चौदह सितारे पार्ट 9

दावते ज़ुल अशीरा का वाक़ेया और ऐलाने रिसालत व वज़ारत

बेअसत के बाद आपने तीन साल तक निहायत राज़दारी और पोशीदगी के साथ फ़रायज़ की अदायगी फ़रमायी इसके बाद खुले बन्दों तबलीग़ का हुक्म आ गया। फ़सद अबेमह तोमर तो हुक्म दिया गया है उसकी तकमील करो। मैं इस मक़ाम पर तारीख़ अबुल फ़िदा के इश्क़ तरजुमा की लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ इबारत नक़ल करता जिसे मौलाना करीम उद्दीन हनफ़ी इंस्पेक्टर मद्रास पंजाब ने 1846 ई0 में किया था।

वाज़े हो के तीन बरस तक पैग़म्बरे ख़ुदा ( स.व.व.अ.) दावते तरफ़े इस्लाम ख़ुफ़िया करते रहे मगर जब कि यह आयत नाज़िल हुई वा अनज़र अशीरतेकल अक़रबैन यानी डरा अपने कुनबे वालों को जो क़रीब रिश्ते के हैं। इस वक़्त हज़रत ने बमुजिब हुक्मे ख़ुदा के इज़हार करना दावत का शुरू किया। बाद नाज़िल होने इस आयत के पैग़म्बरे ख़ुदा ( स.व.व.अ.) ने अली से इरशाद किया कि ऐ अली एक पैमाना खाने का मेरे वास्ते तैयार कर और एक बकरी का पैर उस पर छुआ ले और एक बड़ा कासा दूध का मेरे वास्ते ला और अब्दुल मुत्तलिब की औलाद को मेरे पास बुला कर ला ताकि मैं उससे कलाम करूं और सुनाऊँ उनको वह हुक्म जिस पर जनाबे बारी से मामुर हुआ हूँ चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने वह खाना एक पैमाना बामोजिब हुक्म तैयार करके औलादे अब्दुल मुत्तलिब को जो करीब 40 आदमी के थे बुलाया, उन आदमियों में हज़रत के चचा अबु तालिब, हज़रते हमज़ा और हज़रते अब्बास भी थे। उस वक़्त हज़रत अली ने वह खाना जो तैयार किया था ला कर हाज़िर किया। सब खा पी कर सेर हो गये। हज़रत अली ने इरशाद किया कि जो खाना इन सब आदमियों ने खाया है वह एक आदमियों की भूख के लिये काफ़ी था। इसी दौरान हज़रत चाहते थे कि कुछ कहूँ कि अबू लहब जल्दीबोल उठा और यह कहा कि मोहम्मद ने बड़ा जादू किया है। यह सुनते ही तमाम आदमी अलग अलग हो गये थे, चले गये। पैग़म्बरे ख़ुद कुछ कहने न पाये थे यह हाल देख कर जनाबे रिसालत माअब ( स.व.व.अ.) ने इरशाद किया कि ऐ अली देखा तूने उस शख़्स ने कैसी सबक़त की, मुझको बोलने ही न दिया। अब फिर कल को तैयार कर जैसा कि आज किया था और फिर उनको बुला कर जमा कर । चुनान्चे हज़रत अली (अ.स.) ने दूसरे रोज़ फिर मुवाफ़िके आं हज़रत ( स.व.व.अ.) खाना तैयार कर के सब लोगों को जमा किया। जब वह खाने से फ़राग़त पा चुके उस वक़्त रसूल अल्लाह ( स.व.व.अ.) ने इरशाद किया कि तुम लोगों की बहुत अच्छी क़िस्मत और नसीब है क्यों कि ऐसी चीज़ मैं अल्लाह की तरफ़ से लाया कि उससे तुम को फ़जीलत हासिल होती है और ले आया हूँ तुम्हारे पास दुनिया और आख़रत में अच्छा। ख़ुदा ताअला ने मुझको तुम्हारी हिदायत का हुक्म फ़रमाया है। कोई शख़्स तुम में से इस अम्र का इक़्तेदा कर के मेरा भाई, वसी और ख़लीफ़ा बनना चाहता है, इस वक़्त सब मौजूद थे और हज़रत पर एक हुजूम था और हज़रत अली ने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह ( स.व.व.अ.) मैं आपके दुश्मनों को नैज़ा मारूँगा और उनकी आँखें फोड़ दूँगा, पेट चीरूंगा और टांगें काटूगां और आपका वज़ीर हूंगा। हज़रत ( स.व.व.अ.) ने उस वक़्त हज़रत अली ए मुर्तज़ा की गरदन पर हाथ मुबारक रख कर इरशाद फ़रमाया कि यह मेरा भाई है और मेरा वसी है और मेरा ख़लीफ़ा है तुम्हारे बीच इसकी सुनो और इताअत क़ुबूलकरो। यह सुन कर सब क़ौम के लोग मज़ाक़ में हंस कर खड़े हो गये और अबू तालिब से कहने लगे कि अपने बेटे की बात सुन और इताअत कर यह तुझे हुक्म हुआ है। (अलख पृष्ठ 33 से 36 मुद्रित लाहौर)

मुवरिख़ अबुल फ़िदा मतूफ़ी 732 हिजरी की तहरीर पर मेरा वज़ाहत नोट आयए अनज़ेरा अशीरतेकल अक़रबैन के नुज़ूल की तफ़सील हज़रत अली (अ.स.) की खिलाफ़त बिला फ़सल की बुनियाद क़ाएम करती है। इस पर अमले रसूल फ़ेले रसूल (स.व.व.अ.) और क़ौले रसूल (स.व.व.अ.) ने साबित कर दिया कि हज़रत अली (अ.स.) ही रसूले करीम ( स.व.व.अ.) के ख़लीफ़ा ए अव्वल और ख़लीफ़ा ए बिला फ़स्ल हैं उन्हीं को उन्होंने अपना जां नशीन बनाया था जिसकी जिसकी तजदीद अपनी ज़िन्दगी के मुखतलिफ़ अदवार में फ़रमाते रहे यहां तक कि नस्से सरीह आया ए या अयोहल रसूल बल्लिग़ मा उनजेला एलैका मिन रब्बक के ज़रिये से ग़दीरे ख़ुम में हजजे आखिर के मौके पर आख़री ऐलान फ़रमाया और वाज़े कर दिया कि मेरे बाद अली इब्ने अबी तालिब (अ. स.) ही मेरे जानशीन और ख़लीफ़ा हैं।

मुवरिख़ अबू अल फ़िदा ने इस्लाम की इस पहली और बुनियादी दावते तबलीग़ की मुनासिब वज़ाहत फ़रमा दी है और साफ़ लफ़्ज़ों में वाज़े कर दिया कि हज़रत रसूले करीम ( स.व.व.अ.) ने हज़रत अली (अ.स.) को अपना जानशीन और ख़लीफ़ाइसी बुनियादी दावत के मौके पर बना दिया था और लोगों को हुक्म दे दिया था कि फ़ इसमऊ इलहे व अतीयहू इनकी बात कान धर कर सुनो और इनकी इताअत करो।

कुछ कमोबेश लफ़्ज़ों के साथ यह वाक़ेया तारीख़ तबरी जिल्द 2 पृष्ठ 217 तारीख़ कामिल बिन असीर जिल्द 2 पृष्ठ 122 लुबाब अलतावील जिल्द 5 पृष्ठ 106 मुआलिमुत तनज़ील बर हशिया ख़ाज़िन जिल्द 6 पृष्ठ 105 ख़साएस निसाई पृष्ठ 13, मसनद अहमद बिन हमबल जिल्द 3 पृष्ठ 360, कनजुल माल जिल्द 6 पृष्ठ 397, सीरते इब्ने इसहाक़, तफ़सीर इब्ने हातिम, दलाएल बहीकी, मुनाक़िब इमाम अहमद, मुसन्निफ़ अबू बकर इब्ने अबी शबीता, तारीख़े ख़मीस, तफ़सीर इब्ने मरदूया, तफ़सीर सिराजे मुनीर, तफ़सीर शिबली, तफ़सीरे वाहेदी, हुलयतुल औलिया, ज़ख़ीरतुल आमाल अजली, मुख़्तारे ज़िया मुक़दसी, तहज़ीब अल आसार तिबरी, इकतेफ़ा आसमी, रौज़तुल अलसफ़ा, हबीब अलसैर, मआरिज अल नबूअता मदारिज अल नबूअता अज़ालतुल ख़फ़ा तारीख़े इस्लाम अब्दुल हकीम नशतर जिल्द 1 पृष्ठ 44 वग़ैरा में मौजूद है। इन इसलामी किताबों के अलावा इसका तज़किरा अहले फिरगं की तसनीफ़ात में भी है। मुलाहेजा हो अपालोजी जान डीवन पोस्ट पृष्ठ 5, कारलायल पृष्ठ 61 ज़ुल्फ़ा मोहम्मद एयरविंग पृष्ठ 3 तारीख़े गिबन जिल्द 3 पृष्ठ 499, ओकली पृष्ठ 151 दावते ज़ुल अशीरा के सिलसिले में यह अमर क़ाबिले ज़िक्र है कि इस अहम वाक़ेए का ज़िक्र इमाम बुख़ारी ने अपनी सही में नहीं किया जिससे उनकी ज़ेहनियत का पता चलता है नीज़ यह कि जरमन में जो तारीख़े तबरी छपी है इसकी जिल्द 9 पृष्ठ 68 में वसी व ख़लीफ़ती के बजाय कज़ा व कज़ा दरज है जिससे अहले मिस्र की तहरीफ़ी जद्दो जेहद का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है, वाज़े हो कि दावते ज़ुल अशीरा का वाक़या 4 बेअसत का है।

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