज़ तक जारी रहा। ख़न्दक़ तैयार हुई ही थी कि कुफ़्फ़ार का एक बड़ लश्कर आ पहुँचा। लश्कर की कसरत देख कर मुसलमान घबरा गये। कुफ़्फ़ार यह हिम्मत तो न कर सके कि मुसलमानों को एक दम से हमला कर के तबाह कर देते लेकिन इक्का दुक्का ख़न्दक़ पर कर के हमला करने की कोशिश करते रहे और यह सिलसिला 20 दिन तक चलता रहा। एक दिन अम्रबिन अबदोवुद जो कि लवी बिन ग़ालिब की नस्ल से था और अरब में एक हज़ार बहादुरों के बराबर माना जाता था ख़न्दक़ फांद कर लश्करे इस्लाम तक आ पहुँचा और हल मिन मुबारिज़ की सदा दी। अम्र बिन अबदोवुद की आवाज़ सुनते ही उमर बिन ख़ताब ने कहा कि यह तो अकेला एक हज़ार डाकुओं का मुक़ाबला करता है यानी बहुत बहादुर है। यह सुन कर मुसलमानों के रहे सहे होश भी जाते रहे। पैंग़म्बरे इस्लाम (स.व.व.अ.) ने इसके चैलेंज पर लश्करे इस्लाम को मुखातिब कर के मुक़ाबले की हिम्मत दिलाई लेकिन एक नौजवान बहादुर के अलावा कोई न सका। तारीख़े ख़मीस रौज़तुल अहबाब और रौज़तुल पृष्ठ में है कि तीन मरतबा आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने अपने असहाब को मुक़ाबले के लिये निकलने की दावत दी मगर हज़रत अली (अ.स.) के सिवा कोई न बोला। तीसरी मरतबा आपने अली (अ.स.) से कहा कि यह अम्र अबदवुद है आपने अर्ज़ कि मैं भी अली इब्ने अबी तालिब हूँ।

अल ग़रज़ आं हज़रत ( स.व.व.अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) को मैदान में निकलने के लिये तैयार किया। आपने ज़ेरह पहनाई अपनी तलवार कमर में डाली, अपना अमामा अपने हाथों से अली (अ.स.) के सर पर बांधा और दुआ के लिये हाथ उठा कर अर्ज़ की, ख़ुदाया जंगे बद्र में उबैदा को, जंगे ओहद में हमज़ा को दे चुका पालने वाले अब मेरे पास अली (अ.स.) रह गये हैं मालिक ऐसा न हो कि आज इनसे भी हाथ धो बैठूं । दुआ के बाद अली (अ.स.) को पैदल रवाना कियाऔर साथ ही साथ कहा बरज़ल ईमान कुल्लहू इल्ल कुफ़ कुल्लहू आज कुल्ले ईमान कुल्ले कुफ्र के मुक़ाबले में जा रहा है। (हयातुल हैवान जिल्द 1 पृष्ठ 238 व सीरते मोहम्मदिया जिल्द 2 पृष्ठ 102)

अल ग़रज़ आप रवाना हो कर अम्र के मुक़ाबले में पहुँचे। अल्लामा शिब्ली का कहना है कि हज़रत अली (अ.स.) ने अम्र से पूछा के क्या सच में तेरा यह क़ौल है कि मैदाने जंग में अपने मुक़ाबिल की तीन बातों में से एक बात ज़रूर क़ुबूल करता है। उसने कहा हां। आपने फ़रमाया कि अच्छा इस्लाम कुबूल कर उसने कहा ना मुम्किन फिर फ़रमाया ! अच्छा मैदाने जंग से वापस जा उसने कहा यह भी नहीं हो सकता फिर फ़रमाया ! अच्छा घोड़े से उतर आ और मुझ से जंग कर वह घोड़े से उतर पड़ा, लेकिन कहने लगा मुझे उम्मीद न थी कि आसमान के नीचे कोई शख़्स भी मुझसे यह कह सकता है जो तुम कह रहे हो, मगर देखो मैं तुम्हारी जान नहीं लेना चाहता। ग़रज़ जंग शुरू हो गई और सत्तर वारों की नौबत आई, बिल आख़िर उसकी तलवार अली (अ.स.) के सिपर काटती हुई सर तक पहुँची। हज़रत अली (अ.स.) ने जो संभल कर हाथ मारा तो अम्र बिन अब्दवुद ज़मीन पर लोटने लगा। मुसलमानों को इस दस्त ब दस्त लड़ाई की बड़ी फ़िक्र थी। हर एक दुआऐं मांग रहा था। जब अम्र से हज़रत अली (अ.स.) लड़ रहे थे तो ख़ाक इस क़दर उड़ रही थी कि कुछ नज़र न आता था गरदो गुबार में हाथों की सफ़ाई
तो नज़र न आई हां तकबीर की आवाज़ सुन कर मुसलमान समझे की अली (अ. स.) ने फ़तेह पाई।

अम्र बिन अब्दवुद मारा गया और उसके साथी ख़न्दक़ कूद कर भाग निकले। जब फ़तेह की ख़बर आं हज़रत ( स.व.व.अ.) तक पहुँची तो आप ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो गये। इस्लाम की हिफ़ाज़त और अली (अ.स.) की सलामती की ख़ुशी में आपने फ़रमाया ज़रबते अली यौमुल ख़न्दक़ अफ़ज़ल मिन इबादतुल सक़लैन आज की एक ज़रबते अली (अ.स.) मेरी सारी उम्मत वह चाहे ज़मीन में बस्ती हो या आसमान में रहती हो की तमाम इबादतों से बेहतर है।

बाज़ किताबों में है कि अम्र बिन अब्द वुद के सीने पर हज़रत अली (अ.स.) सवार हो कर सर काटना ही चाहते थे कि उसने चेहराए अक़दस पर लोआबे देहन से बे अदबी की हज़रत को गुस्सा आ गया, आप यह सोच कर फ़ौरन सीने से उतर आये कि कारे ख़ुदा में जज़्बाए नफ़्स शामिल हो रहा था, जब गुस्सा ख़त्म हुआ तब सर काटा और ज़िरह उतारे बग़ैर खिदमते रिसालत माआब में जा पहुँचे। आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) को सीने से लगा लिया। जिब्राईल ने बरावायत सुलैमान क़नदूज़ी, आसमान से अनार ला कर तोहफ़ा इनायत किया । जिसमें हरे रंग का रूमाल था और उस पर अली वली अल्लाह लिखा हुआ था।

हज़रत अली (अ.स.) मैदाने जंग से कामयाबो कामरान वापस हुये और अम्र बन अब्द वुद की बहन भाई की लाश पर पहुँची और खोदो ज़िरह बदस्तूर उसके जिस्म

पर देख कर कहा मा क़त्लहा अला कफ़वुन करीम इसे किसी बहुत ही मोअजज़िज़ (आदरणीय) बहादुर ने क़त्ल किया है। उसके बाद कुछ शेर पढ़े जिनका मतलब यह है कि ऐ अम्र ! अगर तुझे इस क़ातिल के अलावा कोई और क़त्ल करता तो मैं सारी उम्र (जीवन भर ) तुझ पर रोती । माआरेजुन नबूवता और रौज़ातुल पृष्ठ में है कि फ़तेह के बाद जब हज़रत अली (अ.स.) वापस हुए तो हज़रत अबू बकर और उमर ने उठ कर आपकी पेशानी मुबारक को बोसा दिया।






19 Ramzaan Shab E Zarbat

19 Ramzaan Shab E Zarbat  Amirul Momineen Khaliftul Muslimeen Imam e Awwal Hazarat Imam Moula Ali۴ Ibne Abu Talib (AlehisSalam wa Karam Allahu Ta’Ala Wajhhahul Kareem)

“Rabb-e-Kaaba ki Qasam Mai Kamyab Hogaya!” 19 Ramzan ki wo raat thi, Tahajid ka wagt tha aur ye wo jagah thi jahan ibne muljim lanati (jisko Aaga SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne puri insaniyat me se 2 badbakht tareen insano me se ek karar diva tha) usne laeen ne is Mugaam par Ameer ul Momineen Maula-e-Kainat Sayyeduna Maula Ali al Murtaza KarramAllahu Wajhahul Kareem ke Sar-e-Agdas pe zehar pe dubi talwar se waar kiya. Is waar ke zakham aur zehar ke asar se 21 Ramzan ko Maula Ali Alaihissalam is duniya e faani se parda farma gaye. Jab us laeen ki talwar Aapke Sar-e-Aqdas pe lagi, Aapki Zubaan-e-Pak se Alfaz nikle “Rabb-e-Kaaba ki Qasam Mai Kamyab Hogaya!” 19 Ramzan ki raat ko isliye “Shab-e-Zarbat” kehte hai.. .. Alaihissalam wa KarramAllahu Waihahul Kareem wa RadiAllahu Ta’ala Anhu.

#19th Ramzan Shab E Zarbat
Rabb E Ka’aba Ki Qasam Mai Kamyab Hua – Imam Ali ع

Abū Al-Aswad Al-Du’ali رضی اللہ عنہ Ne BaSha’r E Zel Hazrat Ali علیہ السلام Ka Marshiah Kaha Hai.

Ae Aankh Tujhe Kharabi Ho Kya Tu Hamari Madad Na Karegi Aur Amir Ul Mominin ع Par Na Royegi,

Halanke Umm E Kulsum ع Unpe Roti Aur Aansu Bahati Hai Aur Inhone Yaqeen ( Ya’ani Maut ) Ko Dekha Liya,

Ae Mukhatib! Kharzi Jaha Kahi Bhi Ho Inko Kehde Ke ( Khuda Kare ) Hamare Hasido Ki Aankhen Kabhi Thandi Na Ho,

Kya Tumne Hame Rozo Ke Mahine Mai Ghabrahat Mai Dala Hai Es ع Shakhs Ke Zariye Jo Tamam Logo Mai Behtar Tha,

Ab Kon Chappal Pehnega Aur Kon Inhe Tanke Ga Aur Kon Mashani Aur Moeen Ki Tilawat Karega,
Tamam Khubia Isme Mojud Thi Aur Rasool E Rab Ul Aalamin ع Ke Dost The,

Quresh Ye Khoob Jante Hai Ke Tu ع In Sab me Hasab O Nasab Ke Lihaz Se Behtar Hai, 

Ae Mukhatib! jab Tere Samne Abul Hussayn ع ka chehra Aaye To Dekhna Ke Chodhwi Ka Ek Chand Hai Jo Dekhne Walo Ko Lubha Raha Hai,

Hum Inke Shaheed Hone Se Pehle Khush The Ke Rasool Ke Dost Ko Apne Darmiyan Dekhte The,

Aap ع Haq Ko Kayam Karte The Aur Isme Jara  Bhi Shaq Na Kiya Karte The Aur Dushmano Aur Aqraba Ke Sath Ek Jesa Adal Kiya Karte The,

Aap Apne Ilm Ko Kabhi Na Chhupate Aur Na Hi Aap Mutqabro Se The Aur Log Hazrat Ali ع Ko Gham Karke Aise Hogaye Jese Sattar Murg Kahet Sali Mai Maidan Mai Mara Mara Firta Hai,

Muawiya Ko Khush Nhi Hona Chahiye Kyuke Khulfa E Baqiya ( Ya’ani Imam Hasan ع ) Ab Bhi Hum Mai Mojud Hai

Book:-
#Tarikh_E_Khulafa, Safah-270-271, Imam Jalaluddin Abdul Rehman Suyuti رضی اللہ عنہ
Translation:- Allama Mohammed Mansa Tabish Kasuri مدضلہ العلی

#Tarikh_E_Tabari, Safah-359, Allama Abi Jafar Mohammed Bin Jurair Al-Tabari Al-Matufi رحمتہ اللہ علیہ

*19 रमज़ान यौम ए शब ए ज़र्बत* 💔
*इमाम मौला अली؀*

कुफे की मस्ज़िद में जो खून बहा, वो सिर्फ *मौला अलीع* का नहीं वो *सैय्यदना मोहम्मद मुस्तफाﷺ* का ख़ून था!
क्योंकि ताजदार ए कायनात ने फरमाया हैं
*हाज़ा अली इब्न अबू तालिब, लहमुका लहमी वा दहमुका दहमी….*
*ये अली हैं इसके जिस्म का गाेश मेरा गोश है, इसका खून मेरा खून हैं!!!*

हाय अफसोस!!
नाम निहाद कलमा गोयों ने *बूग्ज़ ए अली* के सबब मस्जिद के मेहराब को इसी खून से रंग दिया!!💔
और आज के भी बूग्ज़ी इसी रवीश में कायम है!

हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बासرع फरमाते हैं!
*अल्लाह* ने बनी इसराइल से उनकी बादशाहत *अंबिया इकराम* के साथ उनके बुरे सुलूक की वजह से छीन ली थी!

और बेशक *अल्लाह ता’आला* इस उम्मत से उसकी बादशाहत को *अलीع* के साथ बूग्ज़ की वजह से छीन लेगा!

*📖 सुनन ए दएलमी हदीस 1384*

🏴 *गुलामाने मौला अली* 🏳

19 रमज़ान आज ही दिन मस्जिद ए कुफा में इसी जगह पे नमाज़ के दरमियां  *किराये के क़ातिल दहशतगर्द इब्ने मुल्जिम लानती*  ने मौला ए कायनात अली इब्ने अबु तालिब अलैहिस्सलाम के सर पर ज़हर बुझी तलवार से हमला किया था 💔 जो मस्जिद में की गई पहली दहशतगर्द घटना थी,, जो आज भी मौला के चाहने वालों पर मस्जिदों इमामबरगाहों पर ज़ारी है‼️

*बेशुमार लानत किराये के क़ातिल (दहशतगर्द) इब्ने मुल्जिम लानती और उसको भेजने वाले उसके आका  मावया मरदूद पर   पर*

Ummul Momineen Sayyeda Maymunah aur Syedah Salma Ke qaul Mola Ali ke liye

Ummul Momineen Sayyeda Maymunah Ki Mola Ali Se Muhabbat

Jari Ibn Kulaib Al Amiri Farmate Hain :- Jab Ameer ul Momineen Sayyedna Ali Alahis Salam Siffin Ki Janib Rawana Hue Mujhe Ye Ladayi Pasand Na Thi, Me Madina Munawwara Aa Gaya Aur Ummul Momineen Sayyeda Maymunah Salamullah Alaiha Ki Khidmat Me Hazir Hua Unhone Mujhse Poucha Ki Tum Kon Ho ? Mene Kaha Kufa Walo Me Se, Phir Unhone Mujhse Aane Ka Maqsad Poucha Mene Kaha Sayyedna Ali Siffin Ki Janib Rawana Hue Hain To Unhone Poucha Kya Tumne Unki Bai’at Ki Thi ? Mene Kaha Ji Haa! Unhone Farmaya Tum Laut Jao Aur Unke Lashkar Me Shareek Ho Jao Khuda Ki Qasam! Wo Na Khud Gumrah Hain Aur Na Unke Saath Rehne Wala Gumrah Ho Sakta Hain.

📚 Reference 📚
Mustadrak Ala Al Sahihain, Hadees No 4680, Imam Hakim Ne Is Hadees Ko Imaam Bukhari Aur Imaam Muslim Ki Sharait Par Sahi Qarar Diya Hain.

*Ummul Momineen Sayyeda Umme Salma Ki Mola Ali Se Muhabbat*

Jab Ameer ul Momineen Mola Ali Alahis Salam Basra Ki Janib Rawana Hue To Mulaqat Ke Liye Ummul Momineen Sayyeda Umme Salma Salamullah Alaiha Ke Pas Aaye To Sayyeda Umme Salma Ne Dua Dete Hue Kaha Aap Allah Ki Hifz o Amaan Me Jaye Khuda Ki Qasam! Beshak Aap Hi Haq Par Hain Aur Haq Aapke Sath Hai, Rasoolullah ﷺ Ne Hame Gharon Me Thehrne Ka Hukm Diya Hain Agar Allah Aur Uske Rasool Ki Nafarmani Ka Dar Na Hota To Me Bazate Khud Aapke Saath Chalti Phir Bhi Me Apne Bete Umar Ko Aapke Saath Rawana Karti Hun Jo Mujhe Meri Jaan Se Bhi Zada Azeez Hai.

📚 *Reference* 📚
Mustadrak Ala Al Sahihain, Hadees No 4611.