अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 39

अक़बा की पहली बैअत’

हम बता चुके हैं कि नबूवत के ग्यारहवें साल हज के मौसम में यसरिब के छ: आदमियों ने इस्लाम कुबूल कर लिया था और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वायदा किया था कि अपनी क़ौम में जाकर आपकी रिसालत का प्रचार करेंगे।

इसका नतीजा यह हुआ कि अगले साल जब हज का मौसम आया (यानी ज़िलहिज्जा सन् 12 नववी, मुताबिक़ जुलाई 621 ई०) तो बारह आदमी आपकी सेवा में उपस्थित हुए, इनमें हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह को छोड़कर बाक़ी पांच वही थे, जो पिछले साल भी आ चुके थे और इनके अलावा सात आदमी नए थे, जिनके नाम ये हैं-

1. मुआज़ बिन हारिस बिन अफ़रा, क़बीला बनी नज्जार (खज़रज) 2. ज़कवान बिन अब्दुल क़ैस, क़बीला बनी जुरैक़ (खज़रज) 3. उबादा बिन सामित, क़बीला बनी ग़नम (खज़रज) 4. यज़ीद बिन सालबा, क़बीला बनी ग़नम के मित्र (खज़रज) 5. अब्बास बिन उबादा बिन नज़ला, क़बीला बनी सालिम (खज़रज) 6. अबुल हैसम बिन तैहान, क़बीला बनी अब्दुल अशहल (औस) 7. उवैम बिन साइदा, क़बीला बनी अम्र बिन औफ (औस) इनमें से सिर्फ़ आखिरी दो आदमी औस क़बीले से थे, बाक़ी सबके सब क़बीला खज़रज से थ े न लोगों ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मिना में अक़बा के पास मुलाक़ात की और आपसे कुछ बातों पर बैअत की। ये बातें वही थीं जिन पर आगे हुदैबिया के समझौते के बाद और मक्का की विजय के वक़्त औरतों से बैअत ली गई।

अक़बा की इस बैअत का विवरण सही बुखारी में हज़रत उबादा बिन सामित रज़ि० की रिवायत से मिलता है। वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, आओ, मुझसे इस बात पर बैअत करो कि अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक न करोगे, चोरी न करोगे, जिना न करोगे, अपनी औलाद को क़त्ल न करोगे, अपने हाथ-पांव के बीच से गढ़ कर कोई बोहतान न लाओगे और किसी भली बात में मेरी नाफरमानी न करोगे।

जो व्यक्ति ये सारी बातें पूरी करेगा, उसका बदला अल्लाह पर है और जो व्यक्ति इनमें से कोई चीज़ कर बैठेगा, फिर उसे दुनिया ही में उसकी सज़ा दे दी जाएगी, तो यह उसके लिए कफ़्फ़ारा होगी और जो व्यक्ति इनमें से कोई चीज़ कर बैठेगा, फिर अल्लाह उस पर परदा डाल देगा, तो उसका मामला अल्लाह के हवाले है, चाहेगा तो सज़ा देगा और चाहेगा तो माफ़ कर देगा।

हज़रत उबादा रज़ि० फ़रमाते हैं कि हमने इस पर आपसे बैअत की ।’

मदीना में इस्लाम का दूत (सफ़ीर)

बैअत पूरी हो गई और हज ख़त्म हो गया, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन लोगों के साथ यसरिब में अपना पहला दूत (सफ़ीर) भेजा, ताकि वह मुसलमानों को इस्लामी हुक्मों की शिक्षा दे और उन्हें दीन की बातें बताए और जो लोग अब तक शिर्क पर चले आ रहे हैं, उनमें इस्लाम की इशाअत करे ।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसके लिए पहले इस्लाम कुबूल करने वालों में से एक जवान को चुना, जिसका शुभ नाम मुसअब बिन उमैर अब्दरी रज़ियल्लाहु अन्हु है ।

ज़बरदस्त कामियाबी

हज़रत मुस्अब बिन उमैर रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना पहुंचे, तो हज़रत असद बिन जुरारा रज़ि० के घर उतरे। फिर दोनों ने मिलकर यसरिब वालों में पूरे

1. सहीह बुखारी, बाब बाद हलावतिल ईमान 1/7, बाब वफूदुल अंसार 1/550-551, बाब क़ौलुहूतआला इज़ा जा-अ-कल मोमिनाति 2/727 बाब अल-हुदूद कफ़्फ़ारा 2/1003

उत्साह के साथ इस्लाम की तब्लीग़ (प्रचार) शुरू कर दी।

हज़रत मुस्अब मुक़री की उपाधि से पहचाने जाने लगे। (मुक़री का अर्थ है पढ़ाने वाला । उस वक़्त अध्यापक या गुरु को मुक़री कहते थे ।)

तब्लीग़ (प्रचार) के सिलसिले में उनकी सफलता की एक बहुत ही शानदार घटना यह है कि एक दिन हज़रत असद बिन जुरारा रज़ि० उन्हें साथ लेकर बनी अब्दुल अशल और बनी ज़फ़र के मुहल्ले में तशरीफ़ ले गए और वहां बनी ज़फ़र के एक बाग़ के अंदर मर्क नामी एक कुएं पर बैठ गए। उनके पास कुछ मुसलमान भी जमा हो गए। उस वक़्त तक बनी अब्दुल अशल के दोनों सरदार यानी हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ि० और हज़रत उसैद बिन हुज़ैर रज़ि० मुसलमान नहीं हुए थे, बल्कि शिर्क ही पर थे।

उन्हें जब ख़बर हुई तो हज़रत साद ने हज़रत उसैद से कहा कि ज़रा जाओ और इन दोनों को, जो हमारे कमज़ोरों को मूर्ख बनाने आए हैं, डांट दो और हमारे मुहल्ले में आने से मना कर दो। चूंकि असद बिन जुरारा मेरी खाला का लड़का है, (इसलिए तुम्हें भेज रहा हूं) वरना यह काम मैं खुद कर लेता।

उसैद ने अपना हथियार उठाया और इन दोनों के पास पहुंचे।

हज़रत असद रज़ि० ने उन्हें आता देखकर हज़रत मुसअब रज़ि० से कहा, ‘यह अपनी क़ौम का सरदार इधर आ रहा है। इसके बारे में अल्लाह से सच्चाई अख्तियार करना ।’

हज़रत मुस्अब रज़ि० ने कहा, अगर यह बैठा तो इससे बात करूंगा। उसैद पहुंचे तो उनके पास खड़े होकर सख्त सुस्त कहने लगे, बोले-

‘तुम दोनों हमारे यहां क्यों आए हो? हमारे कमज़ोरों को मूर्ख बनाते हो ? याद रखो, अगर तुम्हें अपनी जान की ज़रूरत है, तो इससे अलग ही रहो।’

हज़रत मुसअब ने कहा, क्यों न आप बैठें और कुछ सुनें। अगर कोई बात पसन्द आ जाए, तो कुबूल कर लें। पसन्द न आए तो छोड़ दें।

हज़रत उसैद रज़ि० ने कहा, ‘बात तो ठीक कह रहे हो।’ इसके बाद अपना हथियार गाड़ कर बैठ गए।

की और कुरआन की तिलावत अब हज़रत मुसअब ने इस्लाम की बात शुरू की और फ़रमाई। उनका बयान है कि खुदा की क़सम, हमने उसैद के बोलने से पहले ही उनके चेहरे की चमक-दमक से उनके इस्लाम का पता लगा लिया। इसके बाद खोली तो फ़रमाया- उन्होंने जुबान