अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 73 ग़ज़वा बनू कुरैज़ा पार्ट 2


और औरतों और बच्चों को मर्दों से अलग कर दिया गया।

क़बीला औस के लोग अल्लाह के रसूल सल्ल० से अर्ज़ करने लगे कि आपने बनू क़ैनुलाअ के साथ जो व्यवहार किया था, वह आपको याद ही है। बनू कैनुकाअ हमारे भाई खज़रज के मित्र थे और ये लोग हमारे मित्र हैं, इसलिए इन पर एहसान फरमाएं ।

आपने फ़रमाया, क्या आप लोग इस पर राज़ी नहीं कि इनके बारे में आप ही का एक आदमी फ़ैसला करे ?

उन्होंने कहा, क्यों नहीं ?

आपने फ़रमाया, तो यह मामला साद बिन मुआज़ के हवाले है।

औस के लोगों ने कहा, हम इस पर राज़ी हैं।

इसके बाद आपने हज़रत साद बिन मुआज़ को बुला भेजा । वह मदीना में थे। फ़ौज के साथ आए नहीं थे, क्योंकि खंदक़ की लड़ाई के दौरान हाथ की नस कटने की वजह से घायल हो गए थे। उन्हें एक गधे पर सवार करके रसूलुल्लाह सल्ल० की खिदमत में लाया गया। जब क़रीब पहुंचे, तो उनके क़बीले के लोगों ने उन्हें दोनों ओर से घेर लिया और कहने लगे, साद! अपने मित्रों के बारे में अच्छाई और एहसान से काम लीजिएगा। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने आपको मध्यस्थ इसीलिए बनाया है कि आप उनसे सद्व्यवहार करें। मगर वह चुपचाप थे, कोई जवाब न दे रहे थे। जब लोगों ने गुज़ारिश की भरमार कर दी, तो बोले-

‘अब वक़्त आ गया है कि साद को अल्लाह के बारे में किसी मलामत करने वाले की मलामत की परवाह न हो।’

यह सुनकर कुछ लोग उसी वक़्त मदीना आ गए और क़ैदियों की मौत का एलान कर दिया।

इसके बाद जब हज़रत साद रज़ि० नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास पहुंचे, तो आपने फ़रमाया, अपने सरदार की ओर उठकर बढ़ो। (लोगों ने बढ़कर) जब उन्हें उतार लिया, तो कहा, ऐ साद! ये लोग आपके फ़ैसले पर उतरे हैं।

हज़रत साद ने कहा, क्या मेरा फ़ैसला इन पर लागू होगा ?

लोगों ने कहा, जी हां ।

उन्होंने कहा, मुसलमानों पर भी ।

लोगों ने कहा, जी हां ।
उन्होंने फिर कहा, और जो यहां हैं, उन पर भी

उनका इशारा रसूलुल्लाह सल्ल० की आरामगाह की ओर था, मगर मानसम्मान की वजह से चेहरा दूसरी ओर कर रखा था । आपने फ़रमाया, जी हां, मुझ पर भी ।

हज़रत साद ने कहा, तो इनके बारे में मेरा फ़ैसला यह है कि मर्दों को क़त्ल कर दिया जाए, औरतों और बच्चों को क़ैदी बना लिया जाए और माल बांट दिया जाए। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, तुमने इनके बारे में वही फ़ैसला किया है, जो सात आसमानों के ऊपर से अल्लाह का फ़ैसला है।

हज़रत साद का यह फ़ैसला बड़े इंसाफ़ वाला था, क्योंकि बनू कुरैज़ा ने मुसलमानों की मौत और ज़िंदगी के सबसे नाज़ुक क्षणों में जो खतरनाक बदअहदी की थी, वह तो थी ही, इसके अलावा उन्होंने मुसलमानों को ख़त्म करने के लिए डेढ़ हज़ार तलवारें, दो हज़ार नेज़े, तीन सौ कवच और पांच सौ ढाल जुटा रखे थे, जिस पर विजय के बाद मुसलमानों ने क़ब्ज़ा किया।

इस फ़ैसले के बाद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हुक्म पर बनू कुरैज़ा को मदीना लाकर बनू नज्जार की एक औरत के, जो हारिस की बेटी थीं, घर में क़ैद कर दिया गया और मदीना के बाज़ार में खंदकें खोदी गईं, फिर उन्हें एक-एक टुकड़ी करके ले जाया गया और इन खंदक़ों (खाइयों) में उनकी गरदनें मार दी गई ।

कार्रवाई शुरू होने के थोड़ी देर बाद बाक़ी क़ैदियों ने अपने सरदार काब बिन असद से मालूम किया कि आपका क्या अन्दाज़ा है ? हमारे साथ क्या हो रहा है ?

उसने कहा, क्या तुम लोग किसी भी जगह समझ-बूझ नहीं रखते ? देखते नहीं कि पुकारने वाला रुक नहीं रहा है और जाने वाला पलट नहीं रहा है ? यह खुदा की क़सम ! क़त्ल है। बहरहाल इन सबकी (जिनकी तायदाद छः और सात सौ के बीच थी) गरदनें मार दी गई।

इस कार्रवाई के ज़रिए धोखादेही और खियानत के उन सांपों का पूरी तरह खात्मा कर दिया गया, जिन्होंने पक्का अह्द व क़रार तोड़ा था, मुसलमानों को ख़त्म करने के लिए उनकी ज़िंदगी के बड़े संगीन और नाजुक क्षणों में दुश्मन को मदद देकर लड़ाई के बड़े अपराधियों की भूमिका निभाई थी और अब वे सचमुच मुक़दमे और फांसी के हक़दार हो चुके थे।

बनू कुरैज़ा की इस तबाही के साथ ही बनू नज़ीर का शैतान और ग़ज़वा अहज़ाब का एक बड़ा अपराधी हुइ बिन अखतब भी अपने नतीजे को पहुंच गया।यह आदमी उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफ़िया रज़ियल्लाहु अन्हा का बाप था । कुरैश और ग़तफ़ान की वापसी के बाद जब बनू कुरैना का घेराव किया गया और उन्होंने क़िलाबन्दी की, तो यह भी उनके साथ क़िलाबन्द हो गया था, क्योंकि ग़ज़वा अहज़ाब के दिनों में यह आदमी जब काब बिन असद को धोखादेही और खियानत पर तैयार करने के लिए आया था, तो उसका वायदा कर रखा था और अब इसी वायदे को निबाह रहा था ।

उसे जिस वक़्त नबी सल्ल० की खिदमत में लाया गया, एक जोड़ा पहने हुए था, जिसे खुद ही हर ओर से एक-एक अंगुल फाड़ रखा था, ताकि उसे माले ग़नीमत में न रखवा लिया जाए। उसके दोनों हाथ गरदन के पीछे रस्सी से एक साथ बंधे हुए थे। उसने रसूलुल्लाह सल्ल० को सम्बोधित करके कहा, सुनिए, मैंने आपकी दुश्मनी पर अपने आपको मलामत नहीं की, लेकिन जो अल्लाह से लड़ता है, मलूब होता है।

फिर लोगों को ख़िताब करते हुए कहा, लोगो ! अल्लाह के फ़ैसले में कोई हरज नहीं। यह तो भाग्य का लिखा है और एक बड़ी हत्या है जो अल्लाह ने बनी इसराईल पर लिख दिया था। इसके बाद वह बैठा और उसकी गरदन मार दी गई।

इस घटना में बनू कुरैज़ा की एक औरत भी क़त्ल की गई। उसने हज़रत खल्लाद बिन सुवैद रज़ियल्लाहु अन्हु पर चक्की का पाट फेंककर उन्हें क़त्ल कर दिया था। इसी के बदले उसे क़त्ल कर दिया गया।

रसूलुल्लाह सल्ल० का हुक्म था कि जिसके नाफ़ के नीचे बाल आ चुके हों, उसे क़त्ल कर दिया जाए। चूंकि हज़रत अतीया कुरजी को अभी बाल नहीं आए थे, इसलिए उन्हें ज़िंदा छोड़ दिया गया। चुनांचे उन्होंने मुसलमान होकर सहाबी होने का शरफ़ हासिल किया।

हज़रत साबित बिन क़ैस ने निवेदन किया कि जुबैर बिन बाता और उसके बाल-बच्चों को उनको भेंट स्वरूप दे दिया जाए, इसकी वजह यह थी कि ज़ैद ने साबित पर कुछ एहसान किए थे। उनका निवेदन स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद साबित बिन क़ैस ने जुबैर से कहा कि अल्लाह के रसूल सल्ल० ने तुझको और तुम्हारे बाल-बच्चों को मुझे भेंट स्वरूप दे दिया है और मैं इन सबको तुम्हारे हवाले करता हूं। (यानी तुम बाल-बच्चों समेत आज़ाद हो)

लेकिन जब जुबैर बिन बाता को मालूम हुआ कि उसकी क़ौम क़त्ल कर दी गई है, तो उसने कहा, साबित ! तुम पर मैंने जो उपकार किया था उसका वास्ता देकर कहता हूं कि मुझे भी दोस्तों तक पहुंचा दो । चुनांचे उसकी भी गरदन मार