
नियमित जीवन-यापन
नियमित जीवन व्यतीत करने की शैली जो आप में देखी गयी है वह कहीं किसी में न देखी गयी है और न सुनी गई है। जिससे जाहिर है कि आपके मिजाज में उच्चतम श्रेष्टता और मजबूती और एक रंगी थी। जो बात आरम्भ में आप से प्रकट हुई वह वजा में सम्मिलित हो गई और उसमें परिर्वतन होना किसी भी दशा में असंभव था।
जिस आदमी के मकान पर आप एक बार रूके और ठहरे आजीवन आप ने अपने पदार्पण से उसी मकान को सम्मानित किया। बड़े-बड़े धनी मानी व्यक्ति
प्रार्थना करके हार गये परन्तु आप प्रथम गरीब मेज़बान का दिल तोड़ना पसन्द नहीं किया। जीवन के अंतिम भाग में जब आप बहुत कमजोर और जुईफ हो गये थे सफर नहीं करते थे। आपके धनी मालदार मुरीद (धार्मिक चेले) खुद जाकर आप को लाते थे। तो भी आप उनके घर नहीं ठहरते वरन् उस शहर में जहाँ प्रथम बार रुके थे उसी स्थान पर रूकते थे। यहां तक कि किसी शहर या कस्बा में पहली बार जिस रास्ते प्रवेश किये थे उसी रास्ते से तशरीफ ले जाते थे और कभी उस रास्ते को नहीं बदलते थे। यदि कभी अपनी लीनता विलीनता के कारण संयोगवश रास्ता छूट जाता तो आप लौट कर उस रास्ते पर पलट आते थे और कहते थे कि हमारा पुराना रास्ता यही है गोया रास्ते से भी स्नेह हो जाता था।
मौलवी रौनक़ अली साहब वारसी लिखते है कि ग्राम गौरा, जिला- बाराबंकी जब प्रारम्भ में सरकार तशरीफ ले गये थे तो राह में एक बाग़ था जिसके एक वृक्ष के साये में आप थोड़ी देर आराम किये थे
दूसरी बार पन्द्रह-सोलह वर्ष पश्चात् उसी रास्ते से उसी गाँव को जा रहे थे। पालकी में सवार थे क्योंकि उस समय आपका बुढ़ापा था और अत्याधिक कमज़ोर हो गये थे। जब आप बाग़ पर पहुंचे तो पालकी रोकवाकर उतर गये समय के फेर ने उस बाग़ को उजाड़ दिया था। आप उस बाग़ के उसी वृक्ष के स्थान पर गये और थोड़ी देर विश्राम करने के बाद फिर पालकी पर सवार हुए। अपने साथ वालों से कहा जब हम पहली बार इस रास्ते से गुजरे थे तो इस स्थान पर एक छायादार वृक्ष था। यह विशेषता आप में सदैव पाई गई कि आप जिस मकान अथवा स्थान पर प्रथम बार जिस ओर मुंह करके बैठे, उठे और आराम किया हमेशा आप उसो प्रकार व्यवहार करते रहे कभी आचरण में अन्तर नहीं आ पाया।



