शौके शहादत

शौके शहादत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन जहश रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने गुज्वए रहुद में हज़रत साद बिन अबी वक़्कास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से कहा कि ऐ साद ! आओ मिलकर दुआ करें। हर शख़्स अपनी ज़रूरत के मुताबिक दुआ करे और दूसरा आमीन कहे। फिर दोनों हज़रात नें एक कोने में जाकर दुआ की। अव्वल हज़रत साद ने दुआ की या अल्लाह जब कल लड़ाई हो तो मेरे मुक़ाबले में एक बड़े बहादुर को मुर्कार फ़रमा ताकि मैं उसको तेरे रास्ते में क़त्ल करूं । हज़रत अब्दुल्लाह ने आमीन कही। उसके बाद दुआ की ऐ अल्लाह! कल मैदाने जिहाद में एक बहादुर से मुकाबला करूं जो सख़्त हमले करने वाला हो। मैं उस पर शिद्दत से हमला करूं, वह भी मुझ पर ज़ोर से हमला करे। मैं बहुतों को क़त्ल करके शहीद हो जाऊं और शहीद होने के बाद काफिर मेरे नाक कान काट लें। फिर क्यामत में जब तेरे हुजूर पेश होऊ तो कहे कि अब्दुल्लाह तेरे नाक क्यों काटे गये? तो मैं अर्ज करूं या अल्लाहा शेरे और तेरे रसूल के रास्ते में काटे गये। फिर तू कहे सच है। मेरे ही रास्ते में काटे गए। तो हज़रत साद ने आमीन कहा। दूसरे दिन लड़ाई हुई तो दोनों हजरात की दुआयें इसी तरह कुबूल हुई जिस तरह मांगी थीं।

(खमीस व हिकायात सफा ६७)