
सोने की अंगूठी
एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में बहुत सा ग़नीमत का माल हाज़िर था । हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसे तक़सीम फ्रमा रहे थे। जब सारा माल आप बांट चुके तो एक सोने की अंगूठी बच गयी । हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नज़रे मुबारक उठाकर सहाबए किराम को देखा और फिर नज़रे मुबारक नीचे कर लीं। फिर नज़र उठाकर देखा और हज़रत बरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को बुलाया। हज़रत बरा हाज़िर हुए। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया बैठ जाओ | बरा बैठ गये । हुजूर ने अंगूठी लेकर हज़रत बरा की कलाई थाम ली। फिर फ्रमाया पहन ले जो कुछ तुझे अल्लाह का रसूल पहनाए । हज़रत बरा ने वह अंगूठी पहन ली। इसके बाद दोस्तों ने हज़रत बरा से फ़रमायाः ऐ बरा! तुम यह सोने की अंगूठी क्यों पहनते हो? जबकि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इससे मना फ़रमाया। हज़रत बरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने सारा वाकिया सुनकर जवाब दिया कि जो अंगूठी मुझे खुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह फ़रमाकर कि ले पहन ले। पहनाई है। मैं क्यों न पहनूं? ( इब्न अबी – शैबा अल-अम्न वल-उला सफा १६८) सबक : सहाबाए किराम का ईमान था कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद ही शरीअत है। वह जिस चीज़ से रोक दें वह नाजायज़ है । वह जिस किसी को किसी चीज़ की इजाज़त दे दें तो वह उसके लिये जायज़ है। चुनांचे सोने की अंगूठी सारे मुसलमानों के लिये हराम और सिर्फ हज़रत बरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के लिये जायज़ । इसलिये हज़रत बरा रज़ियल्लाहु तआला अन्हु वह अंगूठी पहनते रहे।

