मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-24

अद्वैत भाव (तौहीद)

सरकार वारिस पाक की एकताई और एकरंगी अद्वितीय थी । प्रत्येक तौर तरीके, ढंग में तथा आचरण सब में एक रंग पाया जाता था। जो भी आपके पास जाता वह एक रंग में रंग जाता था। आपके कथन से सिद्ध है कि इश्क का कमाल भी तौहीद का दर्जा है जो इश्क में पूरा उतरता है वही तौहीद में भी एक होता है आपकी बातों से ये बात साफ हो जाती है कि इश्क की मंजिल में अस्तित्व और गुण सभी एक हो जाते हैं अर्थात निर्गुण, सगुण सभी एक हो जाते हैं। आंशिक के इश्क । खूबी यही है कि आशिक माशूक हो जावे। जब आशिक स्वयं को नष्ट कर माशूक में विलीन हो जाता है तब वह माशूक हो जाता है और जो कुछ दोस्त से है वह उसका अपना है। यहीं से अद्वैत्यवाद प्रकट होता है। असलियत यह है कि इश्क और अद्वैत्यवाद परस्पर दोनों अनिवार्य हैं। पूर्ण अनुरागी ही अद्वैत्यवादी है जो प्रत्येक कण में माशूक के सिवा कुछ नहीं देखता है । हुजूर अनवर तौहीद ( खुदा को एक देखना, एक मानना तथा प्रत्येक वस्तु में उसका प्रकाश देखना) में इतना डूबे हुए थे कि उनके प्रत्येक शब्द तथा कार्य एवं व्यवहार से तौहीद के रहस्य प्रकट होते थे। में

मुंशी अब्दुल गनी साहब वारसी रईसपुर और अब्दुल गनी साहब जिला रायबरेली दोनों लिखते हैं कि हुजूर वारिस पाक मेरे मकान पर पधारे थे। मैं । मैं हुजूर के विश्राम हेतु गृह-कक्ष सजा रहा था। इसी बीच एक नौकरानी से कुछ भूल हो गयी। मैंने एक थप्पड़ उसके मुँह पर मार दिया और उसकी एक आँख पर चोट आ गई। वह रोने लगी। मैं दूसरे दिन हुजूर पाक को ले आने गया। प्रार्थना किया हुजूर मैं आपको घर ले चलने के लिए आया हूँ। आप ने कहा- हमारी आँख में चोट लग गयी है। हम नहीं जा सकते, मैंने बार-बार आग्रह किया किन्तु आपने यही कहा ‘हमारी आँख में चोट लग गयी है, हम नहीं जा सकते, अन्ततः बाध्य होकर मैं लौटचश्म बकुशा कि जल्वये दिलदार, मोतजल्लीस्त अजदरोदीवार

आँखों को खोलो कि वह प्यारा ईश्वर अपना प्रकाश प्रत्येक दीवार और दरवाजे से बिखेर रहा है। यह बात पूर्णतया सत्य है कि मानवरूप तथा व्यक्तित्व में जितना अधिक ईश्वर का प्रकाश प्रकट होता है अन्य किसी वस्तु में नहीं। यही कारण है मनुष्य योनि सम्पूर्ण योनियों से उत्तम और श्रेष्ठ मानी गयी है, जैसा हज़रत अब्दुल कादिर जिलानी रह० के हृदय पर ईश्वर की ओर से प्रकट होने वाली बातों (इल्हाम) से है। आप कहते हैं कि ईश्वर कहता है कि जैसा मेरा प्रकट होना मनुष्य में है वैसा किसी में नहीं।

हज़रत मौलाना अबुल हसन खित्कानी रह०, इन्नल्लाहा खलका आदमा अला सुरतहि’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं जब ईश्वर ने अपने गुणों को प्रकट करना चाहा तो संसार को प्रकट कर दिया। जब अपने को प्रकट करना चाहा तो आदम को पैदा कर दिया। अतः विदित है कि सम्पूर्ण संसार यदि ईश्वरीय गुण है तो मानव में वह स्वयं प्रकट है।

ऐ जाहिदे जाहिर बी अज कुर्ब चे मी पुरसी।

उदर मन व मन दर वै चूं बू ब गुलाब अन्दर । ऐ जाहिर देखने वाले जाहिद (परहेजगार) ईश्वर की निकटता का रहस्य क्या पूछते हो ? वह ईश्वर मुझ में और मैं उसमें इस प्रकार हूँ जैसे गुलाब के फूल में ख़ुश्बू होती है।

सही मुस्लिम में हजरत अबू हारेरा रजी० से नकल है कि खुदाबन्द करीम कयामत के दिन अपने बन्दों से प्रश्न करेंगे कि ऐ आदम के बेटों मैं बीमार हुआ तो तूने मेरी सेवा सुश्रुषा नहीं किया। वह अचम्भे से क्षमा याचक होंगे कि भगवान! तेरी कोई क्या सेवा कर सकता है ? पुनः भगवान कहेगा कि मेरे अमुक बन्दे की यदि तू सेवा करता तो वह मेरी ही सेवा होती। मैं उसके पास ही था, यथावत अपने बन्दों की भूख-प्यास तथा अन्य कष्टों को स्वयं से सम्बन्धित कर प्रश्न करेगा। स्पष्ट है कि ईश्वर से कोई स्थान रिक्त नहीं है तथा मानव के व्यक्तित्व में ईश्वर का प्रदर्शन पूर्णत: है। जैसा अन्य वस्तुओं में नहीं ये हकीकत है कि ईश्वर आकाश पर नहीं है। हम तुम में छुपकर सबको धोखे में डाल दिया है। बस एक सूरत को पकड़ ले ईश्वर मिल जायेगा। 1

१ – दर दीदा अयाँ तू बूंदी व मन गाफिल

दरसीना नेहाँ तू बूंदी व मन गाफिल

अज जुम्ला जहाँ निशाँ तोरा मिजुस्तम

खुद जुमला जहाँ तू बूंदी व मन गाफिल अनुवाद- हे भगवन! तू नेत्रों में था किन्तु मैं भुला हुआ था। हृदय में तू छुपा हुआ था किन्तु मैंने नहीं जाना सम्पूर्ण संसार में तुझे ढूंढा किन्तु तू ही स्वयं पूर्ण

संसार में था और मैं भटका हुआ था। तौहीद की समस्या (मसला) बड़ा नाजुक और कठिन है। तौहीद के पुजारियों की दृष्टि में प्रत्येक अच्छी-बुरी वस्तु समान होती है। किन्तु विचित्रता यह है कि संसार-विलीनता में भलाई बुराई दोनों सम्मिलित हैं। मानव मात्र भलाई को ही अपने से सम्बन्धित करता है। इस सम्बन्ध में वारिस पाक कहते हैं कि ‘अनल हक (हम हक हैं) और फनाफिल्लाह भी (ईश्वर में अपने को नहीं कर देना) ‘ होने को मौजूद हैं किन्तु ‘अनश्शैतान’ (मैं शैतान हूँ) या अनल यजीद (मैं यजीद हूँ) कोई नहीं बोलता। यह बात मुश्किल है। हुजूर वारिस पाक के कथन से स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर के अस्तित्व का नाम ‘अल्लाह’ इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण संज्ञायें गुणात्मक हैं। जाति (अस्तित्व) और सफाअत (गुण) को सूर्य और उसकी किरणों से उदाहरण देकर ब्यान किया जा सकता है। सूर्य को उस दशा में जब उसको किरणें प्रकट न हों सरलता से देखा जा सकता है किन्तु उस समय जब उसकी किरणें पूरे जोर पर चमकती हों तो उस पर दृष्टि जमाकर देखना कठिन है। इसी भांति ईश्वर के अस्तित्व (जात) की उसके अस्तित्व के पर्दे में देखना सरल हैं किन्तु गुणों के पर्दे में उसका दर्शन कठिन है। कारण है कि वहां कहर की शान का प्रदर्शन भी प्रत्यक्ष है। पथिक यदि सत्यपथ में विशेषताओं का पर्दा उठाना आरम्भ करता है तो ईश्वर की जात (अस्तित्व) तक पहुँच प्राप्त करने के लिए एक लम्बे समय की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त पथ भो कठिनाइयों से पूर्ण है। यदि सर्वप्रथम ही ईश्वर की ओर ध्यान मग्न होकर पथ और उसके स्थानों से गुजरने के पश्चात ईश्वर-विलीनता का पद प्राप्त हो जाता है। यही वह मुकाम या स्थान है जहाँ भक्त से वाणी अनलहक अथवा अनल्लाह अकस्मात उच्चारित हो जाती है। विशेषताओं के पदों को उठाकर ईश्वर तक पहुँचने वालों के पथ में विशेष कठिनाई होने के कारण बहुधा पहुँच कठिन हो जाती है। इसी कारणवश वारिस पाक का कथन है कि इन स्थानों अथवा अवस्थाओं को पार करना और विशेषता के कारणों में जिनका प्रदर्शन यजीद और शैतान में भी है। अपने आपको इस दशा में विलीन करना और कथन या वाणी अनल यजीद या अनश्शैतान बोलना कठिन काम है। सन्त सूफियों के निकट ईश्वर के नाम दो प्रकार से बंटे हैं। (१) जमाली (विशेषता और खूबसूरती की दशा) (२) जलाली (उत्तेजक भाव) । अतः हुजूर का यह भाव समझ में आता है कि जमाली (सालिक) गुणों में विलीन होना और ईश्वरीय ज्योति का दर्शन करना सरल है किन्तु जलाली गुणों को सहन करना कठिन काम है। इसीलिए कहते हैं अनलहक सब पुकारते हैं और फनाफिल्लाह होने के लिए भी मौजूद हैं किन्तु शैतान और यजीद होना कोई नहीं चाहता। यह बात कठिन है। वास्तव में वारिस पाक के कथन बहुत कठिन है आपके सम्पूर्ण वाक्य-उपवाक्यों में इश्क प्रेम तौहीद (ऐक्य) तसदीक (सच मानना और सच जानना) और यकीन (पूर्ण विश्वास) के शिक्षा से भरे हुए हैं। जिनकी व्याख्या के लिए पुस्तकें चाहिए ।

हुजूर पाक को सत्य-ज्ञानी दृष्टि में ईश्वर के अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं थी। यही आपकी शिक्षा भी थी। जैसा कहते हैं ‘मस्जिद-मन्दिर, गिरजा में जहां जायें एक शान के और कुछ न देखें यह वास्तविकता का जौहर है कि ईश्वर के अस्तित्व के मित्रा हर एक चीज का त्याग हो जाए क्योंकि हकीकत में वही एक सूरत है जो काबा, बुतखाना सब में प्रकाशमान है। वही एक रूप है जिसका प्रतिबिम्ब आदम और संसार में दिखायी देता है।

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