
सबसे पहले लफ्ज़ *मासूमीन* का मतलब समझना जरूरी है
जिसका हिंदी तर्जुमा .
निरपराध, बेगुनाह।
पाप रहित।होना होता है फ़िक़ह और शरीयतन इसकी हद में अम्बिया और फरिश्ते आते है ! बेशक़ अंबिया और फरिश्तों की हिफाज़त अल्लाह करता है ताकि उनसे कोई खता ना हो ! पर हदीसो और तारीखों की किताबो में अम्बिया अलैहस्सलाम से भी ख़ता (जिसे फ़िक़ह में इस्तेहादी ख़ता माना गया है) हुई है जैसे आदम अलैहस्सलाम से गन्धम का फल खाना मूसा अलैहस्सलाम से एक लड़के का कत्ल हो जाना युनूस अलैहस्सलाम से अपनी उम्मत को उनके हाल पर छोड़ जाना नूह अलैहस्सलाम का अपने मुशरिक बेटे के लिए दुआ मांगना हुज़ूर अलैहस्सलाम का बद्र के काफ़ीरो को मुआफ़ करना फीर भी इन्हें मासूमीन कहा गया है क्योंकि इनसे बहोत बड़ा गुनाह अब तक सामने नही है इसके साथ फ़ितरूस जैसे फरिश्ते से भी ख़ता हुई है लेकिन फिकह मे ये इश्तेहादी ख़ता में से है ! अब बात करते है अहले बैत अलैहस्सलाम की तो आज इनकी कोई ख़ता बता सकता है कुरान में सूरह अहजाब إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّـهُ لِيُذْهِب َ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
अहले बैत! तुम से *बड़े किस्म के गुनाह का मैल* (और शको-नुक़्स की गर्द तक-) दूर कर दे और तुम्हे तहारत(कामिल) से नवाज़ कर बिल्कुल पाक साफ करदे [अल-अहज़ाब 33 : 33]”
यह आयत से
और तारीख़ गवाह है अल्लाह ने अहले बैत को हर बड़े गुनाह से पाक और साफ रखा है इस बुनियाद पर हम उन्हें *मासूम* कह सकते है
आयात ए मुबाहिला : *फिर अये मेहबूब जो तुमसे ईसा के बारे में हुज़्ज़त करे इसके बाद तुम्हे इल्म आ चुका तो उनसे फरमा दो आओ हम बुलाये अपने बेटों और तुम्हारे बेटो को और अपनी औरतो और तुम्हारी औरतो को और हमारी जाने और तुम्हारी जाने फीर मुबाहिला करे तो झूठो पर अल्लाह की लानत डाले*
(Surah Al Imraan Ayat 61)
इस आयत से बहोत कुछ साबित होता है पर एक बात और साबित होती है कि अल्लाह के मेहबूब और उनकी आल सच्ची है
ثُمَّ قَالَ قَامَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمًا فِينَا خَطِيبًا بِمَاءٍ يُدْعَى خُمًّا بَيْنَ مَكَّةَ وَالْمَدِينَةِ فَحَمِدَ اللَّهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ وَوَعَظَ وَذَكَّرَ ثُمَّ قَالَ ” أَمَّا بَعْدُ أَلاَ أَيُّهَا النَّاسُ فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ يُوشِكُ أَنْ يَأْتِيَ رَسُولُ رَبِّي فَأُجِيبَ وَأَنَا تَارِكٌ فِيكُمْ ثَقَلَيْنِ أَوَّلُهُمَا كِتَابُ اللَّهِ فِيهِ الْهُدَى وَالنُّورُ فَخُذُوا بِكِتَابِ اللَّهِ وَاسْتَمْسِكُوا بِهِ
فَحَثَّ عَلَى كِتَابِ اللَّهِ وَرَغَّبَ فِيهِ ثُمَّ قَالَ
Translation :
हज़रत ज़ैद बिन अरक़म रादिअल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि
*एक रोज़ नबी ए करीम صلى الله عليه وسلم ने मक्का और मदीना के दरमियान उस पानी के मकाम में जिसे खुम कहा जाता है खड़े होकर खुतबा दिया जिसमें अल्लाह तआला की हम्द और सना की और वाज़ और नसीहत फरमाई फीर फरमाया : अये लोगो खबरदार हो जाओ मैं एक बशर हु अनक़रीब मेरे रब का क़ासिद आजाये और मैं उसका बुलावा कुबूल करलू और फरमाया के मैं तुम लोगो मे दो वजनी चीज़ छोड़े जा रहा हु जिनमे पहले तो अल्लाह की किताब है जिसमे हिदायत और नूर है तुम अल्लाह की किताब लो और उसे मजबूती से थाम लो फिर कितबुल्लाह पे उबारा और तरग़ीब दी फीर फरमाया दूसरी चीज मेरे अहले बैत है मैं तुमको अपनी अहले बैत के मुत्तालिक अल्लाह से डराता हु मैं तुमको अपनी अहले बैत के मुत्तालिक अल्लाह से डराता हु*
References :
(Sahi Muslim व हदीस की तमाम बुक्स में )
दूसरी हदीस जो सभी मोतबर किताबो में है
*हुज़ूर सल्लाहो अलैह व सल्लम ने फरमाया है कि सैय्यदना हसनैन का हाथ पकड़ कर कहा और इरशाद फरमाया की जिस शख्स ने मुझसे मोहब्बत रखी जिसने इन दोनों से मोहब्बत रखी और जिसने इनकी वालिदा सैय्यदा फ़ातिमा से मोहब्बत रखी और जिसने इनके वालिद हज़रत अली से मोहब्बत रखी वो शख्स मेरे साथ जन्नत में होगा*
(मुसनद अहमद)
*क़ुरआन और अहले बैत को थामने वाला गुमराह ना होगा*
*”और अल्लाह की रस्सी को मजबूती से थाम लो आपस मे सब मिलकर और आपस मे सब बिखर ना जाना”*
(Surah Al Imraan Ayat 103)
इस आयत के तहत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहस्सलाम फरमाते है :
*हम अहले बैत ही हुबलुल्लाह है*
(As Sawaiqe Muharika Pg : 101)
Hadees 07:
*हुज़ूर नबी ए करीम صلى الله عليه وسلم ने फरमाया मैं तुम्हारे दरमियान दो चीज़े छोड़ता हु जब तक इन्हें ना छोड़ेंगे हरगिज़ गुमराह ना होंगे एक किताबुल्लाह और एक मेरी आल*
References :
(Imam Hakim Al Mustadraq Vol : 04, Pg : 72, Kitab Marifat E Sahaba, Hadees : 4634)
(Imam As Sawaiqe Muharika Pg :145-146)
क्या अल्लाह के रसूल अपनी उम्मत को गुनहगारों के हाथों में सौप के जाएंगे (नौज़ुबिल्लाह) मतलब हदीस और क़ुरआन की रोशनी में ये साबित होता है की अहले बैत पाक और साफ है इन्हें मासूमीन कहने से अम्बिया के मर्तबे पर कोई फर्क नही पड़ता है वैसे मासूमीन अल्फाज़ कुरान में नही आया है लेकिन अल्फ़ाज़ की बुनियाद पर अम्बिया फरिश्ते और अहले बैत खरे उतरते है ऐसा कहना गुनाह हरगिज़ नही है! लोग अपने नन्हे बच्चों को मासूम कहकर पुकारते है और उलेमा कहते है कि वे लुगत में कहते है और जब बात अहले बैत की हो तो तूरन्त हदीस मांगते है सअज़्दे में सुब्हान रब्बिअल आला कहते है और अपने पीर को भी आला कहते है
अहले बैत को मासूम कहना उनकी मुहब्बत की अदायगी है हम उन्हें मासूम मानते है वरना कोई अज़ीम गुनाह उनसे साबित करो??

