Tarjuma: Beshak tumhara wali to Allah, us ka Rasool (Sallallahu Alaihi Wa Aalihi Wasallam) hai, aur (saath) woh imaan wale hain jo namaz qayam karte hain aur zakat ada karte hain, aur woh (Allah ke huzoor aajzi se) jhukne wale hain.
(Surah Al-Ma’idah, Ayat 55)
*Shaan-e-Nuzool* : Mufassireen ke mutabiq, yeh ayat us waqt naazil hui jab Sayyiduna Maula Ali Alaihis Salam nafl namaz mein rukoo ki haalat mein thay. Ek mohtaaj sa’il masjid mein aaya aur sawal karne laga. Sayyiduna Maula Ali Alaihis Salam ne ibaadat mein mashghool rehte hue apni angoothi utaar kar us ko de di. Allah Ta’ala ne Sayyiduna Maula Ali Alaihis Salam ke is amal ko sarahte hue yeh ayat naazil farmayi aur unhein momineen ka wali qarar diya.
Yeh waaqia kai tafaseer mein mazkoor hai aur kaseer riwayaat ke zariye sabit hai ke yeh ayat Hazrat Sayyiduna Maula Ali Alaihis Salam ki shaan mein naazil hui.
*Chand Muntakhib Tafaseer:*
1. Tafseer Mazhari 2. Ad-Durr Al-Manur 3. Tafseer Al-Qurtubi 4. Tafseer Al-Baghawi 5. Tafseer Ibn Abi Hatim 6. Tafseer Ibn Atiyah 7. At-Tafseer Al-Kabeer (Imam Razi) 8. Tafseer Al-Kashshaaf (Zamakhshari) 9. Fath-ur-Rahman fi Tafseer Al-Qur’an 10. Zad Al-Maseer (Ibn Jawzi) 11. Tafseer An-Nasafi 12. Tafseer Ibn Arabi
*क्या रसूल अल्लाह saws ने अल्लाह के हुक्म से ग़दीर ए ख़ुम में मौला अली अलैहिस्सलाम को अपना जानशीन और खलीफ़ा बनाया था ??*
मेरे दीनी भाइयों अस्सलामो अलैकुम,हमनें अक्सर देखा है कि शिया हज़रात 18 ज़िलहज्ज को हर साल ईद ए ग़दीर के नाम से खुशी मनाते हैं और जब उनसे सवाल किया जाता है कि आप लोग ये ईद(खुशी) क्यों मनाते हैं तो उल्टा वो हमसे ये सवाल करने लगते हैं कि आप लोग(अहलेसुन्नत) ये खुशी क्यों नही मानते??
आज हम इस ही मौज़ू पर बात करते हैं कि ये मैटर क्या है और इसकी सच्चाई कितनी है?
शिया हज़रात का कहना है कि इस दिन मतलब 18 ज़िलहज्ज सन 10 हिजरी को जब रसूलअल्लाह हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स्वल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने आख़री हज को अदा कर के मक्का से वापस मदीना तशरीफ़ ला रहे थे और उनके साथ उनके कम ओ बेश सवा लाख सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुमा अजमाइन मौजूद थे तो मदीने से कुछ किलोमीटर पहले ग़दीर ए ख़ुम नामी जगह पर हुज़ूर पाक पर हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम अल्लाह सुब्हानहु व तआला की “वही” लेकर तशरीफ़ लाये जो कि सूरा ए मायदा की आयत नम्बर 67 है–
(अल-माइदा – 67) *ऐ रसूल जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल किया गया है पहुंचा दो और अगर तुमने ऐसा न किया तो (समझ लो कि) तुमने उसका कोई पैग़ाम ही नहीं पहुंचाया और (तुम डरो नहीं) ख़ुदा तुमको लोगों के शर से महफ़ूज़ रखेगा ख़ुदा हरगिज़ काफ़िरों की क़ौम को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुंचाता*
👆इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि ए रसूल जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की जानिब से तुम पर नाज़िल किया गया है वो उम्मत तक पहुँचा दीजिए और अगर(अल्लाह ने पूरे क़ुरआन में कहीं भी हुज़ूर पाक पर इतना ज़ौर नही दिया) आप ने ये हुक्म नही पहुँचाया तो मतलब आप ने अपनी पूरी ज़िंदगी मे जो भी तकलीफ़ उठायी हैं अल्लाह के दीन के ख़ातिर वो सब बेकार चली जाएंगी(अल्लाह हो अकबर)।
मतलब इस बार जो हुक्म ने बशकले वही नाज़िल किया है वो बहुत ही अहम व आला और ज़रूरी काम है जिससे पूरी कारे रिसालत पर बात आ गई !आख़िर ऐसा कोनसा काम व हुक्म था?
फिर जब ये आयत नाज़िल हो गई तो अल्लाह के रसूल ने तमाम सहाबा किराम को हुक्म दिया कि सब यहीँ रुक जाएँ एक ज़रूरी ऐलान करना है, फिर हुज़ूर ने फ़रमाया के जो लोग आगे निकल गए हैं उन्हें वापस बुलाया जाए और जो अभी यहाँ तक पहुँचे नही है उनका इंतेज़ार किया जाए।
*(आख़िर ऐसा क्या ज़रूरी और गैर मामूली पैग़ाम था जिसके लिए अल्लाह ने भरी धूप में जबकि मदीना कुछ ही दूर रह गया था उसके बावजूद भी लोगों को ज़हमत में मुब्तिला होना पड़ा ?)*
उसके बाद जब सब असहाबे किराम जिनकी तादाद लगभग सवा लाख थी एक जगह जमा हो गए तो फिर हुज़ूर ने फ़रमाया के मेरे लिए एक मिम्बर तय्यार किया जाए अब उस मैदान में मिम्बर कहाँ से आता इसलिए तमाम ऊँटो के कजावा जिसपर बैठा जाता है उनको एक जगह इकट्ठा किया और उनके ढेर पर हुज़ूर पाक जाकर खड़े हो गए और ख़ुत्बा देना शुरू किया,और अपने पास हज़रत अली को खड़ा कर लिया।ख़ुतबे में अल्लाह तआला की हम्द व सना करने के बाद हुज़ूर ने फ़रमाया के “ए लोगों में भी आदमी हुँ क़रीब है कि मेरे रब्ब का भेजा हुआ मौत का फरिश्ता पैग़ाम ए अजल लाए और में क़ुबूल कर लूँ, में तुम में दो बड़ी चीज़ें छोड़े जाता हूँ पहली तो अल्लाह की किताब है और दूसरी मेरे अहलेबैत, में तुम्हे अपने अहलेबैत के बारे मैं अल्लाह याद दिलाता हूँ, तीन बार यही फ़रमाया। उसके बाद हुज़ूर ने तमाम असहाबे किराम रज़ियल्लाहु अन्हू से सवाल किया कि क्या में आप सब पर और तमाम मोमिनों पर उनकी नफ्सों और जानों से ज़्यादा हक़ नही रखता? सबने मिलकर फ़रमाया बिल्कुल आप हम सब की जानों और नफ्सों पर हमसे ज़्यादा हक़ रखते हैं।फिर हुज़ूर ने फ़रमाया के “अल्लाह तुम्हारा मौला (सरपरस्त,आक़ा) है में अल्लाह का रसूल तुम्हारा मौला (सरपरस्त,आक़ा) हूँ और जिस जिस का भी में मौला हुँ उस उस के ये अली भी मौला (सरपरस्त, आक़ा) हैं।” (ये कहते वक़्त हुज़ूर ने हज़रत अली का हाथ अपने हाथ से बुलन्द फ़रमा दिया)।और तमाम असहाबे किराम को हुक्म दिया कि वो सब हज़रत अली की विलायत की मुबारकबाद पेश करें।तो सबसे पहले हज़रत उमर ने हज़रत अली को इन अल्फ़ाज़ में मुबारकबाद पेश की के बखिन बखिन(मुबारक हो) ए इब्ने अबुतालिब आज से आप मेरे और तमाम मोमेनीन के मौला हो गए।फिर एक एक कर के तमाम सहाबा ने मौला अली को मुबारकबाद पेश की और ये सिलसिला तीन दिन तक चलता रहा।
*क्या इस वाक़ये की सनद अहलेसुन्नत की कुतुब बिलखुसुस सहा सित्ता में भी मिलती है या ये सिर्फ शियाओं की किताबों में ही पाया जाता है ?* *आईये देखते हैं !*➡️
अहलेसुन्नत की मशहूर किताब मुसनद अहमद शरीफ में 12306 नम्बर हदीस में मिलता है कि अब्दुर्रहमान से मरवी है, वो कहते हैं मैं रहबा मे सैय्यदना अली रज़ियल्लाहु अन्हू की ख़िदमत में हाज़िर था,सैय्यदना अली लोगों को अल्लाह का वास्ता देकर कह रहे थे “मैं उस आदमी को अल्लाह का वास्ता देकर कहता हूँ जिसने ग़दीर ए वाले दिन रसूलअल्लाह स आ व स को ये फ़रमाते हुए सुना में *जिसका मौला हूँ अली भी उसके मौला हैं* वो उठ कर गवाही दे,ये सुन कर बारह बदरी सहाबा खड़े हुए वो मंज़र मेरी आँखों के सामने है, गोया मैं उनमें से हर एक को देख रहा हूँ, उनसब ने कहा हम गवाही देते हैं कि हमने ग़दीर ए ख़ुम के दिन रसूलअल्लाह को ये फ़रमाते हुए सुना:क्या में मोमिनों पर उनकी जानों से ज़्यादा हक़ नहीं रखता?और क्या मेरी अज़वाज उनकी माएँ नही हैं?हमने कहा ए अल्लाह के रसूल ! बिलकुल बात ऐसी ही है फिर आप अलैहिस्सलाम ने ये फ़रमाया:में जिसका मौला हूँ अली भी उसके मौला हैं, ए अल्लाह तू उस आदमी को दोस्त रख जो अली को दोस्त रखता हो है और जो अली से दुश्मनी रखे ए अल्लाह तू भी उस शख्स से दुश्मनी रख।
*यहाँ पर ये बात बता देना भी ज़रूरी है कि क्या मौला अली की विलायत क़ुरआन से भी साबित है?आईये देखते हैं👉*
[ अल-माइदा – ५५ ] *(ऐ ईमानदारों) तुम्हारे मालिक सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और हालत रूकूउ में ज़कात देते हैं*
👆सूरा मायदा की आयत नम्बर 55 में आया है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ए ईमानदारों तुम्हारा मालिक व सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसके रसूल और वह मोमेनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और *हालते रुकू में ज़कात देते हैं ।* मतलब नमाज़ की हालत में रुकू के वक़्त ज़कात अदा करें।अहलेसुन्नत के मशहूर आलिम अल्लामा जलालुद्दीन सयूती अपनी किताब तफ़्सीर ए दर्रे मंसूर में फ़रमाते हैं कि इस आयत का शाने नुज़ूल ये है कि एक वक़्त जब मस्जिद में सब लोग नमाज़ पढ़ रहे थे उस ही वक़्त एक साइल(माँगने वाला)वहाँ आया और अल्लाह के नाम पर माँगा, जब किसी ने उस पर तवज्जो नही दी तो वो जाने लगा,लेकिन फिर उसकी नज़र हज़रत अली पर पड़ी जो वहीं नमाज़ अदा कर रहे थे और हालते रुकू में थे जिन्होंने उँगली से इशारा किया कि मेरी ये अँगूठी लेजा।और माँगने वाले ने उनके हाथ की उँगली से वो अँगूठी उतार ली।तो अल्लाह तआला को हज़रत अली की ये अदा इतनी पसँद आयी के उसने ये सरपरस्ती वाली आयात हज़रत अली की शान में उतार दी। *क़ुरआन पाक की इस आयात से ये भी साबित हो गया कि ईमानदारों का मालिक व सरपरस्त अल्लाह और उसके रसूल के अलावा हज़रत अली भी हैं।*
अब कुतुब ए अहलेसुन्नत से मुख़्तसर से वक़्फे में कुछ और रिवायात व अहादीस देख लेते हैं ग़दीर ए ख़ुम के हवाले से👉
मुसनद अहमद हदीस नम्बर 12303-सैयदना ज़ैद बिन अरक़म रज़ियल्लाहु अन्हू से मरवी है वो कहते हैं:हम नबीए करीम स अ व स के साथ एक वादी में उतरे,उसको वादिये ख़ुम कहते थे, पस आप अलैहिस्सलाम ने नमाज़ का हुक्म दिया और सख़्त गर्मी में ज़ोहर की नमाज़ पढ़ाई,फिर आप अलैहिस्सलाम ने ख़ुत्बा दिया और धूप से बचाने के लिए कीकर के दरख़्त पर कपड़ा डाल कर आप अलैहिस्सलाम पर साया किया गया फिर आप स अ व स ने फ़रमाया: क्या तुम जानते नही हो या क्या तुम ये गवाही नही देते के में हर मोमिन के उसके नफ़्स से भी ज़्यादा क़रीब हुँ??सहाबा ने कहा जी क्यों नही,फिर आप अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: “में जिसका मौला हूँ अली भी उसका मौला है।”
👉➡️ ۔ Al-Silsila-tus-Sahi Hadees # 3589 قَالَ صلی اللہ علیہ وسلم : مَنْ كُنْتُ مَوْلَاهُ فَعَلِيٌّ مَوْلَاهُ، اللهُمَّ وَالِ مَنْ وَّالَاهُ وَعَادِ مَنْ عَادَاهُ . ورد من حدیث …..
अहलेसुन्नत की एक और मशहूर किताब अल सिलसिलतुस साहिहा की रिवायात नम्बर 3589 में आया है कि “आप स्वल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया: जिसका में मौला हूँ अली भी उसका मौला है…….”
अहलेसुन्नत की बहुत ही मारूफ़ किताब सुनने इब्ने माजा की हदीस नम्बर 116 में भी आया है की हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: मनकुंतो मौला हु फहाज़ा अलिउन मौला हु (जिस जिस का भी में मौला व आक़ा व सरदार हुँ उन सब का भी ये अली आक़ा व सरदार है।)
*खुलासा*👉➡️
*इन सब बातों से जो हमें कुरआन वा हदीस से मिलीं हैं इन से ये साबित हो जाता है कि ग़दीर ए ख़ुम में मौला अली अलैहिस्सलाम को हुज़ूर पाक saws ने अल्लाह के हुक्म से अपना जानशीन और खलीफ़ा बनाया था अब जो इस बात को न माने वो अल्लाह और रसूल अल्लाह saws के हुक्म का मुनकिर माना जाएगा और सब मुसलमान इस बात को अच्छे से जानते हैं के अल्लाह और रसूल का मुनकिर कम से कम मुसलमान तो नहीं कहलाता ।*🙏
*वक़्त की कमी और पोस्ट ज़्यादा लम्बी न हो जाये इसको मद्देनज़र रखते हुए यहीँ इस बात को तमाम करते हैं कि ग़दीर ए ख़ुम के रोज़ की ख़ुशी मनाना और हज़रत अली की विलायत की एक दूसरे को मुबारकबाद पेश करना सुन्नत भी है और सहाबा किराम से साबित भी है और इसे किसी एक फ़िरके से मनसूब करना भी जायज़ नही बल्कि ये तो तमाम आलमे इस्लाम के लिए ईद व मसर्रत व खुशी का दिन है।*