
ग़ज़वाए बनी मुस्तलक़ और वाकिए अफ़क़
आं हज़रत (स.व.व.अ.) को इत्तेला मिली कि क़बीलाए मुस्तलक़ मदीने पर हमला करना चाहता है। आपने उसे रोकने के लिये 2 शाबान 5 हिजरी को इनकी तरफ़ बढ़े। हज़रत अली (अ.स.) अलमदारे लशकर थे। घमासान की जंग हुई, मुसलमान कामयाब हुए। वापसी के मौक़े पर हज़रत आयशा इसी जंगल में रह गईं। जो बाद में एक शख़्स सफ़वान इब्ने माअतल के साथ ऊँट पर बैठ कर आं हज़रत ( स.व.व.अ.) तक पहुँची। आं हज़रत ( स.व.व.अ.) ने इसे महसूस किया और लोगों शुकूक का चरचा कर दिया। बारवायत तारीख़े आइम्मा आं हज़रत ( स.व.व.अ.) को भी शक हो गया था और आप कुछ समय तक कशीदा (नाराज़) रहे फिर फ़रमाया मुझे जहां तक मालूम है मैं अपनी बीवी में सिवाय नेकी और भलाई कुछ नहीं पाता और जिस मर्द यानी सफ़वान इब्ने माअतल के बारे में जो लोग चरचा करते हैं मैं इसमें भी किसी तरह की ख़राबी नहीं पाता, वह बे शक मेरे घर में आमदो रफ़्त रखता था मगर हमेशा मेरे हुज़ूर में। (उम्मेहात अल उम्मा पृष्ठ 166)
इसी 5 हिजरी में ग़ज़वाए बनी कुरैज़ा, सरया, सैफ़ अल बहर, ग़ज़वए बनी अयान भी वाक़े हुए हैं और तयम्मुम का हुक्म भी नाज़िल हुआ है और बक़ौल मुहीउद्दीन इब्ने अरबी इसी 5 हिजरी में सफ़रे ख़न्दक़ के मौके पर आं हज़रत (स.व.व.अ.) ने ख़ुद अज़ान में हय्या अला ख़ैरिल अमल का हुक्म दिया । किबरियत अहमर बर हाशिया अल वियाक्रियत वल जवाहर, जिल्द 1 पृष्ठ 43 व मोअल्लिमेतरजुमा मुस्लिम पृष्ठ 528 व कनजुल आमाल जिल्द 4 पृष्ठ 226 वाज़े हो कि हय्या अला ख़ैरिल अमल रसूले करीम ( स.व.व.अ.) की तशकीले अजां का जुज़ है लेकिन हज़रत उमर ने उसे अपने अहद में अज़ान से ख़ारिज (निकाल ) कर दिया। मुलाज़ा हो (नील अल वतारा, इमामे शोकानी जिल्द 1 पृष्ठ 339 व सही मुस्लिम मुतारज्जिम जिल्द 2 पृष्ठ 10)
6 हिजरी के अहम वाक़यात
सुलैह हुदैबिया ज़ीक़ाद 6 हिजरी मुताबिक़ 628 ई0 में आं हज़रत ( स.व.व.अ.) हज के इरादे से मक्के की तरफ़ चले, कुरैश को ख़बर हुई तो जाने से रोका, हज़रत एक कुएं पर जिसका हुदैबिया नाम था रूक गए और असहाब से जां निसारी की बैअत ली। इसी को बैत अल रिज़वान कहते हैं और बैअत करने वालों को असहाबे सुमरा से ताबीर किया जाता है। क़ुरैश के ऐलची उरवा ने कहा कि इस साल हज से बाज़ आएं और यह भी कहा कि मैं आपके हमराह ऐसे लोग देख रहा जो ओबाश हैं और जंग से भाग निकलेंगे यह सुन कर हज़रत अबू बकर ने बज़रआलात चूसने की गाली दी। इसके बाद आं हज़रत ( स.व.व.अ.) बारवायत इब्ने असीर हज़रत उमर को क़ुरैश के पास इस लिये बेजना चाहा कि वह उन्हें समझा बुझा कर सुलह करने पर राज़ी कर लें लेकिन वह ना गए और हज़रत उस्मान को भेजने की राय दी हज़रत उस्मान जो अबू सुफ़ियान के भतीजे थे इनके पास गए इनकी अच्छी तरह आव भगत हुई लेकिन आखिर में गिरफ़्तार हो गए और जल्दी छूट कर चले गए। आखिर अम्र कुरैश की तरफ़ से पैग़ामे सुलह लाया और हज़रत ने सुलह कर ली। सुलह नामा हज़रत अली (अ.स.) ने लिखा है। तरफ़ैन से शाहदते ले ली गईं। इस सुलह के बाद कुरैश बे खटके मुसलमान होने लगे और मक्के में बिला मज़ाहमत क़ुरान पढ़ा जाने लगा क्यों कि अमन क़ाएम हो गया और रसूल (स.व.व.अ.) का नाम लेना जुर्म न रहा। एक दूसरे से मिलने लगे और इस्लाम का नया दौर शुरू हो गया । (तारीखे ख़मीस जिल्द 2 पृष्ठ 15 और दुर्रे मन्शूर जिल्द 6 पृष्ठ 77 में है कि सुलैह हुदैबिया के बाद हज़रत उमर ने कहा कि मोहम्मद (स.व.व.अ.) की नबूवत में जैसा मुझे आज शक हुआ है कभी नहीं हुआ था। यह उन्होंने इस लिये कहा कि वह सुलह पर राज़ी न थे। इब्ने ख़ल्दून का बयान है कि इनके इस तरज़े अमल से हज़रत रसूले ख़ुदा ( स.व.व.अ.) सख़्त रंजीदा हुए। (तारीखे इब्ने खल्दून पृष्ठ 361)
तारीख़े इस्लाम एहसान उल्लाह अब्बासी में है कि हुदैबिया से वापस होते हुए रास्ते मे सूरा ए इन्ना फ़तैहना लका फ़तैहना मुबीनन नाज़िल हुआ। इसी साल ग़ज़वह ज़ी क़रद, सरया दो मताउल जिन्दल, सरया फ़िदक़, सरया वादिउल कुरा और सरया अरनिया भी वाक़े हुये हैं।
इसी 6 हिजरी में हज़रत रसूले करीम ( स.व.व.अ.) ने ज़ैद बिन हारेसा की ज़ेरे सर करदगी चालीस आदमियों की एक जमाअत हमूम की तरफ़ रवाना की जिसनेक़बीलाए मुज़ीना की औरत हलीमा और उसके शौहर को गिरफ़्तार कर के आपकी खिदमत में हाज़िर किया आपने मियां बीवी दोनों को आज़ाद कर दिया। (तारीख़े कामिल बिन असीर जिल्द 2 पृष्ठ 78 व अल रक़ फ़िल इस्लाम, लेखक अतीकुर रहमान उस्मानी जिल्द 1 पृष्ठ 107)











