मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-28

मीलाद शरीफ़

जवानी के जामाने में सरकार वारिस पाक मीलाद शरीफ की महफिलों में अधिक सम्मिलित होते थे और समाप्ति पर पंज सूरह स्वयं पढ़ते तथा वहाँ जो भी हाफिज कारी होते सबसे पढ़वाते थे। आदर तथा सम्मान सहित आप खड़े होकर सलाम पढ़ते और लोगों से पढ़वाते भी थे। आप स्वयं मीलाद का प्रवन्ध करवाते और आदर सम्मान सहित खुद महफिल करते थे। शाह अबू मुहम्मद अली हसन अशरफी अल जीलानी कहते हैं कि हुजूर वारिस पाक के पर्दा करने के दो तीन वर्ष पूर्व देवा शरीफ जाने का ईरादा किया और मेरे पहुँचने से एक दिन पहले देवा शरीफ में हाजी साहब किब्ला ने फज़ल हुसेन साहब वारसी को आदेश दिया, मिठाई तैयार कराइए कल मीलाद शरीफ होगा। दूसरे दिन मैं दस बजे देवा शरीफ पहुँचा और शाह फज़ल हुसेन साहब के पास ठहरा । बातों के बीच उक्त शाह साहब ने मुझसे कहा कि आप ने अपने आगमन की सूचना किबला हाजी साहब को दिया होगा जो सरकार ने मिटाई तैयार करवा रखी है। मैंने कहा भाई कोई सूचना नहीं । ज्ञान प्रकाश से प्रकाशित अवलिया – अल्लाह के मन प्रकाशमयी होते हैं। उसी दिन मीलाद की महफिल की गयी। तत्पश्चात् हाजी साहब में श्री शाह फजल हुसेन शाह वारसी को आदेश दिया ‘कल फिर शाह साहब से मवलूद शरीफ पढ़वाओ।’ फिर मिठाई तैयार हुई और दूसरे दिन मीलाद समाप्ति के पश्चात् हाजी साहब से बिदा हुआ।

ग्यारहवीं शरीफ

मीलाद शरीफ की तरह आप को ग्यारहवीं शरीफ की मजलिस का भी बहुत शौक था। ऐसी सभाओं से आप आनन्दित होते थे। जीवन के मध्य भाग से पूर्व आप स्वयं इस महफिल का प्रबन्ध कराते थे तथा सम्मिलित होते थे। यह आचरण अन्त तक भी रहा किन्तु थोड़ी देर हेतु। जब कोई ग्यारहवीं की नज़र आपके सामने लाता तो आप फातिहा दे देते थे।मौलवी बशीर जमां साहब निवासी सन्डीला लिखते हैं कि एक वर्ष संयोगवश मैं ग्यारहवीं के सुअवसर पर देवा शरीफ में उपस्थित था। मैंने नियमानुसार हजरत गौस समदानी महबूब रब्बानी की नज़र के लिए मिठाई मंगवाई। मंगवा कर हुजूर वारिस पाक की सेवा में फातिहा देने के लिए पेश किया। उस समय विश्राम कर रहे थे। फौरन उठ बैठे और मुझको नज़र पेश करने का इशारा किया। अपनी विधि के अनुसार जैसे ही मैं उठना चाहा हुजूर ने कहा बैठ जाओ। आदेश का पालन करते हुए मैं बैठ गया किन्तु शीघ्रता से उठने-बैठने के कारण मेरे पैर की नस चढ़ गयी और अत्याधिक कष्ट होने लगा। मैंने हुजूर वारिस पाक की ओर देखा। आप दोनों हाथ उठाये फातिहा पढ़ रहे थे और अधखुली आँखों से मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे। इतना कष्ट होते हुए भी मैं रोमांचित और आनन्द विभोर हो रहा था। थोड़ी देर में फातिहा पूरा हो गया और सरकार ने मुझे मिठाई देकर बिदा कर दिया। देखा गया है अन्तिम समय में आप बैठकर फातिहा देते थे परन्तु जो खड़े हो जाते उनको रोकते नहीं थे।

मोहर्रम शरीफ

अन्य रस्मों बारावफात, ग्यारहवीं शरीफ की तरह आपको मुहर्रम से भी आन्तरिक लगाव था। ताज़िया वाले घरों पर आप जाते थे। कभी बैठते थे और कभी थोड़ी देर खड़े रहकर लौट आते थे। जीवन के अन्तिम चरण में आप केवल देवा शरीफ में दो ताज़ियों तक जाते थे। छोटी बीबी और घसीटे मियाँ की ताज़िया तक। प्रातः बस्ती के सभी ताजिये आपके द्वार तक आते, उस समय आप बाहर खड़े होकर ताज़ियों को देखते रहते थे। जब ताज़िया वाले अपनी-अपनी ताज़िया लेकर चले जाते तो आप भीतर प्रवेश कर लेते थे। मोहर्रम की दसवीं और चालिसवें को आपके आदरयुक्त चौखट पर सबील रखी जाती थी। सरकार वारिस पाक मोहर्रम की प्रथम तिथि की रात में क़ुरआन अधिक पढ़ते थे। शेष तिथियों में मौन धारण रखते थे। मोहर्रम के दस दिनों में आप मरसिया भी सुनते और अहले बैत की वीरता की बात भी सुनते थे। किन्तु जब कोई बैन (रोदन या रोता) करता तो आप कहते यह गलत है। वह तो तसलीम रज़ा पर थे। ऐसा नहीं हुआ। ये सब तो रोने-रूलाने के लिए बनाये हैं।

कौव्वाली का शौक

पुराने बुजुर्गों से जो उस समय के थे सुना गया है कि हुजूर वारिस पाक को जीवन के आरम्भ में समाअ (कौव्वाली सुनने) का बड़ा शौक था। आप मजलिसों में बैठते भी थे किन्तु आपको हाल की दशा में बहुम कम देखा गया है। बाल्यावस्था की कुछ बातें लोगों में बहुत मशहूर हैं जिनके अनुसार एक दोबार आप द्वारा कैफियत प्रदर्शित है। एक बार हुजूर वारिस पाक को अजमेर शरीफ में समाअ कौव्वाली की मजलिस में कैफियत हुई कि सारे लोग मस्त होकर रोमांच में हो गये । जवानी के ज़माने से अन्त तक कभी आप की दशा ऐसी नहीं हुई जिसको देखने वाले वज्द (रोमांच) या हाल कहे । हुजूर अपनी दशा कैफियत आदि को बहुत छिपाते थे और किसी पर किसी दशा में अपनी अवस्था नहीं प्रकट होने देते थे । अन्त में आप साल भर में एक बार अपने आदरणीय पिता के मज़ार पर उर्स के दिन बैठते और दो चार पद सुनकर उठ जाते थे। हाँ ! यह बात अवश्य थी कि दोपहर की नमाज़ के बाद हाजी अवघट शाह वारसी सुन्दर स्वर में एक दो गज़लें सुनाते और आप आनन्द से सुनते रहते थे। उक्त उर्स में दो चार मिनट बैठने के बाद आप किसी कौव्वाली की मजलिस में सम्मिलित नहीं होते थे। हाँ! यह बात तो थी कि आप गाने वालों की सहानुभूति में गाने वालों को आदेश मिल जाता किन्तु बहुत कम समय तक । ऐनुल यक़ीन में लिखा है कि हुजूर वारिस पाक के अज़ीमाबाद पधारने पर सैय्यद मौलवी शरफुद्दीन साहब ने कौव्वाली का प्रबन्ध किया । बहुत से लोग एकत्र हुए। जब भीड़ अधिक हो गयी तो हज़रत मुहम्मद इब्राहीम बेग शैदा हुजूर की सेवा में जाकर हुज़ूर से समाओं में चलने की प्रार्थना किया। आपने कहा ‘मैं यहाँ से भी वैसा ही देखता हूँ।’ वारिस पाक के इस कथन से शैदा मियाँ विशेष अवस्था को प्राप्त हुए तथा उन्होंने वहीं से उस महफिल कॉ देखा | मध्य की दिवार भी ओट नहीं थी। ये देख कर शैदा मियां चुप हो गये फिर चलने का अनुरोध नहीं किया। सत्य यह है कि हुजूर वारिस पाक के सामने सब कुछ रोशन और प्रकट था।

Leave a comment