मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक- 7

सत्य साधकों का शिष्य होना

हुजूर प्रकाश पुंज वारिस पाक की ख़िलाफत और उत्तराधिकारी होने की ख़बर

साधारण जनता को हो चुकी थी। अतः एक बहुत बड़ी भीड़ ने बैय्यत किया। मौलवी रौनक़ अली साहब पैंतेपुरी का कहना है कि मेरे खानदान के लोग हज़रत शाह अब्दुर्रजाक बाँसवी की भविष्यवाणी अनुसार हुजूर वारिस पाक से मुरीद हुए । मिर्ज़ा मुहम्मद इब्राहीम बेग शैदा के पिता हुजूर जब चौदह वर्ष के थे तभी आपके शिष्य हुए थे। मौलवी फरखन्द अली निवासी कस्बा चौरासी, जिलालखनऊ के दादा शेख़ उम्मीद अली चौदह वर्ष की उम्र में शिष्य हुए थे। चौधरी (१२)

ख़ुदा बख्श साहब वारसी निवासी इटावा (आगरा) कहते हैं कि मेरे पिता जब शिष्य हुए तो हुजूर की आयु चौदह वर्ष थी।

हाफ़िज गुलाब शाह वारसी अकबराबादी जो अपने काल के संत और सूफ़ी प्रसिद्ध थे, अपनी शिष्यता की घटना स्वयं बतलाते थे जो निम्नलिखित है :

जब मैं मकतब में पढ़ता था उस समय मेरा एक सहपाठी किसी बुजुर्ग का शिष्य हो आया। उसने मुझसे भी अनुरोध किया कि तुम भी शिष्य हो जाओ। किन्तु मेरे मन में रह रहकर ये भावना उठती थी कि क्या मुरीद होना अनिवार्य है ? मुरीद होना चाहिये या नहीं होना चाहिये। उसी रात को मैंने एक सफेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग को यह कहते देखा कि मियां साहबजादे • यदि तुम्हारी इच्छा बैय्यत की है तो पूरब से एक बुजुर्ग आते हैं उनसे हो लेना। स्वप्न के पश्चात् मेरी बेचैनी बढ़ गयी और तीन वर्ष प्रतीक्षा में व्यतीत हो गये। जब-जब मेरा मन विह्वल हो उठता था वही सूरत सपने में तसल्ली दे जाती थी। तीन वर्ष बाद एक दिन वही सूरत स्वप्न में आयी और कहा कि उठो जाओ और ख़ोज लो वह बुजुर्ग पूरब से आकर एक सराय में ठहरे हुए हैं। रात के दो बजे थे हड़बड़ा कर उठा हाथ मुंह धोया और एक ओर जिधर मन ने स्वीकार किया चल पड़े। पहरेदारों ने रोकना चाहा मगर मैंने किसी की न सुनी। अपने हृदय के पथ-प्रदर्शन पर चलता हुआ मुहल्ला हींग की मण्डी के एक सराय के दरवाजे पर पहुंचा। पूरब से आने वाले बुजुर्ग के सम्बन्ध में द्वारपाल पूछा तो उसने द्वार खोल दिया। भीतर जाकर मैंने कमरों को झांकना आरम्भ किया। अंधेरे के कारण कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था तभी आपने आवाज़ दी ‘हाफिज़ गुलाब तुम आ गये।’ व्याकुलता से दौड़ते हुए पैरों पर गिर पड़ा। देखा आप मुस्कुरा रहे थे। मैंने घर चलने का आग्रह किया। आपने स्वीकृति दी । मेरी उम्र १९ वर्ष और हुजूर वारिस पाक की उम्र लगभग १३ वर्ष चार माह थी। सारांश ये कि हुजूर की १३, १४ वर्ष की आयु में अध्यात्म और आंतरिक ज्ञान प्रत्यक्ष रुप में परिलक्षित हो रहे थे। अनगिनत लोगों ने आपका शिष्य होकर लाभ उठाया। से –

हाफ़िज़ गुलाब शाह कहते हैं कि आपको पतंग उड़ाने का शौक था। आपने इसके लिए एक नया ढंग निकाला। रात में पतंग और डोर मंगवाते थे। लगभग आधा सेर डोर छोड़ देते थे। पतंग तीव्र गति से उड़ती चली जाती थी। उसकी उड़ान इतनी तेज़ होती थी कि डोर सम्हालना कठिन होता था।

मुंशी अब्दुल ग़नी खाँ वारसी रईसपुर लिखते हैं कि मेरी उम्र १६ वर्ष थी। मैंने एक व्यक्ति से सुना कि देवा शरीफ, जिला- बाराबंकी के एक राजकुमार हैं जिनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है। घर में ईश्वर का दिया हुआ सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति, माल-असबाब सब कुछ है किन्तु वह सबको त्याग कर फ़कीर हो गये हैं। आयु लगभग १३ वर्ष है। हज का शौक है। नाम पूछने पर हुजूर प्रकाश पुंज का पुनीत नाम बताया। मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मन में हुजूर का ख्याल करता था।

मुंशी अब्दुल ग़नी खाँ वारसी की शिष्यता हुजूर की युवावस्था में हुई उस समय आप छूरी और कटार मंगवाते और हाथ में लेकर अपनी अंगुलियों से उसकी धार का निरीक्षण करते। उसके लहू (खून) की बड़ाई और बखान करते थे।

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