अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 75 ग़ज़वा बनी मुस्तलिक़ या ग़ज़वा मुरीसीअ part 1



यह ग़ज़वा (लड़ाई) सामरिक दृष्टि से भारी-भरकम ग़ज़वा नहीं है, पर इस हैसियत से इसका बड़ा महत्व है कि इसमें कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनकी वजह से इस्लामी समाज में बेचैनी और हलचल मच गई और जिसके नतीजे में एक ओर मुनाफ़िक़ों का परदा खुला, तो दूसरी ओर ऐसे ताज़ीरी क़ानून उतरे, जिनसे इस्लामी समाज को बुलंदी और पाकीज़गी की एक खास शक्ल मिली। हम पहले ग़ज़वे का ज़िक्र करेंगे, इसके बाद उन घटनाओं का विवरण देंगे।

यह ग़ज़वा, आम तौर से सीरत लिखने वालों के मुताबिक़ सन् 05 हि० में और इब्ने इस्हाक़ के कथनानुसार सन् 06 हि०’ में हुआ। इसकी वजह यह हुई

1. इसकी दलील यह दी जाती है कि इसी ग़ज़वे से वापसी में इफ्क (हज़रत आइशा

रज़ियल्लाहु अन्हा पर झूठी तोहमत लगाए जाने की घटना घटी और मालूम है कि यह घटना हज़रत ज़ैनब रज़ि० से नबी सल्ल० की शादी और मुसलमान औरतों के

लिए परदे का हुक्म आ चुकने के बाद घटी थी। चूंकि हज़रत ज़ैनब की शादी सन् 05 हि० के बिल्कुल आखिर में यानी ज़ीक़ादा या ज़िलहिज्जा 05 हि० में हुई थी और इस बात पर सभी सहमत हैं कि यह ग़ज़वा शाबान ही के महीने में पेश आया था, इसलिए यह 05 हि० का शबान नहीं, बल्कि 06 हि० का शाबान हो सकता है। दूसरी ओर जो लोग इस ग़ज़वे का ज़माना शाबान 05 हि० बताते हैं, उनकी दलील यह है कि इफ्क वाली हदीस के अन्दर इफ्क वालों के सिलसिले में हज़रत साद बिन मुआज़ और साद बिन उबादा रज़ि० के बीच तेज़-तेज़ बातों का ज़िक्र मौजूद है और मालूम है कि साद बिन मुआज रज़ि० सन् 05 हि० के आखिर में ग़ज़वा बनी कुरैज़ा है के बाद मौत की गोद में चले गए थे, इसलिए इफ्क की घटना के वक़्त उनकी मौजूदगी इस बात की दलील है कि यह घटना और यह ग़ज़वा सन् 06 हि० में नहीं, बल्कि सन् 05 हि० में पेश आया।

इसका उत्तर पहले फ़रीक़ ने यह दिया है कि हदीसे इफ्क में हज़रत साद रज़ि० का उल्लेख रिवायत करने वाले का भ्रम है, क्योंकि यही हदीस हज़रत आइशा रज़ि० से इब्ने इस्हाक़ ने ज़ोहरी की सनद से नक़ल की है, तो इसमें साद बिन मुआज़ के बजाए उसैद बिन हुज़ैर रज़ि० का उल्लेख है। चुनांचे इमाम अबू मुहम्मद बिन हज़म फ़रमाते हैं कि बेशक यही सही है और साद बिन मुआज़ का उल्लेख भ्रम है।

(देखिए ज़ादुल मआद 2/115) लेखक का कहना है कि यद्यपि पहले फ़रीक़ की दलीलों का महत्व है (और इसीलिए

कि नबी सल्ल० को यह सूचना मिली कि बनू मु तक़िल का सरदार हारिस बिन अबी ज़रार आपसे लड़ने के लिए अपने क़बीले और कुछ दूसरे अरबों को साथ लेकर आ रहा है। आपने बुरैदा बिन हुसैब अस्लमी रज़ियल्लाहु अन्हु को हाल करने के लिए रवाना फ़रमाया। उन्होंने इस क़बीले में जाकर हारिस बिन अबी जुरार से मुलाक़ात और बातचीत की और वापस आकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को हालात से ख़बरदार किया। मालूम

जब आपको ख़बर के सही होने का पूरी तरह विश्वास हो गया, तो आपने सहाबा किराम को तैयारी का हुक्म दिया और बहुत जल्द रवाना हो गए। 2 शाबान को रवानगी हुई।

इस ग़ज़वे में आपके साथ मुनाफ़िक़ों की भी एक जमाअत थी, जो इससे पहले किसी ग़ज़वे में नहीं गई थी।

आपने मदीना का इंतिज़ाम हज़रत ज़ैद बिन हारिसा को (और कहा जाता है कि हज़रत अबूज़र को और कहा जाता है कि नुमैला बिन अब्दुल्लाह लैसी को) सौंपा था।

हारिस बिन अबी जुरार ने इस्लामी फ़ौज की ख़बर लाने के लिए एक जासूस भेजा था, लेकिन मुसलमानों ने उसे गिरफ़्तार करके क़त्ल कर दिया ।

जब हारिस बिन अबी जुरार और उसके साथियों को अल्लाह के रसूल सल्ल० की रवानगी और अपने जासूस के क़त्ल किए जाने का पता चला, तो वे बड़े भयभीत हुए और जो अरब उनके साथ थे, वे सब बिखर गए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुरीसीअ चश्मे तक पहुंचे’ तो बनू मुस्तलिक़ लड़ने पर तैयार हो गए।

शुरू में हम भी उसी से सहमत थे) लेकिन ध्यान दीजिए तो मालूम होगा कि इन दलीलों का केन्द्र-बिन्दु यह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से हज़रत ज़ैनब रज़ि० की शादी सन् 05 हि० के आखिर में हुई थी, जबकि कुछ अनुमानों के अलावा इस पर कोई ठोस गवाही मौजूद नहीं है, जबकि इफ्क की घटना में और इसके बाद हज़रत साद बिन मुआज़ (मृत्यु 05 हि०) का मौजूद होना कई सही रिवायतों से साबित है, जिन्हें भ्रम कहना कठिन है। जबकि हज़रत ज़ैनब की शादी 04 हिo के आखिर में या सन् 05 के शुरू में होने का ज़िक्र पाया जाता है, इसलिए इफ्क की घटना और बनू मुस्तलिक़ का ग़ज़वा शाबान 05 हि० में होना बिल्कुल संभव है। 1. मुरीसीअ-क़दीद के चारों तरफ समुद्र-तट के क़रीब बनू मुस्तलिक़ के एक चश्मे का
नाम था।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा किराम ने भी सफ़बन्दी कर ली। पूरी इस्लामी फ़ौज के झंडाबरदार हज़रत अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु थे और ख़ास अंसार का फरेरा हज़रत साद बिन उबादा रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ में था, कुछ देर फ़रीक़ों में तीरों का तबादला हुआ।

इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हुक्म से सहाबा किराम ने अचानक एक साथ हमला कर दिया और जीत गये। मुश्कि हारे, उनमें से कुछ मारे भी गए औरतों और बच्चों को क़ैद कर लिया गया। मवेशी और बकरियां भी हाथ आईं। मुसलमानों का सिर्फ़ एक आदमी मारा गया, जिसे एक अंसारी ने दुश्मन का आदमी समझकर मार दिया था।

इस ग़ज़वे के बारे में सीरत लिखने वालों का बयान यही है, लेकिन अल्लामा इब्ने कय्यिम ने लिखा है कि यह भ्रम है, क्योंकि इस ग़ज़वे में लड़ाई नहीं हुई थी। बल्कि आपने चश्मे के पास उन पर छापा मारकर औरतों-बच्चों और माल- मवेशी पर क़ब्ज़ा कर लिया था, जैसा कि सहीह के अन्दर है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बनुल मुस्तलिक़ पर छापा मारा और वे ग़ाफ़िल थे (आखिर तक) 1

क़ैदियों में हज़रत ज़ुवैरिया रज़ियल्लाहु अन्हा भी थीं, जो बनुल मुस्तलिक़ के सरदार हारिस बिन ज़रार की बेटी थीं। वह साबित बिन क़ैस के हिस्से में आईं। साबित ने उन्हें मुकातिब बना लिया । 2

फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनकी ओर से तैशुदा रक़म अदा करके उनसे शादी कर ली। इस शादी की वजह से मुसलमानों ने बनुल मुस्तलिक़ के एक सौ घरानों को, जो मुसलमान हो चुके थे, आज़ाद कर दिया, कहने लगे कि ये लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ससुराल के लोग हैं। 3

यह है इस ग़ज़वे की कहानी। बाक़ी रहीं वे घटनाएं, जो इस ग़ज़वे में घटी, तो चूंकि उनकी बुनियाद अब्दुल्लाह बिन उबई, मुनाफ़िक़ों का सरदार और उसके साथी थे, इसलिए ग़लत न होगा कि पहले इस्लामी समाज के भीतर उनकी भूमिका और रवैए की एक झलक पेश कर दी जाए और बाद में घटनाओं का

1. देखिए सहीह बुखारी, किताबुल इत्क़ 1/345, फ़हुल बारी 5/303, 7/431 2. मुकातिब उस गुलाम या लौंडी को कहते हैं जो अपने मालिक से यह तै कर ले कि वह एक तैशुदा रक़म मालिक को अदा करके आज़ाद हो जाएगा। 3. ज़ादुल मआद 2/112, 113, इब्ने हिशाम 2/289, 290, 294, 295

सविस्तार उल्लेख हो ।

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