एक हाजतमंद

एक हाजतमंद

एक हाजतमंद शख़्स अमीरुल-मोमिनीन हज़रत उसमान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बारगाह में अपनी किसी हाजत के लिये हाज़िर हुआ करते थे। मगर उसमान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु उनकी तरफ तवज्जह न फ़रमाते थे, न उनकी हाजत पर गौर फरमाते थे। एक दिन वह हाजतमंद हज़रत इने हनीफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मिले। उनसे शिकायत की कि मुझे एक बड़ी ज़रूरत है मगर अमीरुल – मोमिनीन भेरी तरफ तवज्जह ही नहीं फ़रमाते हैं। हज़रत इब्ने हनीफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने फ़रमायाः तुम वुजू करके मस्जिद में जाओ और दो रक्अत नमाज़ पढ़ो। फिर यह दुआ करो।

इलाही! मै तुझसे सवाल करता हूं और तेरी तरफ़ हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नबीए रहमत के वसीले से मुतवज्जह होता हूं। या अल्लाह मैं हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वसीले से अपने रब की तरफ़ तवज्जह करता हूं कि मेरी हाजत रवा फरमाइए।

फिर यह दुआ पढ़कर अपनी हाजत को याद करना और शाम को मेरे पास आना ताकि मैं तुम्हारे साथ चलूं। चुनांचे उस शख़्स ने ऐसा ही किया और फिर अमीरुल – मोमिनीन हज़रत उसमान रज़ियल्लाहु तआला अन् के दरवाज़े पर हाज़िर हुए तो दरबान आया और हाथ पकड़कर अमीरुल-मोमिनीन के हुजूर ले गया। अमीरुल-मोमिनीन ने उसे अपने साथ मसनद पर बिठाया और फ़्रमायाः कैसे आये? उसने अपनी हाजत पेश की अमीरुल मोमिनीन ने फौरन वह हाजत पूरी कर दी। फ़रमाया कि इतनी देर तुमने यह हाजत हमसे ब्यान क्यों न की। फ़रमाया आइंदा जब कभी कोई हाजत हो हमसे कह दिया करो हम पूरी करेंगे। अब यह साहब बाहर निकले और हज़रत इब्ने हनीफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मिले और उनसे कहा खुदा आपको जज़ाए ख़ैर दे। अमीरुल मोमिनीन तो मेरी तरफ तवज्जह ही न फ्रमाते थे मगर आज तो उन्होंने बड़ी मेहरबानी फ़रमाई और मुझे खुद ही अंदर बुलाकर मेरी हाजत फ़ौरन पूरी कर दी। इब्ने हनीफ़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कहते हैं कि ख़ुदा की क़सम मैंने तुम्हारे बारे में अमीरुल-मोमिनीन से कुछ नहीं कहा मगर वाकिया यह है कि मैंने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा एक नाबीना हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अपने अंधापन की शिकायत हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से की सो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम वुजू करके दो रकअत नमाज़ पढ़ो और यह दुआ पढ़ो जो मैंने तुमको बताई है। ख़ुदा की कसम! हम उठने भी न पाये थे बातें ही कर रहे थे कि वह नाबीना हमारे पास बिल्कुल ठीक होकर आये जैसे कभी उन आंखों में कोई नुकसान हुआ ही न था। (तबरानी शरीफ़ सफा १०३, हाशिया इब्न माजा सफा १०० )

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