हदीस और हज़रत अली का दर्द भरा सवाल

🔹 हदीस और हज़रत अली का दर्द भरा सवाल 🔹

हज़रत मुहम्मद ﷺ रोने लगे ,,, मौला अली अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! आप क्यों रो रहे हैं?”
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:
” उस बुग्ज की वजह से जो लोगों के सीनों में तेरे लिए है जिसका इज़हार मेरे बाद करेंगे ।”
हज़रत अली ( अलैहिस्सलाम) ने फिर अर्ज़ किया:
“या रसूलल्लाह ﷺ! क्या मेरा दीन सलामत रहेगा ?”
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
“हाँ! आपका दीन सलामत रहेगा।”

📚 मसनद अबू याला, हदीस 561 / मसनद इमाम अहमद: जिल्द 1, सफ़ा 119, 118 / मुजम अल-अउसत: हदीस 2205

नोट_ सवाल ये है उस वक्त कौन लोग हयात थे कौन बाद में  बुग्ज जाहिर करने वाले थे याद रहे अगर काफ़िर थे तो उन्हें दिल ही दिल में हुज़ूर ﷺ के हयात में बुग्ज रखने कि जरूरत नहीं थी  यक़ीनन वो कलमा पढ़ने वाले ही लोग थे फिर कहते है कि मौला अली अलैहिस्सलाम से कोई बुग्ज नहीं रखता था

कुरआन में मर्दों (पुरुषों) को भी नज़रों की हिफाज़त और हया का हुक्म दिया गया है।

कुरआन में मर्दों (पुरुषों) को भी पर्दा (नज़रों की हिफाज़त और हया) का हुक्म दिया गया है। ये हुक्म सूरह नूर (Surah An-Nur) में साफ़ तौर पर मौजूद है:




📖 कुरआन: सूरह अन-नूर (24:30)

قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ وَيَحْفَظُوا فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا يَصْنَعُونَ

हिन्दी तर्जुमा:
“ईमान वालों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें, यही उनके लिए ज़्यादा पाकीज़गी वाला है। बेशक अल्लाह को खबर है जो कुछ वे करते हैं।”




इस आयत में क्या हुक्म है?

मर्दों को नज़रें नीची रखने का हुक्म है, यानी नामहरम औरतों को ग़ैर ज़रूरी तरीके से देखना हराम है।

अपनी शर्मगाह (private parts) की हिफाज़त का हुक्म है — ज़िना और बेहयाई से बचने के लिए।

ये पर्दा सिर्फ जिस्म से नहीं, नज़र और नियत का भी होता है।