ताज़ियादारी जाइज़ होने के शरई दलाइल (All About Taziyadari)

  1. AzmateTaziyadari
  2. TAZIYA DARI

 

-: *ताज़ियादारी जाइज़ होने के शरई दलाइल*
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मुहर्रम शरीफ़ नज़दीक है जिस में हम अहले सुन्नत व जमात के लोग रौज़ये इमाम आली मक़ाम हुसैंन अलैहिस्सलाम बनाते हैं जिस से कुछ लोगो को मिर्चे लगतीं है
महेज़ अपनी दुकानें चमक़ाने के लिये कुछ लोग बे वजह के दलाएल देकर अज़मते ताज़ियादारी पर शबखून मार रहें हैं ताज़िया नही बनाना चाहिये हराम है
ताज़ियादारी हराम हराम का नारा लगाने वालों ज़रुर पढो
अभी कल ही की बात है कि मैनें एक सहाब की पोस्ट देखी जिस पोस्ट मे उन्होने ताज़ियादारी हराम साबित करने की भरपूर कोसिश की पर एक भी मज़बूत दलील वो पेश न कर सके
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कुरान मजीद मे इरशादे बारी तआ़ला
-जो लोग अल्लाह तआला की निशानियों की ताज़ीम करते हैं ये फेल उनके दिलो का तक़वा है
सू. हज-32

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तफ़सीर व अहादीस मे लिखा है के हर वो चीज़ (शआरइरल्लाह) यानी अल्लाह तआला की निशानी है जिस को देख कर अल्लाह व रसूल और अल्लाह वाले याद आ जायें
अब आप बताये क्या ताज़िया देख कर आप को इमाम आली मक़ाम हुसैंन अलैहिस्सलाम की याद नही आती ?
(अज़मते ताज़ियादारी 111)

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मज़कूरा आयते करीमा से साबित हुआ कि ताज़ियादारी जाइज़ है क्योकि अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्ल. ने इसे हराम या नाजाइज़ नही फ़रमाया
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हर वो चीज़ जिसमें अल्लाह तआला का कोई अम्र या निशानी हो जिससे वो जाना पहचाना जाये और शआइरल्लाह से दीन की निशानियाँ मुराद हैं ख़्वाह वो मकानात हों जैसे कावातुल्लाह, अरफात मुजदल्फा सफा मरवाह मिना मस्जिद या वो शआइरे ज़माने हो जैसे रमज़ान हुरमत वाले महीने ईदुल फित्र ईदुल अज़हा योमे जुमा या आज़ान नमाज़ ख़त्ना ये सब शआइरे दीन हैं
(तफ़्सीर कुरतबी-6/382) (तफ़्सीर बग़वी 1/91)
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मालूम हुआ जिस चीज़ से अल्लाह तआला के मक़बूल व महबूब बन्दो की निसबत हो जाये वो चीज़ अज़मत वाली बन जाती है जैसे सफ़ा मरवाह पहाड़ हज़रत हाज़रा रदी. के कदम की बरकत से अल्लाह तआला की निशानी बन गये
सफ़ा मरवहा के सात चक्कर लगाना ये हजरत हाज़रा रदी. की यादगार है
कुर्बानी करना ये हज़रत इब्राहीम व हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की याद गार है मुक़ामे इब्राहीम के नज़दीक दो रकत नमाज़ अदा करना ये अल्लाह के ख़लील की यादगार है
तो अल्लाह तआला अपने महबूब बन्दो की यादगार का एहतमाम करता है
तो हम मुहिब्बाने अहलेबैत जब अल्लाह और उस के रसूल प्यारे महबूब इमाम हुसैंन अलैहिस्सलाम की यादगार (ताजियादारी) करने से क्यू रोका जाता
जो लोग ताजियादारी की मुख़ालिफ़त करते हैं उनके पास कोई मज़बूत दलील नही होती सिवाये कुछ फाजिले बरेलवी के फतवे के

ज़रा सोचो अहले सुन्नत वल जमात के मरकज़
अजमेर शरीफ मकनपुर शरीफ देवा शरीफ किछौछा शरीफ़ मुरादाबाद वगै़राह जो रूहानियत के मरकज़ हैं वहाँ की ख़ानक़ाहें रोज़ा ए इमाम हुसैंन से सजाई जाती हैं
“””हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास रज़ि. से मरवी है के हुज़ूर (स. त. अ. व.) ने इरसाद फ़रमाया “अगर किसी चीज़ की तस्वीर बनाना ज़रूरी समझो तो दरख्तों की या ऐसी चीज़ की तस्वीर बनाओ जिस मे रुह न हो”
(यानी जान दार न हो)
मिश्कात शरीफ़-386

अब मुझे बताओ के ताज़िया तो रोज़ाये इमाम हुसैंन अलैहिस्सलाम है
और उस मे जानदार की तस्वीर नही होती
सैय्यद अल्लामा मौलाना महबूब उर रहमान नियाज़ी जयपुरी अपनी किताब “मुहब्बते अहले बैत कुरान व अहदीस की रोशनी मे” मे फरमाते हैं के कुरान व अहदीस की रूह से जिन्हें अहले बैत से मुहब्बत नही वो मुनाफ़िक है मुहब्बत का तक़ाज़ा ये है कि जो चीज़ महबूब से निसबत रख़ती है तो मुहब्बत करने वाला उस चीज़ से भी निसबत रख़ता है तो जिसे अहले बैत से मुहब्बत होगी वो ताज़िये से भी मुहब्बत करेगा और ताज़िया रोज़ाये इमाम हुसैंन की नक़ल है
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मिसाल के तौर पर हाजी लोग हज करने जाते हैं तो मक्का मुक़रर्मा व मदीना मुनव्वरा से बहुत सी चीज़े अपने अपने मुल्क लाते हैं फिर उन चीज़ो को अपने रिश्तेदार दोस्त बग़ैराह को देते है तो लेने वाला शक्स इज़्ज़त से लेता है और उन चीज़ो की ताज़ीम करता है जब के वो दुसरे मुल्को से वहाँ बेचने के लिये लाई जाती है वहा बनतीं नही हैं फिर भी हम ताज़ीम करते हैं क्योकि वो चीज़ मक्का ए मुक़रर्मा व मदीना मुनव्वरा से निसबत रखती है
अब आप लोग अपने ज़ेहन से फ़ैसला करें
जब अल्लाह ने अपने महबूब बन्दो की यादगार को ज़िन्दा रखने के लिये उन की यादगारों को फर्ज़ और वाजिब कर दिया तो हमे अल्लाह व रसूल के प्यारे महबूब इमाम हुसैन की यादगार को ज़िन्दा रखना चाहिये य नही
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उल्माए अहलेसुन्नत पर एक नज़र

हज़रत शाह नियाज़ बे नियाज़ आप ताज़िये के तखत को बोसा दिया करते थे
(करामाते निज़ामिया 37)

हज़रत मुफ़्ती याकूब लाहौरी फ़रमाते हैं कि मुहर्रम अपने तमाम लमाजात के साथ करना जाइज़ है और ये अच्छा अमल है जो औलिया अल्लाह से साबित है
(तोहफ़तुन नाज़रीन 52)

हज़रत सय्यद अब्दुल रज़्ज़ाक बाँसवी रह. जिस वक्त ताज़िया उठता तो आप खड़े रहते और जब ताज़िया रुखसत होता तो आप नंगे पाँव ताज़िये के साथ जाते
(करामाते रज़्ज़ाकिया 15)

शाह कुतुबुद्दीन संभली का मामुला था आप के सामने ताज़िया आता तो आप खड़े होते और रोते रहते
(फ़तावा ताज़ियादारी 3)

शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी फ़रमाते हैं कि ताज़िये के सामने रखकर जो फ़ातिहा दी जाती है वो मुतबर्रक है
(फतावा अज़ीज़ी 1/189)
शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी का मामूला था के आप ताज़िये को काधा लगाते थे
(फ़ज़इले अहले बैत 35)

इस के अलावा और तमामी अहले सुन्नत के उलमा वा मशायक ने हमेशा ताज़ियादारी की और यादगारे हुसैंन मनाते रहे
और इसी तरह
इंशा अल्लाह हम आशिकाने हुसैंन जब तक ज़िन्दा हैं यादगारे हुसैंन मनाते रहेंगे और गमे हुसैंन मे रोते रहेंगे
कुछ हज़रात के पेट मे दर्द होता है गमे हुसैंन मे रोना नही चाहिये गमे हुसैंन नही मनाना चाहिय इस पर उनके पेट का इलाज करुंगा इंशा अल्लाह अगली पोस्ट में
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अगर आप भी रोज़ ए इमाम आली मक़ाम बनाते हैं तो शेयर तो बनता है

सहाबा के नाम पर आवाम को गुमराह करना।

 

मोहर्रम का महीना आते ही कुछ लोगो के पेट मे दर्द होता है और वो सहाबा की आड़ मैं ताजियादारी पर फतवे लगाते है जबकि ताजियादारी शरीयत से साबित है कि ये जायज है। मौलबी हज़रात ने एक बात फैला रखी है कि जो अहलेबैत से मोहब्बत करे वो शिया है। जबकि सहाबा का ये मामला था कि आप अहलेबैत से बेशुमार मोहब्बत करते थे हज़रत अब्बुबकर सिद्दीक र.अ. का ये मामला था कि आप हज़रत मोला अली शेरे खुदा के चहरे अनवर को तकते रहते थे आपकी साहबजादी हज़रत आयशा सिद्दीक र.अ. ने आप से पूछा अब्बा आप महफ़िल मैं मोला का चेहरा क्यो तकते है तो हज़रत अब्बुबकर सिद्दीक र.अ. ने फरमाया की बेटी अली के चेहरे को ताकना इबादत है। अब आप इस से अंदाज़ा लगाओ सहाबा की नज़र मैं अहलेबैत का क्या मकाम है अहलेसुन्नत वल जमात सहाबा के तौर तरीके पर चलती है तो आप ये सोचो कि जब सहाबा अहलेबैत से मोहब्बत करते है वो भी बेशुमार । तो आज जो अहलेबैत से मोहब्बत करता है उस पर शिया होने का फतवा क्यो लगाया जाता है। अहलेसुन्नत वल जमात वो है जो अहलेबैत से मोहब्बत करती है आज के ठेकेदार के अनुसार तो सहाबा भी शिया हो गए। लोगो को कुछ सवालों के साथ गुमराह कर दिया जाता है जैसे।

  1. तुम्हारे कोई मर जायेगा तो तुम ढोल बजाओगे क्या?

जवाब : ये सवाल ऐसा है कि जिसे इस्लाम का 1 % भी इल्म न हो वो इसी सवाल मैं मारा जाता है। मतलब कम अक्ल के लोग। पहली बात मौलबी हज़रात से पूछो की आप उन्हें मरा हुवा मानते है क्या? क्योकी जो मरा हुवा माने वो ही ये सावल करता है। ढोल तासे बजाए जाते है लोगो को बेदार करने के लिए की लोगो सुनो इमाम के नाम का डंका। जो जीतता है उसके नाम का ही ढोल बजता है । एलान के लिये और लोगो को बेदार करने के लिए ढोल शरीयत से जायज है आप किसी से भी पूछ लो। बहुत गांव मे सहरी के वक़्त ढोल बजाया जाता है ।

  1. लोग अलम को देख कर बोलते है कि जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्लाम का सर ए अनवर नेजे पर उठाया गया था वो है ये?

जवाब: अब इसे सुन कर वो लोग गुमराह होते है जिसने कभी वाक़्यात ए कर्बला पढ़ी नही। अब एक बात सोचो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिसलाम को 10 तारीख को शहीद किया गया तो 7 तारीख को उनका सिर ए अनवर नेजे पर कैसे आएगा। अलम वो होता है जो जंग के वक़्त किसी खास आदमी को दिया जाता है इसे आप ऐसे समझो कि जब दो देशो की लड़ाई हो तो देश का झंडा किसी आदमी के हाथ मे होता है। जब कर्बला की जंग शुरू हुवी तो हज़रात इमाम हुसैन अलैहिस्लाम ने अपने भाई हज़रत अब्बास अलमदार र.अ. को अलम दिया। हज़रत अब्बास अलैहिस्लाम का लक़ब भी अलमदार है वो इसी वजह से बोला जाता है। जो 7 तारीख को अलम उठाया जाता है वो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्लाम के नाम का अलम है। अब आप खुद समझ जाएं ये सही है या गलत।

  1. कुछ लोग बोलते है 7 तारीख को मेहंदी और सहारा चढ़ाया जाता है वो खुशी हो गई वो क्यो करते हो?

जवाब: अल्लाह हर चीज़ का सिला देता है कर्बला मैं जब जंग शुरू हुवी तो हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्लाम को हज़रत इमाम हसन अलैहिस्लाम का वादा याद आ गया कि हज़रत इमाम हसन अलैहिस्लाम के साहबजादे हसरत कासिम अलैहिस्लाम का निकाह करना है तो आपने अपनी साहबजादी के साथ निकाह किया। अब ये सब कर्बला मैं हो रहा है तो जाहिर है वहा इतने इंतेजाम नही है तो लोग उनके नाम की मेहंदी और सहरा करते है ये अल्लाह की तरफ से उनके इनाम है कि जिनकी मेहंदी नही हुवी उनकी मेहंदी और सहरा कयामत तक शुरू कर दिया।

 

  1. कुछ जाहिल लोग ताजियादारी मैं गंदे काम करने लगे जैसे नाच रहे है

जवाब: अब अगर आपमें थोड़ा भी दिमाग हो तो आप इस सवाल का जवाब खुद से पूछो की जब कभी तरावीह की नमाज होती है तो बहुत बच्चे पीछे हल्ला मचाते है तो आप नमाज रोको गे या बच्चों को रोकोगे।

  1. लोग बोलते है औरत बे पर्दा आती है?

जवाब: इसका सीधा जवाब है साहब आपने अभी इस्लाम को जाना ही नही। इस्लाम मे औरत का जितना पर्दा है उतना ही मर्द की आंखों का पर्दा है मर्द को ये चाहिए कि वो अपनी नजरे झुका ले और किसी बेपर्दा औरत को नही देखे। मगर अफसोस आपको औरत का पर्दा ही बताया जाता है कभी हदीस कुरान उठा कर देखो की मर्द पर कितना बड़ा पर्दा है। ये बात हुवी इस्लाम से। अब आप सुनो दुनिया के लायक बात जब औरत बेपर्दा बाज़ारो मैं गुमती है जब आपको पर्दे का ख्याल नही आता क्या? जब आप उसे अपनी बाइक पर बैठा कर गुमाते है तब आपको पर्दे के ख्याल नही आता क्या? जब अगर कोई साहब से पूछ लें तो साहब बोलते है ये मॉडर्न वक़्त है। जब ताज़ियादारी होती है तब इन्हें हदीस याद आती है कि बेपर्दा है। अबे जाहिलो ये बुग्ज़ है और कुछ नही। और सबसे बड़ी बात ऐसी बात करते हुवे मैने अक्सर उन लोगो को देखा है जो पूरी साल पर्दे का ख्याल तक नही रखते और मोहर्रम मैं उन्हें पर्दा याद आ जाता है।

  1. ताज़िया को दफनाना और कर्बला बनाना?

जवाब: जिनके जिस्म मुबारख को जगह नही दी गई आज अल्लाह ने उनके नाम की कर्बला हर जगह कर दी। जिन्हें बहुत दिनों तक दफनाया नही गया अल्लाह ने उनकी ताज़ियत को हर साल दफनाया।

  1. ताज़िया शरीफ बनाना?

जवाब: इस्लाम मे किसी का नक्शा बनाना जायज है शर्त है वो जानदार ना हो। भाई ताज़िया इमाम के रोज़े का नक्शा ही तो है। वो कैसे नाजायज हो सकता है। अब कुछ लोगों का दिमाग चलता है कि इमाम का रोज़ा मुबारख ऐसा थोड़ी है तो उन साहब से एक बात कहना चाहूंगा कि जब ताज़ियादारी शुरू हुवी तब इमाम का रोजा मुबारख ऐसा ही था। वक़्त के साथ वो तामीर हो गया। और वक़्त के साथ लोगो ने अपने अपने हिसाब से रोज़ा ए मुबारख का नक्शा बना लिया। जो बेशक जायज है बहुत लोगो के घरो मैं काबा शरीफ की तस्वीर है तो अदब के लायक है ना वैसे ही इमाम के रोज़े मुबारख का नक्शा भी अदब के लायक़ है।

”””””’क्या हैं ताज़ियेदारी”””””’

 

ये पोस्ट उन लोगो के लिए है!  जो ताज़िये को लेकर थोड़ा शक मै है! और इस पोसर पोस्ट को हर ग्रुप में शेयर  करे ताकि  लोगो का शक दूर हो !!!!!

शरीयत के 2 रास्ते हे (1) इल्मे शरीयत वाला  (2)  इश्क़ वाला

इल्म वाले लोग मुल्ला मौलवी होते है, और इश्क़ वाले लोग औलिया  अल्लाह,पीर  फ़क़ीर ,मलंग  होते है!!

          ये हे इल्मे शरीयत वाले लोग………..

बहुत सारे उल्मा,मौलवी,मुफ़्ती ने ताज़िये के खिलाफ  फतवा दे रखा  है! देवबंद,वहाबी,अहले हदीस,और यहाँ तक के अहमद राजा बरेलवी (आला हज़रात) ने भी इसे गलत बताया है!!

मौलवी लोग कहते है!  के एक राजा  था जिसका नाम तैमूर  था उसने ताज़िये की शुरुवात की थी!!और कुछ लोग ये भी कहते है के ये शियाओ का तरीका  है ये सब गलत हे मनगड़त बातें है क्योंकी जब ताज़ियेदारी हिंदुस्तान में शुरू हुई थी उस वक़्त शिया मज़हब का हिन्द मे वजूद ही नहीं था  !!  हक़ीक़त  कुछ और ही है!!!

 

ताज़िये की शुरुवात बग़दाद  से हुई है !  और हिंदुस्तान में इसकी  शुरुवात  12 सदी  से हुई है! हिन्द मे सबसे पहले ताज़िये  शरीफ बनाने वाले   शहंशा ए हिन्द नूरे  नबी औलाद  ए अली  हजरत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने बनाया था !  और आज तक ये सिलसिला  जारी है!!……..

इस्माइल  देल्हवी,अशरफ  अली थानवी,अहमद रज़ा खां  (आला हज़रत) और भी बहुत सारे मौलवी है  जिन्होंने  ताज़िये  को नाजायज़  बताया है! और आज के करीब  80%  मौलवी इसे गलत बताते है!!!  ये हे इल्मे शरियत  वाले लोग….

 

     आओ अब आपको में इश्क़ वाले लोग बताता हू !!

ये वो हस्ती है !  जिन्होंने ताज़िये को बनाया,ताज़िये मे शरीक  हुए और ताज़िये को कन्धा  दिया !!!

 

हजरत सैय्यद ख्वाव गरीब नवाज र.अ  (अजमेर)

हजरत सैय्यद ताजुद्दीन  सरकार र.अ (नागपुर )

हज़रत सय्यद वारिस पाक  र.अ (बाराबंकी लखनऊ )

हज़रत सैलानी  सरकार र.अ (बुलडाणा)

हजरत सैय्यद अब्दुल्लाह  हुसैनी  र.अ (तामिलनाडु )

हजरत शाह नियाज़  बेनियाज़  र.अ ( बरेली )

हजरत बाबा फरीद  गंज -ए-शकर  र.अ (पाकिस्तान)

हजरत सैय्यद खवाजा बन्दा नवाज गेसूदराज र.अ (कर्नाटक)

हजरत सैय्यद वसी मौहम्मद सरकार. (दौलताबाद )

और भी बहुत सारे औलिया अल्लाह हे जो ताज़िये ये में शरीख  होते थे!

अब फैसला  आप लोगो को करना है,800 से साल वाले  गरीब नवाज की मानोगे. या फिर आज के मौलवी का !  इल्म वालो की सुनोगे  या इश्क़ वालो की ?अगर आप किसी मौलवी को इन सब बुज़ुर्गो  से या फिर गरीब नवाज से भी बड़ा मानते हो तो ठीक है !!  फिर आप मौलवी की सुनो

मुझे तो ताज़िये में मौला हुसैन और कर्बला की यादे दिखाई देती है!   और. में तो इश्क़ वाला हु इसलिए ताज़ियेदारी  मरते दम तक जारी रहेगी !!

एक बात हमेशा ध्यान रखना के यज़ीद पलीद  भी मुसलमान था !!

और 72 शहीद में एक गैर मुस्लिम भी है हज़रत जौंन(र जी.) गुलामे अबु जर ये ईसाई  थे किसी ने कहा के इस्लाम कबूल  कर लो तो उन्होंने कहा ये जो सामने है ये भी मुस्लमान है!!!

मुस्लमान होना  ज़रूरी  नहीं है साहब आशिक़  ए हुसैन होना जरूरी है!!!!!

Taziya Sharif  Hawale Sai Ek Muktasar Wakya

Hazrat Syed Waaris E Paak

Radiyallahu Ta’Ala Anhu Khud Apne

Haathon Se Taziya Banate They

Saath Saath Taziya Ke Juloos Mein

Shirkat Farmate They Aur Taziya

Shareef Ko Kaandha Lagate They

Aur Badi Aqeedat Ke Saath Taziye

Adab O Ehtaraam Karte They,

Taziyon Ko Dekhte Waqt

Aapke Chehre Ki Ajeeb Haalat

Mushahide Mein Aati Thi Aur Der Tak

Aap Aalame Sukoot Mein

Rehte They (Mishkat Ul Haqqaniya

Safa No.214)

Hazrat Shah Abdul Azeez Mohaddis

Dahelvi Radiyallahu Ta’Ala Anhu Ka

Maamul Likkha Hua

Hai Ke Woh Taziya Ko Kandha Lagate

They (Asraarullahe BishShadatain

Safa No.9)

Hazrat Shah Nayaz Beniyaz

Radiyallahu Ta’Ala Anhu Barellvi Se

Logon Ne Daryaft Kiya Ke Huzoor

Taziya Daari Kya Hai? Sarkaar Shah

Nayaz Beniyaz Ne Farmaya Ke Agar

Tum Log Taziya Shareef

Bannte Ho Toh Mai Mana Nahin

Karunga Balki Mujh Se Jaha’n Tak

Hoga Taziya Shareef Ka Adab

Karunga Aur Dil Se Ehtaraam

Karunga Aur Aap Paabandi Se Uski

Ziyarat Karte They, Ek Baar Kisi

Molvi Sahab Ne Huzoor Shah Nayaz

Beniyaz Ke Is Maamul Par Etraaz

Kiya, Aapko Jalaal Aagaya

Chunanche Aapne Uski Gardan

Pakad Kar Taziye Ki Taraf Isharah

Karte Hue Ek Khaas Jazbe Ke

Saath Farmaya Molvi Dekh Kya Nazar

Aata Hai? Molvi Sahab Dekhte Hi

Behosh Ho Kar Gir Pade

Der Tak Issi Haalat Mein Rahe Hosh

Aane Par Rikkat Taari Ho Gayi Jab

Haalat Durust Hui Toh

Logon Ke Daryaft Karne Par Bataya

Ke Mujhe Hasnain Kareemain” Ki

Ziyarat Hui Jis Se Mujh

Par Behoshi Taari Ho Gayi Thi Mai

Bayan Nahin Kar Sakta Maine Kya

Nazaara Dekha Uske Baad

Unho Ne Apne Fasid Khayal Se Tauba

Kar Liya (Riyaz Ul Fazaeel Safa

No.229.230)

 

 

MAWLID-IN-NABIYY SALLALLAHU ‘ALAYHI WA-AALIHI WA-SALLAM According to Hadith Part 07

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam: 31

         

          “Hazrat Aboo Maryam (Sanaan) رَضِىَ اللهُ تَعَالىٰ عَنْهُ Se Marwi Hai Ki Ek Dehaati Shakhs Huzoor Nabiyye Akram صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Khidmate Aqdas Me Haazir Huwa. Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Us Waqt Tashreef Farma They Aur Aap Ke Paas Bohat Se Log Baithe Hu’e They. Us A’raabi Ne ‘Arz Kiya : (Ya RasoolAllah!) Kya Aap Mujhe Koi Aisi Shai De’nge Ki Mein Jis Se Seekhu’n Aur Use Sambhaale Rakkhu’n Aur Woh Mujhe Faa’eda Pahoncha’e Aur Aap Ko Koi Nuqshaan Na De? Logo’n Ne Use Kaha : Thehro, Baith Jaa’o. Is Par Huzoor Nabiyye Akram صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ne Farmaya : Ise Chhod Do, Be Shak Aadami Jaan Ne Ke Liye Hee Sawaal Karta Hai. Phir Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ne Farmaya : Is Ke Liye (Baith Ne Kee) Jagah Banaa’o. Yaha’n Tak Ki Woh Baith Gaya. Us Ne ‘Arz Kiya Ya RasoolAllah! Aap Kee Nubuwwat Ka Sab Se Pehla Mu’amala Kya Tha? Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمNe Farmaya : Allah Ta’ala Ne Mujh Se Mishshaaq Liya Jaisa Ki Deegar Ambiya-e Kiram عَلَيْهِمُ السَلَام Se Un Ka Mishshaaq Liya. Phir Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ne Yeh Aayate Mubaaraka Padhi :﴾Aur (Ae Habib! Yaad Kijiye) Jab Hum Ne Ambiya’ Se Un (Kee Tableeghe Risaalat) Ka Ahd Liya Aur (Khusoosan) Aap Se Aur Nooh Se Aur Ibrahim Se Aur ‘Isa Bin Maryam (عَلَيْهِمُ السَلَام) Se Aur Un Se Nihaayat Pukhta Ahd Liya.﴿ Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ne Farmaya : Aur ‘Isa Bin Maryam عَلَيْهِمَا السَلَام Ne Meri Bashaarat Dee. Aur Rasool Allah صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Waalida Mohtarma Ne Apne Khaab Me Dekha (Ki Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Wilaadate Mubaaraka Ke Waqt) Un Ke Badane At’har Se Ek Aisa Charaagh Raushan Huwa Jis Se Shaam Ke Mahallaat Tak Raushan Ho Ga’e.”

Ise Imam Tabarani Aur Ibn Abi Asim Ne Riwaayat Kiya Hai.

[Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Kabir, 22/333, Raqm-835,

Tabarani Fi Musnad Al-Shamiyyin, 02/98, Raqm-984,

Ibn Abi ‘Asim Fi Al-Ahadu Wa’l-Mathani, 04/397, Raqm-2446,

Suyooti Fi Al-Khasa’is Al-Kubra, 01/08,

Haythami Fi Majma’-uz-Zawa’id Wa Manba’-ul-Fawa’id, 08/224,

Ibn Kathir Fi Al-Bidayah Wa An-Nihayah, 02/323,

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam,/70_71, Raqm-31.]

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam: 32

          “Hazrat ‘Uthman Bin Abi Al-‘Aas رَضِىَ اللهُ تَعَالىٰ عَنْهُ Se Riwaayat Hai, Woh Farmaate Hain Ki Un Kee Waalida Mohtarma Ne Un Se Bayaan Kiya : Jab Wilaadate Nabawi Ka Waqt Aaya To Mein Sayyidah Aaminah رَضِىَ اللهُ تَعَالىٰ عَنْهَا Ke Haa’n Haazir Thi, Mein Dekh Rahi Thi Ki Sitaare Aasmaan Se Neeche Kee Taraf Dhalak Ke Qareeb Ho Rahe Hain, Yaha’n Tak Ki Mein Ne Mehisoos Kiya Ki Mere Oopar Aa Gire‘nge Aur Sayyidah Aaminah رَضِىَ اللهُ تَعَالىٰ عَنْهَا Ke Jisme At’har Se Aisa Noor Nikla Jis Se Poora Ghar Aur Haweli Jagmag Kar Ne Lagi Aur Mujhe Har Ek Shai Me Noor Hee Noor Nazar Aaya.”

Ise Imam Tabarani, Ibn Abi Aasim Aur Aboo Nu’aym Ne Riwayat Kiya Hai.

[Tabarani Fi Al-Mu’jam-ul-Kabir, 25/147, 186, Raqm-355, 457,

Ibn Abi ‘Asim Fi Al-Ahadu Wa’l-Mathani, 06/29, Raqm-3210,

Aboo Nu’aym Fi Dala’il-un-Nubuwwah, 01/93,

Bayhaqi Fi Dala’il-un-Nubuwwah, 01/111,

Mawardi Fi A’lam Al-Nubuwwah, 01/273,

Asqalani Fi Tahdhib-ut-Tahdhib, 07/117, Raqm-270,

Asqalani Fi Al-Isabah Fi Tamyiz-is-Sahabah, 08/259, Raqm-12163,

Mizzi Fi Tahdhib-ul-Kamal Fi Asma’-ir-Rijal, 19/408,

Haythami Fi Majma’-uz-Zawa’id Wa Manba’-ul-Fawa’id, 08/220,

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam,/72_73, Raqm-32.]

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam: 33

          “Hazrat ‘Abd Allah Bin ‘Abbas رَضِىَ اللهُ تَعَالىٰ عَنْهُمَا Se Riwaayat Hai Ki Sayyidah Aaminah Bint Wahb عَلَيْهِمَا السَلَام Bayaan Farmaati Hain : Jab Mein Rasool Allah صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Se Giraa’n Baar Hu’i, To Mujhe Aisi Koi Diqqat Pesh Na Aa’i (Jo ‘Aam Taur Par ‘Aurto’n Ko Hamal Ke Dauraan Pesh Aati Hai) Yaha’n Tak Ki Mein Ne Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ko Janm Diya. Pas Jab Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Mere Jism Se Juda Hu’e To Un Ke Saath Ek Aisa Noor Namoodaar Huwa Jis Se Mashriq-o Maghrib Raushan Ho Ga’e.”
Ek Dusri Riwaayat Me Hai : Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Wilaadat Ke Saath Hee Ek Aisa Noor Namoodaar Huwa Jis Se Shaam Ke Mahallaat Aur Baazaar Raushan Ho Ga’e Hatta Ki Busra Me (Chalne Waale) Oonto’n Kee Gardanein Bhi (Mere Saamne) Namoodaar Ho Ga’i’n.”

Ise Imam Ibn Sa’d, Ibn Asakir Aur Ibn Kathir Ne Riwaayat Kiya Hai.

[Ibn Sa’d Fi At-Tabaqat-ul-Kubra, 01/98, 102,

Ibn Asakir Fi Tarikh Madinat Dimashq, 03/79,

Ibn Kathir Fi Al-Bidayah Wa An-Nihayah, 02/264,

Ibn Jawzi Fi Sifat-us-Safwah, 01/52,

Suyooti Fi Al-Khasa’is Al-Kubra,  01/72, 79,

Halabi Fi Insan-ul-‘Uyoon Fi Sirat-il-Amin-il-Ma’moon Aw As-Sirat-ul-Halabiyyah, 01/80,

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam,/73_74, Raqm-33.]

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam: 34

          “Hazrat Ibn Qabtiyyah Se Huzoor Nabiyye Akram صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Wilaadate Paak Ke Hawaale Se Riwaayat Hai Ki Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Waalida Maajida Ne Farmaya : (Aap صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Kee Wilaadat Ke Waqt) Mein Ne Mushaahada Kiya, Goya Ki Ek Raushan Sitaara Mere Jism Se Nikla Hai Jis Se Saari Zameen Raushan Ho Ga’i.”

Ise Imam Ibn Sa’d Ne Riwaayat Kiya Hai.

[Ibn Sa’d Fi At-Tabaqat-ul-Kubra, 01/102,

Suyooti Fi Al-Khasa’is Al-Kubra, 01/79,

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam,/74_75, Raqm-34.]

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam: 35

          “Hazrat Aboo ‘Ajfa’ Bayan Karte Hain Ki Huzoor Nabiyye Akram صَلَّى اللهُ تَعَالىٰ عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّم Ne Farmaya : Meri Wilaadat Ke Waqt Meri Waalida Maajida Ne Dekha Ki Un Ke Jisme Aqdas Se Ek Noor Namoodaar Huwa Hai, Jis Se Busra Ke Mahallaat Raushan Ho Ga’e.”

Ise Imam Ibn Sa’d Ne Riwaayat Kiya Hai.

[Ibn Sa’d Fi At-Tabaqat-ul-Kubra, 01/102,

Suyooti Fi Al-Khasa’is Al-Kubra, 01/79,

Halabi Fi Insan-ul-‘Uyoon Fi Sirat-il-Amin-il-Ma’moon Aw As-Sirat-ul-Halabiyyah, 01/91,

Farhat-ul-Quloob Fi Mawlid-in-Nabiyy-il-Mahboob SallAllahu Ta’ala ‘Alayhi Wa-Aalihi Wa-Sallam,/75, Raqm-35.]