During 8H the Prophet (s.a.) deputed Khalid bin Walid with a group of Companions to Yemen for propagating the Message of Islam there. He stayed there for six months, but the efforts didn’t bear any fruits. There was no positive reaction from the people there.Bara ibne Aazib, who was a member of the delegation, says:
“The Prophet (s.a.) sent Khalid ibne Walid to Yemen
for inviting people to the Faith.
I was one of the persons sent with him.
He stayed there for six months,
but none paid any heed to him.
Ref: Tareeq e Tabari, Vol 2, Page 289
When the Prophet (s.a.) learnt about the failure of the mission, he sent Ali ibne Abi Talib (a.s.) to take charge of the work. He asked him to send Khalid and his team back. Those from the team who wished to stay further in Yemen, they may be permitted to stay back. Bara ibne Azaib says that he preferred to stay on with Hazrat Ali (a.s.). When the Yemenis learned that Khalid was going and Hazrat Ali (a.s.) was replacing him, they were keenly interested and gathered at one place. After the morning prayers Hazrat Ali (a.s.) went to them and read the letter that the Prophet (s.a.) had sent for the people of Yemen. Then he delivered a Sermon on the virtues of Islam. The talk was so effective that the people who didn’t respond even after six months of Khalid’s efforts, embraced Islam. The Historian Tabari writes:
“The entire tribe of Hamadan embraced Islam in one day.”
Ref: Tareeq e Tabari, Vol 2, Page 390
When Hazrat Ali (a.s.) informed the Prophet (s.a.) about this event, he did a Prostration of Thanksgiving and said thrice: Assalaam ala hamadan
On Hamadan my Salam
.”
In the Battle of Siffin the tribe of Hamadan was solidly behind Hazrat Ali (a.s.). Seeing their exploits of valor, Hazrat Ali (a.s.) said:
“If I was the keeper to the Gate of Heaven,
I would have asked the Tribe of Hamadan
to enter peacefully.”
After the Tribe of Hamadan embraced Islam, the avenues for the progress and propagation of Islam opened up in Yemen. With the rays of the sun of knowledge, the darkness of infidelity was dispelled! In every nook and corner there were the voices witnessing the Unity of Allah!
होकर उच्च स्वर में कहने लगे कि यहां ताशा बजेगा, ढोल बजेगी और रोशन चौकी बजेगी। जब वह फकीर नवाब सादिक अली व नवाब अनवर अली के ऊँचे महलों तक पहुंचे तो उनकी कोठी के दरवाजे की ओर देखकर बोले, यह फाटक आदमी ढ़केल देगें। मियाँ के साथ एक दुनियां होगी । कभी अपनी मस्ती में सदा लगाते थे ‘कलवखा आवत है जो अब शराब न पी है वह कबहून पी हैं वह का कबहूना मिलिहे।’ झाड़ू शाह शहर की सम्पूर्ण गली कूंचों में उमंगपूर्वक आवाज़ देते रहते थे । हुजूर वारिस पाक की अगुआई में वहां के रईसों ने बहुत बड़ा प्रबंध किया। सम्पूर्ण गली कूचों और घर-द्वार पर बिजली के बल्बों द्वारा प्रकाश किया। जुलूस बाजे-गाजे के साथ हुजूर को नगर में लाया गया, उस समय पास पड़ोस ही नहीं वरन् दूर-दूर के लोग लगभग एक लाख से अधिक की भीड़ हुजूर की अगुवानी में साथ थी। नवाब सादिक अली खाँ के कोठे पर हुजूर को रखा गया। लोग चाहते थे कि आप थोड़ी देर विश्राम कर ले किन्तु भीड़ की उमंग और शौक की यह दशा थी कि नवाब के मकान का दरवाजा गिर पड़ा तथा भीड़ का एक अधिक भाग नवाब के कोठे पर वारिस-वारिस कहता हुआ पहुँच गया। लोग दंडवत प्रणाम कर विदा होते गये। नवाब ने यह विचार किया कि हुजूर की आत्माकर्षण शक्ति इतनी प्रबल है कि उस भीड़ को रोका नहीं जा सकता है। दरभंगा में लगभग एक लाख लोग शिष्य बने, जब तक आप दरभंगा में रहे वह मस्त फकीर झाडू शाह बराबर गलियों में घूमकर सदा (ऊँचे स्वर में आवाज़) देते थे कि शहर का हृदय परिवर्तित हो जायेगा, यदि अब न हुआ तो फिर कब होगा?
दरभंगा से हुजूर वारिस पाक पाड़ा की ओर पधारे। चलते समय उनकी पालकी के साथ बहुत से लोग एकत्र होते गये। दस कोस की दूरी तय करने पर लगभग १० हजार लोग उनके साथ हो गये थे। मिर्जा मुनइम बेग वारिस और नूर मुहम्मद शाह ने से प्रार्थना किया कि ये लोग उस समय तक साथ नहीं छोड़ेगें जब तक आप इनकी आत्मा को शान्ति प्रदान कर विदा न करगें। हुजूर ने कहा, ‘अच्छा हमारी पालकी किसी टिले पर रख दो और पुकार कर कह दो जिसे शिष्य बनना है वह हमारी पालकी छूले।’ अतः ऐसा ही हुआ लोग आदर सहित पालकी छूते-चूमते और आँखों से लगाते थे। तत्पश्चात् एक दूसरे से गले मिलते और प्रसन्न होते थे।
मुंशी अब्दुल गनी वारसी लिखते हैं कि जब हजरत वारिस पाक सैय्यद सालार ग़ाजी रह० के उर्स में शामिल होने के लिए बहराइच गये तो लोगों की भीड़ इस तरह टूट-टूट कर गिर रही थी कि साथ के लोग व्याकुल हो उठे। सरकार को मज़ार
तक पहुँचना कठिन हो गया। पुलिस ने भी प्रयत्न किया किन्तु विफल रहे । अन्ततः मज़ार की पच्छिम ओर की मस्जिद की चार दीवारी पर बैठ गये और विश्वासपात्र जनों के आग्रह शिष्य बनाना आरम्भ कर दिया। आपने चादर लटका दिया लोग उसको हाथों में पकड़ते-चूमते और शिष्य होते चले जाते थे। लगभग दो घण्टे तक यह क्रम चलता रहा। हुजूर की वापसी में प्रयत्न के पश्चात् भी भीड़ से छुट्टी नहीं मिली किसी प्रकार आपको विश्राम स्थल तक पहुँचाया गया। रात्रि के भोजन का निमन्त्रण ठाकुर फतह मुहम्मद खाँ तअल्लुकेदार का था । विश्राम स्थल से ठाकुर साहब का महल एक कोस पर था। जमीदार साहब की डयोढ़ी से भोज्य पदार्थ सुसज्जित ढंग से चला। ठाकुर स्वयं ला रहे थे। रास्ते में आतिशबाजी छूटती और बीस-बीस कदम पर कव्वाली- संगीत इत्यादि होती आती थी। तीन दिन तक हुजूर. वहाँ टिके हुए थे। बहराम घाट पहुँच कर आप ने कहा ‘गनी खाँ जो जिसको मिलना था मिल गया। परिश्रम से कुछ नहीं । हाँ! श्रम का इतना प्रभाव अवश्य है कि मजदूर को मजदूरी मिल जाती है । यह बात कि मन तू शुदम तू मन शुदी (मैं तू और तू मैं हो जाऊं) कठिन है। श्रम तथा प्रयत्न से अन्य लाभ प्राप्त होते हैं जो ज्ञान और कर्तव्य से सम्बंधित होते हैं। मैं और तू का झगड़ा मिटाना प्रेम का कार्य है। प्रेम पर किसी का वश नहीं । प्रेम का वश सभी पर है । सम्पूर्ण संसार का मूल प्रेम है।’
मौलवी हाजी नसीरूद्दीन साहब फतहपुरी ब्यान करते हैं कि मैं एक बार ग्राम चन्द्रा मऊ, परगना मोहलदारा सनईघाट, जिला- बाराबंकी गया। हम ने देखा कि मस्जिद की पर्दा की दीवार दो हाथ गोलाई में टूटी हुई है। मैंने इस छेद (सूराख) के सम्बंध में वहां के लोगों से पूछा। उन्होंने मुझ से बताया कि एक बार हजरत वारिस पाक यहाँ पधारे थे। इलाके के लोग एकत्र हो गये। उस रोज़ जुमा था। लोगों की भीड़ सरकार वारिस पाक को देखना चाहती थी। लोग सोच रहे थे कि जुमा की नमाज़ बाहर ऐसी जगह हो कि सभी लोग हुजूर का दर्शन कर सकें। आप ने लोगों की परेशानी का ख्याल कर कहा ‘मस्जिद की दीवार जो बाहर है उसमें छेद कर दो। लोग बाहर खड़े हो जायें और उस छेद से देखते रहेंगे। अतः ऐसा ही हुआ और ये सूराख अब तक हुजूर की याद में मौजूद है। जहाँ हुजूर होते दर्शनार्थियों की भीड़ लग जाती थी। इस खिंचाव का वर्णन कठिन है। ऐसी दशा में हुजूर एक-एक करके लोगों को कैसे शिष्य बनाते। ऐसी दशा में चेला बनाने की दो ही सूरत थी। जब कभी भीड़ कम होती तो आप एक-एक को हाथ पकड़ा कर शिष्य बनाते और जब लोगों की भीड़ अधिक हो जाती तो आपके एहराम को पकड़
कर लोग चेला बन जाते या कभी आपने ये कहा कि जिसने मुझको देख लिया वह मेरा शिष्य हो गया। यह सरकार की आत्मशक्ति का बाहुल्य था कि लाख आदमी देखकर या पालकी छू कर शिष्य हो जाते थे। आपके शिष्यों की संख्या अनगिनत थी कोई हिसाब नहीं था।
हकीम मौलवी महमूद अली साहब लिखते हैं कि वारसी समूह एक ऐसा असीमित ब्याबान है जिसका कोई ओर छोर नहीं है। इस जंगल में लाखों करोड़ों प्रकार के प्राणी छिपे हुए हैं जिनका पता करना बहुत कठिन है। जो जिस रंग में है उसी में परिपूर्ण हैं। प्रेम और दर्द से कोई खाली नहीं है। वारसी गुलामों की पहचान यही प्रेम और इश्क का रंग है। चाहे जिस भांति कोई आपके सिलसिले में आया सभी को आप जानते पहचानते थे। जब कोई शिक्षा-दीक्षा के लिये आपके पास उपस्थित हुआ आप उसे शिक्षा देते थे। कभी आप अपने शिष्यों में से किसी को भूलते नहीं थे। आत्मबल का इतना जोर था कि जो आपको देखकर चेला हुआ उसे भी आप याद रखते थे। काजी अब्दुर्रज़्ज़ाक साहब जो सूफी मुहम्मद हुसेन साहब के शिष्य थे ब्यान करते है कि एक बुजुर्ग ने हाजी वारिस पाक से पूछा किं अनगिनत लोग आपके शिष्य होते हैं इसका कारण क्या है? आपने कहा ‘क़यामत के दिन मैं सबको खुदा के सम्मुख कर दूंगा कि तेरे इतने बन्दों ने मेरे हाथ पर तोबा किया है मैं गवाही देने को तैयार हूँ। वह दयावान तथा कृपा निधान है। विश्वास है कि अवश्य ही दया और कृपा करेगा।
– मौलाना हाजी अबू मुहम्मद अली हसन साहब अशरफी अल जीलानी गी धारी किछौछा शरीफ लिखते हैं कि दिल्ली में एक फकीर से मुझे मिलने का इत्तेफाक हुआ। बातचीत के मध्य हाजी साहब किब्ला की चर्चा आ गई। उन्होंने कहा कि इस आन्तरिक शक्ति का फकीर इस जमाने में कोई न होगा। हजरत दिल्ली स्टेशन पर रेल गाड़ी में सवार होने के लिए विद्यमान थे। सैकड़ों मर्द औरत, गुरूशिष्य सम्बन्ध स्थापन करने हेतु सेवा में उपस्थित थे। आपने आदेश दिया ‘जाओ हम ने सबको अपना शिष्य कर लिया।’ आन की आन में सब चेला हो गये। यह आत्म-शक्ति का कमाल था। हाजी साहब की बड़ाई कम नहीं थी और ब्यान करने की मुहताज थी। इस प्रकाशमयी हृदय फकीर ने जो कुछ कहा आन्तरिक दृष्टि से सम्बन्धित था। आप, कादरिया, रज्जाकिया, चिश्तिया, निजामियां सभी सम्प्रदायों में शिष्य करते थे। जब लोगों को अलग-अलग चेला बनाते थे तो निम्नांकित शब्द कहलवाते थ हाथ पकड़ता हूँ पीर का, हाथ पकड़ता हूँ ख़ुदा और रसूल का, हाथ पकड़ता हूँ पंजतन पाक का।’ कभी-कभी आप कुछ विशेष हिदायत भी करते थे। जब बहुत से लोगों को एक साथ शिष्य करते तो उक्त वाक्य सेवक लोग ज़ोर-ज़ोर से कहकर दोहरवातें थे। हुजूर वारसी पाक के शिष्य करने के शब्दों में नवीनता पाई जाती है। अन्य पीर लोग दूसरे शब्दों को कहवाकर शिष्य करते थे। शिष्य होने के समय के इन शब्दों की व्याख्या का वर्णन मौलवी रौनक अली साहब वारसी लिखते हैं के एक बार हजरत वारसी पाक पैंतेपुर में विद्यमान थे। आपके सेवक, शिष्य और गुदड़ी धारी फकीर एक स्थान पर बैठ कर आपस में बातें कर रहे थे कि हुजूर बिल्कुल नये ढंग से मुरीद करते हैं। ये शब्द, हाथ पकड़ता हूँ पीर का, ख़ुदा और रसूल का पंजतन पाक का, इसमें क्या रहस्य है और कौनसा भेद निहित है? दूसरे ब्रह्मवादी गुरू इस प्रकार के वाक्य इस क्रम से नहीं कहलवाते हैं। सब अपनी-अपनी समझ के अनुसार कुछ बातें कर रहे थे। शाह मकसूद अली वारसी एक कोने में चुपचाप बैठे हुए थे। लोगों के कहने पर शाह मकसूद अली वारसी ने कहा। अल्लाह के एक होने (वहदानियत) रसूल से रसालत और पंजतन पाक से अहलेबैयअत का इकरार और भरोसा है। इसमें हजरत फ़ातिमा ख़ातून जन्नत का वास्ता शफाय का सम्बन्ध है जिस परी को ख़ातून जन्नत की रूहानियत प्राप्त होती है वही औरतों के शिष्या बनाने या मुरीद करने अथवा बैय्यत लेने का हक रखता है। जब सभी लोग सरकार वारसी पाक के समक्ष उपस्थित हुए तो आप ने कहा ‘हम पंजतनी हैं, हम पंजतनी हैं, मकसूद सच कहता है।’ औरतों की बैय्यत करते समय आप एहराम का दामन पकड़वाते और मुँह फेर लेते थे। हिन्दू लोगों को चेला बनाते समय यह सीख देते थे ‘ब्रह्म पहचानों, पत्थर न पूजो, झटका न खाओ।’ अंग्रेज़ या यहूदी को शिष्य बनाते समय कहते ‘देखो! मूसा कलीमुल्लाह, ईसा रूहुल्लाह, मुहम्मद रसूलल्लाह किसी को बुरा न कहना, हराम न खाना।’ आपकी सीख थी, हाथ के सच्चे रहना, अत्याचार न करना, दर्ज़ी के लिए कपड़े न चुराना, कम न तौलना’ इत्यादि।
बैय्यत (शिष्य) होने की घटनायें
हुजूर वारिस पाक से बैय्यत होने वाले लोगों की संख्या गिनती से बाहर है जहाँ तक देखा सुना गया है कि एक-एक समय सैकड़ों हजारों लोग सरकार को देखकर या छूकर शिष्य हुए हैं। इन सबका लेखा-जोखा रखना असम्भव है किन्तु कुछ विशेष घटनायें जो प्राप्त हुई हैं अंकित किये जाते हैं। जिनसे खुदा की शान दिखाई देती है तथा बहुत से रहस्य प्रकट होते हैं। हज़रत वारिस पाक की यह मुख्य विशेषता थी किसी दूसरे पीर (धर्मगुरू) के चेले यदि आप से शिष्य होना चाहते तो आप उनको चेला नहीं बनाते थे। हाफिज अब्दुल कादिर फतहपुरी जो एक बृद्ध बुजुर्ग हैं और वे सरकार वारिस पाक के जवानी के ज़माने को देखे थे, ब्यान करते हैं एक बार • सरकार वारिस पाक की सेवा में दो आदमी हाजिर हुए और पूछा कि यदि किसी का पीर पर्दा कर जाय (शरीर त्याग कर दे) और मुरीद कुछ प्राप्त करना चाहे तो दूसरा गुरू बना सकता है या किस तरह प्राप्त कर सकता हैं। मुरीद को पूर्ण विश्वास करके मुरीद होना चाहिए, चेला हो तो मिट्टी की ढेर से प्राप्त कर सकता है। चौधरी खुदा बख्श स्वयं ब्यान करते हैं कि मैं सरकार के पास था हजरत फ़ज्जल रहमान का एक शिष्ये हुजूर के पास शिष्य होने आया। आप ने उससे कहा ‘हर जगह एक ही शान देखें। जगहजगह शिष्य होना मर्दों का ढंग नहीं, ये हरजाई औरतों का तरीका है। प्रयत्नशील होने के पश्चात् भी आपने उस को शिष्य नहीं बनाया।’
एक दिन हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत हसन और हज़रत हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हुम के रोने की आवाज़ सुनी तो आप जल्दी से घर तशरीफ़ ले गये और हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा से फ़रमाया मेरे बेटे क्यों रो रहे हैं? हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा ने अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! इन्हें प्यास लग रही है। इस वक़्त पानी यहां मौजूद नहीं है। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ्रमाया इन्हें इधर लाओ। चुनांचे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पहले हसन को उठाया और अपनी जुबान मुबारक उनके मुंह में डाल दी। हज़रत हसन ने हुजूर की जुबान चूसना शुरू की और उनकी प्यास जाती रही और चुप हो गये। फिर आपने हज़रत हुसैन को उठाया। उनके मुंह में भी जुबान डाली और वह भी जुबान मुबारक चूस कर चुप हो गये ।
(हुज्जतुल्लाहु अलल-आलमीन सफा ६८१ ) सबक : हज़रात हसनैन (यानी हसन व हुसैन) रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम को किसी किस्म की तकलीफ़ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तकलीफ देती थी फिर जिन ज़ालिमों ने हज़रत हसनैन को सताया और शहीद किया तो उन्होंने हुजूर को किस केंद्र रंज पहुंचाया। यह भी मालूम हुआ कि हुजूर सर से पा तक भौजिजा हैं कि अपनी जुबाने मुबारक चुसाकर ही प्यास बुझा दी। आज जो लोग हुजूर की मिस्ल बनते हैं वह तो अपने नवासे के मुंह में जरा जुबान डालकर दिखायें बहुत मुमकिन है कि वह उस गुस्ताख़ की जुबान ही चबा डाले।