
तसदीक
किसी वस्तु की सत्यता का पूर्ण विश्वास ही तसदीक है अथवा किसी बात को भली-भांति जाँच परख कर उसका ज्ञान प्राप्त कर लेना ही तसदीक है। सूफी सन्तों का अर्थ है भली-भांति ईश्वर के गुणों तथा ईश्वर का पूर्ण विश्वास कर लेना है। हुजूर वारिस पाक तौहीद और इश्क की तरह तसदीक की भी शिक्षा देते थे जैसे ज्ञान तथा कर्म के सम्बन्ध में संकेत है जो बात जुबान से कही जाय वह तसदीक से भरी हुई हो। कथनी और करनी एक होनी चाहिए। वारिस पाक की यह शान थी कि जो लोग किसी ख्याल में सशंकित होते या किसी के मन और विचार में वह्म या शंका उत्पन्न होती तो उसको आप पुष्टि करा देते थे और आँखों से दिखा देते थे। यह बात सुप्रसिद्ध है कि वारिस पाक वह्नों तथा शंकाओं का समाधान बातों से नहीं कराते बल्कि निरीक्षण करा देते थे। बहुत सी घटनाओं से प्रमाणित है और हुजूर की बातों से भी इस समस्या पर प्रकाश पड़ता है। तसदीक प्रत्येक का भाग नहीं है। जिसको ईश्वर से नियामत प्रदान कर दे। आफ्ते एक बार कहा:
एक मौलवी साहब मदीना रास्ते में जाते समय बार-बार कहते थे, ‘इन्नल्लाहा
मअस्साबिरीन’ (बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है)। दोपहर को जब हवा गर्म हुई तो मौलवी साहब घबराये। उनके पास जो पानी था वह भी समाप्त हो चुका था। उस वक्त हमने कहा इन्नल्लाह मअस्साबिरीन बस मौलवी साहब खफा हो गये। बस जबान से कहना और है तथा दिल से तसदीक करना और चीज है।
एक बार आप ने कहा ‘मक्का मुअज्ज़मा’ में एक मौलवी साहब ‘नहनो अकरवो मीन हबलील वरीद’ का भाषण करते थे। उनके पास एक छोटी सी चादर थी। जब रात को सर्दी मालूम हुई तो हमारे पास कम्बल माँगने आए। हमने कहा नहनोअकरवो मिन हबलील वरीद से नही माँगते । इसके बाद हमने कहा जबानी जमा खर्च से काम नहीं चलता जब तक दिल से तसदीक न हो । हुजूर पाक से सुनें गये तसदीक के सम्बन्ध में कुछ कथन निम्न हैं:
१. तसदीक हज़ारों में से एक को होती है हर एक का हिस्सा नहीं। फिर इसके भी कई सूरते हैं। जबानी जमा खर्च से काम नहीं चलता।
२. अपने में जो साँस चलती है वही अस्तित्व (जात) है। बस तसदीक बहुत मुश्किल है।
४. ३. फी अनफो से कुम अफला तुवसेरून जो इसको समझ गया तसदीक हो गयीआदमी जब तक इश्क में काफिर नहीं होता। मुसलमान नहीं होता।
। ‘साहबे तौहीद होना आसान पर साहबे तसदीक होना मुश्किल है।’
५. जिसको यहाँ तसदीक नहीं वह काबा जाकर क्या करेगा? वहां जाकर सिवाय पत्थर के क्या देखेगा। खुदा तो हर जगह है काबा तो सिर्फ जेहत (तरफ, सिम्त, दिशा) है।
६. सोहबत (संगति) से कुछ हासिल नहीं जब तक मन उसकी पुष्टि न करे। ७. नमाज़ रोज़ा और है तसदीक और है। यद्यपि तसदीक माने सलात नहीं (तसदीक नमाज़ से रोकती नहीं है, किन्तु हालत लेहाज करने लायक है। । तसदीक और चीज़ है
८. किताबें पढ़ने से कुछ हासिल नहीं है1
सरकार वारिस पाक के पवित्र कथनों से विदित है तसदीक वह वस्तु है जो बिना मुरशिदे कामिल ( सत्य गुरू) प्राप्त नहीं हो सकती । तसदीक वह ज्ञान नहीं है जो पुस्तकों में हो तथा पठन-पाठन से प्राप्त हो सके। तसदीक की भिन्न-भिन्न सूरतें हैं। सबए सनाबिल से अधिष्ठाता फवायदुस्सालकीन से नकल करते हैं। हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रह० का कथन है कि मैं शेख़ युसूफ चिश्ती रह० की महफिल में बैठा था। एक व्यक्ति चेला होने के गरज़ से हाजिर हुआ और
यूसुफ चिश्ती के चरणों में सिर रख दिया। शेख जी उस समय विशेष दशा में थे कहने लगे यदि लाईलाह चिश्ती रसूलल्लाह कहो तो चेला बना लूंगा। वह व्यक्ति दृढ़ विश्वासी और सच्चा मर्द था उसने तत्काल दोहराया तथा शेख यूसुफ चिश्ती ने उसे मुरीद किया। फिर कहा ‘मैं क्या हूँ और क्या हो सकता हूँ? मैं तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सेवकों का एक सेवक हूँ। यह कलमा तसदीक की जाँच के लिए कहलवाया था ।
इस घटना से विदित है कि तसदीक की शक्ति भी खुदा की देन पर निर्भर है। हर व्यक्ति की यह योग्यता नहीं होती और न यह ज्ञान पुस्तक में है जो पढ़-पढ़ाकर • प्राप्त कर लिया जाय। देखा गया है कि सम्मानित उलमा तथा आदरणीय प्रयत्न शील लोग आन्तरिक ज्ञान वालों के दया पात्र बने हैं। उन्होंने सत्यता से स्वीकार किया है कि यह हिस्सा अल्लाह के आरिफों (पहचानने वालों) का हैं। ईमाम हब्बल रह० के हालात में अंकित है कि आप हज़रत बशर हाफी रह० की संगति में अधिक रहते थे। आपके चेलों तथा विश्वासपात्र लोगों ने आपसे प्रश्न किया कि अन्तिम ! धर्म ज्ञाता) हैं और मोहद्दिस (रसूले पाक की बातों के ज्ञाता) हैं । बढ़ जचरज की बात है कि आप ने एक मजनू और होश रहित फकीर से सम्बन्ध स्थापित कर रखा है सो आप को शोभा नहीं देता। ईमाम हब्बल रह० ने कहा जिन उल्लृम (जानकारी) का तुमने नाम लिया है। मैं उनसे अधिक जानता हूँ किन्तु बशर हाफी मुझसे कहीं अधिक खुदा को जानते हैं। हज़रत इमाम साफई रह० की यह दशा थी कि वे बड़े शौक से हज़रत बशर हाफी रह० के साथ घूमा करते थे तथा कहा करते थे :
मुझ से मेरे खुदा की बातें फरमाईये । हजरत ईमाम शाफई का कहना है पूरे विश्व का ज्ञान मेरे ज्ञान को नहीं पहुँचता और मेरा ज्ञान सूफियों के ज्ञान तक नहीं पहुँच सका और सूफियों का ज्ञान उनके पीर (धार्मिक गुरू) की एक बात तक नहीं पहुँच सका।
हजरत सुफियान सोरी रह० का कहना है कि एक रात मैं हज़रत फजील रह० के पास गया। क़ुरआन की आयतें, हदीसें तथा धर्म के महान लोगों के कथन ब्यान करता रहा, देर तक सत्संग रहा, फिर मैंने कहा यह रात कितनी पवित्र और धन्य है कि अच्छे अच्छे जिक्र अजकार (विवाद) होते रहे हैं। वास्तव में ऐसी सभा तन्हाई (एकान्त) से उत्तम है। हज़रत फजील तुम उस धुन में थे कि कहाँ से ऐसी बात लाकर मुझे खुश कर दो। मैं इस फिक्र में था कि कहाँ से ऐसा जवाब दूँ जो तुमको अच्छा -लगे। दोनों अपने-अपने ख्याल में खुदा को भूल गये। अतः मेरे निकट एकान्त में खुदा से लौ लगाना अति उत्तम है। इन बातों से प्रत्यक्ष ज्ञात होता है वाह्य ज्ञान, आत्म ज्ञान का पथ प्रदर्शन नहीं कर सकता। तसदीक वह जौहर है जो पुस्तकीय ज्ञान में नहीं है। सत्य यह है कि तसदीक, किताबों से प्राप्त नहीं होती। यह भेद आन्तरिक ज्ञान से सम्बन्धित है और ईश्वर के रहस्य ज्ञाता ही इसके वास्तविक गुरू हैं।

