
हिजरते मदीना
14 बेअसत मुबाबिक़ 622 ई0 में हुक्मे रसूल (स.अ.व.व.) के मुताबिक़ मुसलमान चोरी छिपे मदीने की तरफ़ जाने लगे और वहां पहुँच कर उन्होंने अच्छा स्थान प्राप्त कर लिया। कुरैश को जब मालूम हुआ कि मदीने में इस्लाम ज़ोर पकड़ रहा है तो ( दारूल नदवा) में जमा हो कर यह सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिये। किसी ने कहा मोहम्मद को यहीं क़त्ल कर दिया जाये ताकि उनका दीन ही ख़त्म हो जाये। किसी ने कहा जिला वतन कर दिया जाये। अबू जहल ने राय दी कि विभिन्न क़बीलों के लोग जमा हो कर एक साथ उन पर हमला कर के उन्हें क़त्ल कर दें ताकि कुरैश खूं बहा न ले सकें। इसी राय पर बात ठहर गई और सब ने मिल कर आं हज़रत ( स.अ.व.व.) के मकान का घेराव कर लिया। परवरदिगार की हिदायत के अनुसार जो हज़रत जिब्राईल के ज़रिये पहुँची आपने अपने बिस्तर पर हज़रत अली (अ.स.) के लिटा दिया और एक मुठी धूल ले कर घर से बाहर निकले और उनकी आंखों में झोंकते हुए इस तरह निकल गये जैसे कुफ से ईमान निकल जाये। अल्लामा शिब्ली लिखते हैं कि यह सख़्त ख़तरे का मौक़ा था। जनाबे अमीर को मालूम हो चुका था कि क़ुरैश आपके क़त्ल का इरादा कर चुके हैं और आज रसूल अल्लाह (स.अ.व.व.) का बिस्तरे ख़्वाब क़त्लगाह की ज़मीन है लेकिन फ़ातेहे ख़ैबर के लिये क़त्लगाह फ़र्शे गुल था। (सीरतुन नबी व मोहसिने आज़म सन् 165 ) सुबह होते होते दुश्मन दरवाज़ा तोड़ कर घर में घुसे तो
अली को सोता हुआ पाया। पूछा मोहम्मद कहां हैं? जवाब दिया जहां हैं ख़ुदा की अमान में हैं। तबरी में है कि अली (अ.स.) तलवार सूत कर खड़े हो गये और सब घर से निकल भागे। अहयाअल उलूम ग़ज़ाली में है कि अली की हिफ़ाज़त के लिये ख़ुदा ने जिब्राईल और मीकाईल को भेज दिया था, यह दोनों सारी रात अली की ख़्वाबगाह का पहरा देते रहे। हज़रत अली (अ.स.) का फ़रमान है कि मुझे बे हिजरत जैसी नीन्द आई सारी उम्र न आई थी। तफ़सीरों में है कि इस मौके के लिये आयत व मिन्न नासे मन यशरी नाज़िल है। अल ग़रज आं हज़रत (स.अ.व.व.) के रवाना होते ही हज़रत अबू बकर ने उनका पीछा किया आपने रात के अन्धेरे में यह समझ कर कि कोई दुश्मन आ रहा है अपने क़दम तेज़ कर दिये । पांव में ठोकर लगी ख़ून बहने लगा, फिर आपने महसूस किया कि इब्ने अबी क़हाफ़ा आ रहे हैं। आप खड़े हो गये। (सही बुख़ारी जिल्द 1 भाग 3 पृष्ठ 69) में है कि रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व.) ने अबू बकर बिन क़हाफ़ा से एक ऊँट ख़रीदा और मदारिजुल नबूवत में है कि हज़रत अबू बकर ने दो सौ दिरहम में ख़रीदी ऊँटनी आं हज़रत के हाथ 900 नौ सौ दिरहम की बेची इसके बाद यह दोनों गारे सौर तक पहुँचे, यह ग़ार मदीने की तरफ़ मक्के से एक घण्टे की राह पर ढ़ाई या तीन मील दक्षिण की तरफ़ स्थित है। इस पहाड़ की चोटी तक़रीबन एक मील ऊँची है समुन्द्र वहां से दिखाई देता है।
(तलख़ीस सीरतुन नबी पृष्ठ 169 व ज़रक़ानी)
यह हज़रात ग़ार में दाखिल हो गये ख़ुदा ने ऐसा किया कि ग़ार के मुँह पर बबूल का पेड़ उगा दिया। मकड़ी ने जाला तना, कबूतर ने अन्डे दे दिये और ग़ार में जाने का शक न रहा। जब दुश्मन इस ग़ार पर पहुँचे तो वह यही सब कुछ देख कर वापस हो गये। अजायब अल क़सस पृष्ठ 257 में है कि इसी मौक़े पर हज़रत ने कबूतर को ख़ाना काबा पर आकर बसने की इजाज़त दी। इससे पहले और परिन्दों की तरह कबूतर भी ऊपर से गुज़र नहीं सकता था। मुख़्तसर यह कि 1 रबीउल अव्वल सन् 14 बेअसत (जुमेरात) के दिन शाम के वक़्त क़ुरैश ने हज़रत के घर का घेराव किया था। सुबह से कुछ पहले 2 रबीउल अव्वल जुमे के दिन को ग़ारे सौर में पहुँचे। इतवार के दिन 4 रबीउल अव्वल तक ग़ार में रहे। हज़रत अली (अ.स.) आप लोगों के लिये रात में खाना पहुँचाते रहे। चौथे रोज पांच रबीउल अव्वल दोशम्बे के रोज़ अब्दुल्लाह इब्ने अरीक़त और आमिर बिन फ़हीरा भी आ पहुँचे और यह चारों शख़्स मामूली रास्ता छोड़ कर बहरे कुलजुम के किनारे मदीने की तरफ़ रवाना हुए। कुफ़्फ़ारे मदीना ने ईनाम मुक़र्रर कर दिया कि जो शख़्स उनको ज़िन्दा पकड़ कर लायेगा या उनका सर काट कर लाऐगा तो 100 ऊँट ईनाम में दिये जाऐंगे। इस पर सराक़ा इब्ने मालिक आपकी खोज लगाता हुआ गार तक पहुँचा उसे देख कर हज़रत अबू बकर रोने लगे तो हज़रत ने फ़रमाया रोते क्यों हो ख़ुदा हमारे साथ है सराक़ा क़रीब पहुँचा ही था कि उसका घोड़ा उसके जानू तक ज़मीन में धंस गया। उस वक़्त हज़रत रवानगी के लिये बाहर आ चुके थे।
उसने माफ़ी मांगी, हज़रत ने माफ़ी दे दी। घोड़ा ज़मीन से निकल आया। वह जान बचा कर भागा और काफ़िरों से कह दिया कि मैंने बहुत तलाश किया मगर मोहम्मद (स.व.व.अ.) का पता नहीं मिलता। अब दो ही सूरतें हैं या ज़मीन में समा गये या आसमान पर उड़ गये। (1)
हज़रत का क़बा के स्थान पर पहुँचना 12 रबीउल अव्वल दो शम्बा दो पहर के समय आप क़बा के स्थान पर पहुँचे जो मदीने से दो मील के फ़ासले पर एक पहाड़ी है। आपका ऊँट उस जगह ख़ुद ही रूक गया और आगे न बढ़ा। आप उतर पड़े। वहां के रहने वालों ने ख़ुशी के मारे नारा ए तकबीर बुलन्द किया। आपने यहां एक मस्जिद की बुनियाद डाली ।
इसी मक़ाम पर हज़रत अली (अ.स.) भी मक्के से अमानतों की अदायगी से सुबुक दोशी हासिल करने के बाद आ पहुँचे। आपके साथ औरतें और बच्चे थे। औरतें और बच्चे ऊँटों पर सवार थे और हज़रत अली (अ.स.) पैदल थे। इसी वजह से आपके पैरों पर वरम था और बक़ौल इब्ने खल्दून आपके पैरों से ख़ून जारी था । आं हज़रत (स.व.व.अ.) की नज़र जब अली (अ.स.) के पैरों पर पड़ी तो आप रोने लगे और लोआबे दहन ( थूक ) लगा कर अच्छा कर दिया।
मदीने में दाखिला मक़ामें क़बा में चार दिन रुकने के बाद आप मदीने की तरफ़ रवाना हुए और 16 रबीउल अव्वल जुमे के दिन मदीने में दाखिल हो गये। महल्ले बनी सालिम में नमाज़ का वक़्त आ गया आपने नमाज़े जुमा यहीं अदा फ़रमाई ।
यह इस्लाम में सब से पहली नमाज़े जुमा थी । यह वही जगह है जहां अब मस्जिदे नबवी है।
मस्जिदे नबवी की तामीर मदीने में दाखिले के बाद आपने सब से पहले एक मस्जिद की बुनियाद डाली जो बहुत सादगी के साथ तैयार की गई । उसकी ज़मीन अबू अय्यूब अंसारी ने ख़रीदी और उसमें मज़दूरों की हैसियत से दूसरे असहाब के साथ आं हज़रत (स.व.व.अ.) भी काम करते रहे। मस्जिद के साथ साथ हुजरे भी तैयार किये गये और एक चबूतरा जिसे सुफ़्फ़ा कहते थे, यही वह जगह थी जहां नये मुसलमान ठहराये जाते थे। उन्हीं लोगों को अस्हाबे सुफ़्फ़ा कहा जाता था और उनकी परवरिश सदके वग़ैरा से की जाती थी ।
नमाज़ व ज़कात का हुक्म मस्जिदे नबवी की तामीर के बाद नमाज़ की रकअतों को भी तय कर दिया गया यानी पहले मग़रिब के अलावा सब नमाज़ें दो रकअती थीं फिर 17 रकअतें मुअय्यन कर दी गईं और उनके औकाद बता दिये गये। इब्ने खल्दून के अनुसार इसी साल ज़कात भी फ़र्ज़ की गई।

