जंग-ए-खैबर क्यों हुई? कारण क्या थे?

*कभी दीवार हिलती है कभी दर काँप जाता है*
*अली का नाम सुनकर अब भी खैबर काँप जाता है*

*आइये आज यौमे-फतह-ख़ैबर के हवाले से बात करते हैं*
*ज्यादातर हम सिर्फ़ इतना ही जानते हैं की ख़ैबर की जंग हुई थी , लेकिन जंग क्यों हुई वज़ह क्या थी ? हम ये नही जानते हैं*, 

*आपके सामने बेमिस्ल शुजाअत की  तारीख  battle of khaibar की documentary पेश करता हूँ* ,

*खैबर मदीना मुनव्वरा से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर की तरफ़ है*
*यह एक ऐसा इलाक़ा था जहाँ उस दौर में क़िलों* *(Fortresses) की बड़ी संख्या थी , आज उनके कुछ खंडरात बाक़ी हैं वो यहूद क़बीलों की बड़ी बस्तियाँ थीं*

*जंग-ए-खैबर के सबसे बड़े कारण ये थे*
*उनकी मुस्लिम विरोधी साज़िशें और गठजोड़*

*खैबर के यहूद क़बीले*
*बनी नज़ीर*
*बनी कुरैज़ा*
*बनी कैनुक़ा*
*इनमें से कुछ क़बीलों को मदीना से निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होंने  बार-बार मदीने में (षड्यंत्र)साज़िशें कीं मुनाफ़िक़ों के साथ मिलकर , रसूल अल्लाह के ख़िलाफ़ प्लान बनाए और कुफ़्फ़ार-ए-कुरैश को मुस्लिमों के खिलाफ उकसाया*

*ग़ज़वा-ए-अहज़ाब (खंदक)के दौरान खैबर के यहूद ने मक्का के कुरैश ,ग़त़फ़ान क़बीला और दूसरे क़बीलों को मुसलमानों पर हमला करने के लिए जमा किया था। यानी खैबर साज़िश का केंद्र बना हुआ था*।

*मदीना की सुरक्षा का मसला था*

*मदीना के आसपास दो इलाक़े थे-खैबर (उत्तर) मक्का (दक्षिण) कुरैश दक्षिण से खतरा थे और यहूद उत्तर से थे ।इसलिए खैबर की  तरफ़ से सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी थी*

*क्योंकि खैबर के यहूद अक्सर मदीना की जमीनों पर छापे मारते क़त्ल और लूट-पाट करते लोगों को भड़काते षड्यंत्र करते और यही  कारण उनसे सीधी जंग की वजह बन गया*।

*रसूल अल्लाह  1600 से ज़्यादा अपने असहाब को ले कर खैबर की तरफ़ कूच किया जब यहूद क़बीलो को ये ख़बर मिली तो वो अपने मज़बूत क़िलों में बंद हो गए , खैबर में 8 से 10 बड़े क़िले थे हर क़िला मजबूत, ऊँचा और हथियारों से लैस था इसलिए वहाँ ये लड़ाई हफ्तों तक चली और फ़तह हाथ नही आ रही थी*

*कभी आवारा-ओ-बे-ख़ान’माँ इश्क़*
*कभी शाहे शहाँ नौशेरवां इश्क़*
*कभी मैदां में आता है ज़रहपोश*
*कभी उरयान-ओ-बेतेग़-ओ-सिनाँ इश्क़*
*कभी तन्हाई-ए-कोहो दमन इश्क़*
*कभी* *सोज़-ओ-सुरूर-ओ-अंजुमन इश्क़*
*कभी* *सरमाया-ओ-महराब-ओ-मिम्बर*
*कभी मौला अली ख़ैबर शिकन इश्क़*!

*फिर आक़ा व मौला नबी करीम (सल्लालाहु अलैही वा आलैही वसल्लम) ने फ़रमाया-*

*“कल मैं ऐसे शख़्स के हाथ में झंडा (अलम) दूँगा,जिसके हाथों अल्लाह फ़त्ह़ देगा, वह अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं*।”

*सारी रात बहुत से रसूल अल्लाह के असहाब फ़िक्र में थे कल झंडा किसे मिलेगा कौन होगा वो? और अगले दिन*

*शेरे खुदा , हैदर-ए-क़र्रार ,  हज़रत अली अल मुर्तज़ा को झंडा दिया गया*।

*सही मुस्लिम हदीस 6222 पर ये” हदीस मौजूद है 👆*

*खैबर के सबसे मशहूर और सबसे मज़बूत  क़िला क़मूस के सामने झंडा हज़रत अली को दिया गया और अल्लाह ने उसी दिन फ़तह नसीब फ़रमाई  “हैदर-ए-क़र्रार ने दरे ख़ैबर  उखाड़  फैका”*

*“शाह-ए-मरदान, शेर-ए-यज़दान, क़ुव्वत-ए-परवरदिगार ला फ़ता इल्ला अली, ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िकार”*

*शाह-ए-मरदान = बहादुरों के बादशाह*
*शेर-ए-यज़दान = अल्लाह का शेर*
*क़ुव्वत-ए-परवरदिगार = अल्लाह की दी हुई ताक़त*
*ला फ़ता इल्ला अली = अली के बराबर कोई बहादुर नहीं*
*ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िकार = ज़ुल्फ़िकार जैसी कोई तलवार नहीं*

क्या आपको मालूम है नबी ए अकरमﷺ सबसे ज्यादा नाराज़ किस कबिले से थे ?

*क्या आपको मालूम है नबी ए अकरमﷺ सबसे ज्यादा नाराज़ किस कबिले से थे…..?*

عَنْ أَبِي بَرْزَةَ الْأَسْلَمِيِّ، قَالَ: «كَانَ أَبْغَضَ الْأَحْيَاءِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَنُو أُمَيَّةَ، وَبَنُو حَنِيفَةَ، وَثَقِيفٌ
*सहाबी ए रसूल؃ हज़रत अबू बरजाहرض* से रिवायत है आप फरमाते है के *रसूल अल्लाह؃* तमाम कबीलों में सबसे ज्यादा नाराज़ *बनू उमैय्या* से थे…. आप इन्हें ना पसंद फरमाया करते थे!!
📖मुस्तदरक 8482

जी हां!!आप ने ठीक पढ़ा…..
वो कबीला जिसकी मोहब्बत को कुछ नाम निहाद मुसलमान,कुछ नाम निहाद मौलवी जबरदस्ती आपके दिलों में,आपके अक़ीदो में शामिल करना चाहते हैं *वो कबीला बनू उमैय्या है के जिनसे रसूल अल्लाह؃ ही सबसे ज्यादा नाराज़ हैं* और ना पसंद किया करते थे!

*लेकिन क्यों भाई…..?*
*हुज़ूर क्यों नाराज़ थे…..?*

तो आइए एक नज़र *कुरान ओ हदीस* की रोशनी में….!!

जिस कबिले ने *रसूल अल्लाह؃* से जंग ए बद्र जंग ए ओहद की वो बनू उमैय्या है!

जो कबीला *रसूल अल्लाह؃* को शहीद करना चाहता था वो बनू उमैय्या ही है!

*उम्मूल मोमिनिन हज़रत ए आयशाرض* ने फरमाया *कुरान* में सजरा ए ख़ब्बीसा जिस मलउन फर्द के बारे में नाज़िल हुई वो इसी खानदान बनू उमैय्या का!
ये मलउन इब्ने मलउन इब्ने मलउन है!

इस्लाम की सबसे पहली शहीदा *सहाबिया ए रसूल हज़रत ए सुमैयाرض* को बनू उमैय्या ने ही शहीद किया!

इस्लाम में मर्दों में सबसे पहले शहीद *सहाबी ए रसूल हज़रत यासिरرع* को कत्ल बनू उमैय्या ने किया!

*मुकद्दस सहाबी ए रसूल हज़रत बिलालرض* के साथ इसी बनू उमैय्या कबिले ने मार पीट की *इस्लाम* लाने की वज़ह से!

*मुकद्दस सहाबी ए रसूल और रसूल अल्लाह के चाचा हज़रत ए अमीर ए हमज़ाرض* को बनू उमैय्या ने कत्ल करवाया..!

वो कौन से कबिले की औरत थी जिसने *हज़रत अमीर हमज़ाرض* का सीना चाक करके उनके कलेजे को चबाया…..? यही बनू उमैय्या…!

वलीद इब्ने उकबा जो *रसूल अल्लाह के मुकद्दस सहाबा* को परेशान किया करता था और शराब पी कर नशे की हालत में नमाज़ पढ़ाता था वो बनू उमैय्या का ही है!

*जिनलोगों ने हज़रत ए आयशाرض* को जंग ए जमल करने उकसाया वो यही बनू उमैय्या है!

जिनलोगों ने *अहले बैत؀ और सहाबाرض* के खिलाफ़ जंग ए सिफ़्फ़ीन की और हज़ारों *सहाबा* के कत्ल जैसे गुनाहे अज़ीम को अंजाम दिया वो यही बनू उमैय्या है!

शाम की लानती फौज ने *क़ाबे पर हमला किया काबे का ग़िलाफ जलाया…!* किसके कहने पर..? यही बनू उमैय्या के हुक्मरानों के कहने पर…!

सहिह बुखारी की हदीस में है मुकद्दस सहाबा में से एक *सहाबी ए रसूल हज़रत अम्मार इब्ने यासिरرض* के कातिल गिरोह को *रसूल अल्लाह؃* ने बागी और जहन्नमी गिरोह फरमाया….! वो कौन सा गिरोह था जो सामने था……? यही बनू उमैय्या!

*करबला में अहले बैत؀ और सहाबाرض* का कातिल यजीद इब्ने माविया बनू उमैय्या से है!

कुफ़े में *रसूल के शहजादों* का कातिल उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद, यजीद इब्ने माविया के पहले तख्त पर बिठाया हुआ बनू उमैय्या का गर्वनर था!

शाम की लानती फौज ने *मदीने* पर हमला किया *हजारों सहाबा* को कत्ल किया *मस्ज़िद ए नब्वी* में अज़ान नहीं होने दी, *सहाबा की मुकद्दस औरतों* को फौज के लिए हलाल कर दिया, जिससे हज़ारों नाजायज बच्चे पैदा हुए….! किसके कहने पर…? यही बनू उमैय्या….!

सहिह मुस्लिम की हदीस है!
वो लोग जो मिम्बर पर बैठकर *रसूल अल्लाह؃ और आल ए रसूल अल्लाह؀* पर लानत किया करते थे नौउज़बिल्लाह वो किसके गवर्नर थे……? यही बनू उमैय्या….!

*हज़रत अबू बक्र सिद्दीकرض* के दोनों बेटों के कातिल बनू उमैय्या है!

किसके कहने पर माविया इब्ने खुदैज ने *हज़रत अबू बक्र सिद्दीकرض* के शहजादे *हज़रत मुहम्मद इब्ने अबू बक्रرض* को कत्ल करके उनके जिस्म के हिस्से को गधे की लाश के साथ जलवाया….?
बनू उमैय्या के कहने पर….!!

अफ़सोस सद अफसोस!
*जिन्हें रसूल अल्लाह؃ ने नापसंद फरमाया, जिनसे आप नाराज़ थे…..!*
*जिनलोगों ने रसूल अल्लाहﷺ से जंग की आपको शहीद करना चाहा…!*
*जिनलोगों ने अहले बैत؀ से दुश्मनी की सहाबाرض से दुश्मनी की इन्हें कत्ल करवाया…..!*
आज इसी बनू उमैय्या की मोहब्बत को आपके दिलों ना सिर्फ जबरदस्ती शामिल करने की नापाक कोशिश हो रही है बल्कि इनकी मोहब्बत को ही ईमान का हिस्सा बताया जा रहा है…..!
इसी बनू उमैय्या के लोगों के नाम पर फातिहा लगाने को कहा जा रहा है! इन्हें जन्नती बताया जा रहा है!
इनलोगों का उर्स मनाने को कहा जा रहा है!
अस्तगफिरुल्लाह!! माज़अल्लाह!!!💔

*इससे बड़ी रसूल अल्लाह؃ की,अहले बैत؀ की सहाबाرض की गुस्ताखी क्या होगी….???*
*के जो इनका दुश्मन है, कातिल है उससे मोहब्बत करने को “सही अकीदे” का नाम दिया जा रहा है!!*
*अस्तगफिरुल्लाह!! माज़अल्लाह!!!* 💔💔

हम कभी तुम्हारे साथ इस गुस्ताखी में, इस लानत भरे काम में शामिल नहीं होने वाले….!
*हर सच्चे आशिक ए रसूलﷺ पर, हम गुलामाने मौला अली؀ पर लाख फतवे लगालो हम नहीं डरने वाले और नाहीं दुश्मन ए रसूल,दुश्मन ए अहले बैत ओ सहाबा के सामने झुकने वाले है..!*

*हम आशिक ए रसूल؃* ….रसूल अल्लाह की सुन्नत पर अमल करके बनू उमैय्या से या इसके किसी भी फर्द से कभी मोहब्बत नहीं कर सकते, कभी इनलोगों को पसंद करके इनके नाम की फातिहा नियाज़ उर्स नहीं करेंगे….!
*जिस से रसूल अल्लाह؃ नाराज़ उससे रसूलअल्लाहﷺ का उम्मति नाराज़ और सिर्फ़ इब्लिसل का उम्मति ही खुश होगा….!*
हमें दुनिया ओ आख़िरत में *रसूल अल्लाह؃ और उनके घरवालों* से उम्मीदें हैं!
हम *सहाबा* के कातिलों के नाम के साथ कभी भी जन्नती जन्नती का नारा नहीं लगा सकते!!

ये *मुनाफिकत* हमसे ना हो पाएगी….
*के कातिल भी रज़ीअल्लाह और मक़तूल भी रज़ी अल्लाह…..!*
*हम वफादार,जानिसार सहाबी ए रसूल؃* पर अपनी *जान* फिदा करने वाले लोग कातिल ओ दुश्मन ए सहाबा से कभी मोहब्बत नहीं कर सकते…..!

मैं *रसूल अल्लाहﷺ* के तमाम सच्चे आशिकों से दरख्वास्त करूंगा…..
*ख़ुदारा मेरे मोमिन भाइयों हमारी एक एक बातों की खुद तहकीक करो किताबों को पढ़ो, कुरान ओ हदीस का इल्म हासिल करो वरना ये लोग तुम्हें दुश्मन ए रसूलﷺ बनाकर बर्बाद कर देंगे!!*

*हिदायत के हैं दो ही उसूल…!*
*किताब उल्लाह और आले रसूल؀!*

24 Rajab Yaum e fatah jung e Khaibar

🏴 *जंगे ख़ैबर में कौन कौन (भागा) नाकामयाब हुआ और फिर किस की मदद से इस्लाम को फ़तह मिली ??*🙌


*अहलेसुन्नत की मशहूर व मारूफ़ किताब मुस्तद्रक हाकिम में जंगे ख़ैबर से मुतअल्लिक़ रिवायतों से इस जंग की कुछ अहम मालूमात पर नज़र डालते हैं*👉


حَدَّثَنَا أَبُو الْعَبَّاسِ مُحَمَّدُ بْنُ يَعْقُوبَ،
ثنا أَحْمَدُ بْنُ عَبْدِ الْجَبَّارِ، ثنا يُونُسُ بْنُ بُكَيْرٍ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ إِسْحَاقَ، قَالَ: حَدَّثَنِي بُرَيْدَةُ بْنُ سُفْيَانَ بْنِ بُرَيْدَةَ الْأَسْلَمِيُّ، عَنْ سَلَمَةَ بْنِ عَمْرِو بْنِ الْأَكْوَعِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: «بَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَبَا بَكْرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ إِلَى بَعْضِ حُصُونِ خَيْبَرَ فَقَاتَلَ وَجُهِدَ وَلَمْ يَكُنْ فَتْحٌ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحُ الْإِسْنَادِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “” أَخْبَرَنَا أَبُو قُتَيْبَةَ سَالِمُ بْنُ الْفَصْلِ الْآدَمِيُّ، بِمَكَّةَ، ثنا مُحَمَّدُ بْنُ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي شَيْبَةَ، ثنا عَلِيُّ بْنُ هَاشِمٍ، عَنِ ابْنِ أَبِي لَيْلَى، عَنِ الْحَكَمِ، وَعِيسَى، عَنْ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، عَنْ أَبِي لَيْلَى، عَنْ عَلِيٍّ أَنَّهُ قَالَ: يَا أَبَا لَيْلَى أَمَا كُنْتَ مَعَنَا بِخَيْبَرَ؟ قَالَ: بَلَى وَاللَّهِ كُنْتُ مَعَكُمْ، قَالَ: فَإِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «بَعَثَ أَبَا بَكْرٍ إِلَى خَيْبَرَ فَسَارَ بِالنَّاسِ وَانْهَزَمَ حَتَّى رَجَعَ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحُ الْإِسْنَادِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “”
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4338 – صحيح
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4338 – صحيح
तर्जुमा👉
हज़रत सलमा बिन अक्वा र अ फ़रमाते हैं: *रसूलअल्लाह स अ व स  ने हज़रत अबुबकर र अ को ख़ैबर के किले की जानिब भेजा, आप ने जंग की और बहुत जद्दोजहद की मगर फ़तह न हो सकी।*
हज़रत अबु लैला से मरवी है कि हज़रत अली र अ ने फ़रमाया: ए अबु लैला क्या तू हमारे साथ ख़ैबर में नही था ? उन्होंने जवाबन कहा :क्यों नही ? ख़ुदा की क़सम ! मैं तुम्हारे साथ ही तो था।हज़रत अली र अ ने फ़रमाया : *बेशक रसूलअल्लाह स अ व स ने हज़रत अबुबकर र अ को भेजा था, वो लोगों के हमराह दीवार फलाँग गए थे मगर नाकाम होकर वापस लौट आए थे।*
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أَخْبَرَنَا أَبُو الْعَبَّاسِ مُحَمَّدُ بْنُ أَحْمَدَ الْمَحْبُوبِيُّ، بِمَرْوَ، ثنا سَعِيدُ بْنُ مَسْعُودٍ، ثنا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَى، ثنا نُعَيْمُ بْنُ حَكِيمٍ، عَنْ أَبِي مُوسَى الْحَنَفِيِّ، عَنْ عَلِيٍّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: «سَارَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِلَى خَيْبَرَ، فَلَمَّا أَتَاهَا بَعَثَ عُمَرُ رَضِيَ اللَّهُ تَعَالَى عَنْهُ، وَبَعَثَ مَعَهُ النَّاسَ إِلَى مَدِينَتِهِمْ أَوْ قَصْرِهِمْ، فَقَاتَلُوهُمْ فَلَمْ يَلْبَثُوا أَنْ هَزَمُوا عُمَرَ وَأَصْحَابَهُ، فَجَاءُوا يُجَبِّنُونَهُ وَيُجَبِّنُهُمْ فَسَارَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ» الْحَدِيثُ. «هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحُ الْإِسْنَادِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ»
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4340 – صحيح

तर्जुमा👉
हज़रत अली र अ फ़रमाते हैं : *रसूलअल्लाह स अ व स ने ख़ैबर की तरफ़ रवानगी की,जब वहाँ पहुँच गए तो आप अलैहिस्सलाम ने हज़रत उमर  र अ को दुश्मन के महल की तरफ़ भेजा और हज़रत उमर के हमराह सहाबा र अ को भी भेजा।उन्होंने दुश्मन से जंग की,लेकिन हज़रत उमर और उनके साथियों को कामयाबी हासिल न हो सकी, ये लोग एक दूसरे को बुज़दिल क़रार देते हुए लौट कर वापस आ गए।*

4340 मुस्तद्रक हाकिम

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حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرٍ أَحْمَدُ بْنُ سَلْمَانَ الْفَقِيهُ، بِبَغْدَادَ، ثنا مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ سُلَيْمَانَ، ثنا الْقَاسِمُ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، ثنا يَحْيَى بْنُ يَعْلَى، ثنا مَعْقِلُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ، عَنْ أَبِي الزُّبَيْرِ، عَنْ جَابِرٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، «أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ دَفَعَ الرَّايَةَ يَوْمَ خَيْبَرَ إِلَى عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، فَانْطَلَقَ، فَرَجَعَ يُجَبِّنُ أَصْحَابَهُ وَيُجَبِّنُونُهُ» هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ مُسْلِمٍ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ “”
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4341 – القاسم بن أبي شيبة واه

तर्जुमा👉

हज़रत जाबिर र अ फ़रमाते हैं : *नबी करीम स अ व स ने ख़ैबर के दिन हज़रत उमर र अ को अलम अता फ़रमाया : हज़रत उमर अपने साथियों के हमराह जंग करने गए,लेकिन हज़रत उमर लौट कर आ गए,और हज़रत उमर अपने साथियों को और उन के साथी हज़रत उमर र अ को बुज़दिल कह रहे थे।*

4341 मुस्तद्रक हाकिम

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حَدَّثَنَا أَبُو عَبْدِ اللَّهِ مُحَمَّدُ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ الصَّفَّارُ، إِمْلَاءً، ثنا زَكَرِيَّا بْنُ يَحْيَى بْنُ مَرْوَانَ، وَإِبْرَاهِيمُ بْنُ إِسْمَاعِيلَ السِّيُوطِيُّ، قَالَا: ثنا فُضَيْلُ بْنُ عَبْدِ الْوَهَّابِ، ثنا جَعْفَرُ بْنُ سُلَيْمَانَ، عَنِ الْخَلِيلِ بْنِ مُرَّةَ، عَنْ عَمْرِو بْنِ دِينَارٍ، عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: لَمَّا كَانَ يَوْمُ خَيْبَرَ بَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رَجُلًا فَجَبُنَ، فَجَاءَ مُحَمَّدُ بْنُ مَسْلَمَةَ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، لَمْ أَرَ كَالْيَوْمِ قَطُّ، قُتِلَ مَحْمُودُ بْنُ مَسْلَمَةَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ: “” لَا تَمَنَّوْا لِقَاءَ الْعَدُوِّ، وَسَلُوا اللَّهَ الْعَافِيَةَ، فَإِنَّكُمْ لَا تَدْرُونَ مَا تُبْتَلُونَ مَعَهُمْ، وَإِذَا لَقِيتُمُوهُمْ، فَقُولُوا: اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبُّنَا وَرَبُّهُمْ، وَنَوَاصِينَا وَنَوَاصِيهُمْ بِيَدِكَ، وَإِنَّمَا تَقْتُلْهُمْ أَنْتَ، ثُمَّ الْزَمُوا الْأَرْضَ جُلُوسًا، فَإِذَا غَشُوكُمْ فَانْهَضُوا وَكَبِّرُوا “” ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَأَبْعَثَنَّ غَدًا رَجُلًا يُحِبُّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيُحِبَّانِهِ، لَا يُوَلِّي الدُّبُرَ، يَفْتَحُ اللَّهُ عَلَى يَدَيْهِ» فَتَشَرَّفَ لَهَا النَّاسُ، وَعَلِيٌّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ يَوْمَئِذٍ أَرْمَدُ، فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «سِرْ» فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، مَا أُبْصِرُ مَوْضِعًا، فَتَفَلَ فِي عَيْنَيْهِ، وَعَقَدَ لَهُ وَدَفَعَ إِلَيْهِ الرَّايَةَ، فَقَالَ عَلِيٌّ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، عَلَامَ أُقَاتِلُهُمْ؟ فَقَالَ: «عَلَى أَنْ يَشْهَدُوا أَنَّ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَإِنِّي رَسُولُ اللَّهِ فَإِذَا فَعَلُوا ذَلِكَ فَقَدْ حَقَنُوا مِنِّي دِمَاءَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ إِلَّا بِحَقِّهِمَا، وَحِسَابُهُمْ عَلَى اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ» ، قَالَ: فَلَقِيَهُمْ فَفَتَحَ اللَّهُ عَلَيْهِ «قَدِ اتَّفَقَ الشَّيْخَانِ عَلَى إِخْرَاجِ حَدِيثِ الرَّايَةِ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ بِهَذِهِ السِّيَاقَةِ»
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4342 – أخرجا ذكر الراية منه

तर्जुमा👉
हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह र अ फ़रमाते हैं : ख़ैबर के दिन रसूलअल्लाह स अ व स ने एक आदमी को भेजा लेकिन वो कामयाब न हो सका, मोहम्मद बिन मसल्लमा आये,और बोले : या रसूलअल्लाह स अ व स मैंने आज जैसा दिन कभी नहीं देखा,महमूद बिन मुसल्लीमा शाहिद हो गए हैं।रसूलअल्लाह स अ व स ने फ़रमाया: दुश्मन से मुठभेड़ की आरज़ू मत किया करो,बल्कि अल्लाह तआला से सलामती माँगो,क्योंकि तुम लोग नही जानते कि तुम पर कौनसी आज़माइश आने वाली हैं।और जब दुश्मन का सामना हो तो यूँ दुआ माँगो “ए अल्लाह ! तू ही हमारा रब है और उनका रब है, हमारी पेशानियां और उनकी पेशानियां तेरे ही हाथ मैं है, उनको तू ही क़त्ल करेगा।फिर तुम ज़मीन के साथ चिपक कर बैठ जाओ,जब वो तुम्हारे अंदर घुस आएं तो नारा ए तकबीर बुलन्द करते हुए उठ खड़े हो, *रसूलअल्लाह स अ व स ने इरशाद फ़रमाया :में कल ऐसे आदमी को जंग के लिए भेजूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं,”वो पीठ फेर कर नही भागेगा(जैसे अभी तक सब बड़े बड़े भाग कर वापस आ गए),अल्लाह तआला उसके हाथ पर फ़तह देगा।” लोग इस बात को “क़ाबिले फ़ख्र” समझने लगे।उस दिन हज़रत अली र अ की आँखें आयी हुई थीं, रसूलअल्लाह स अ व स ने हज़रत अली को दुश्मन पर हमला करने को कहा:तो हज़रत अली र अ ने अर्ज़ की :या रसूलअल्लाह स अ व स मुझे तो कुछ दिखाई नही देता,रसूलअल्लाह स अ व स ने उनकी आँखों पर अपना लोआबे दहन लगाया ,और फिर हज़रत अली को लश्कर की सरदारी और अलम अता फ़रमाया।* हज़रत अली र अ ने अर्ज़ किया या रसूलअल्लाह में किस मुतालबे पर जिहाद करूँ ? आप स अ व स ने फ़रमाया : इस मुतालबे पर की वो गवाही दें कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नही और बेशक में अल्लाह का रसूल हूँ।अगर वो लोग ये गवाही दे दें तो उन्होंने मुझसे अपने माल और जानों को बचा लिया।और उनका हिसाब अल्लाह के ज़िम्मे है। *फिर हज़रत अली र अ ने हमला किया और अल्लाह तआला Tele हज़रत अली को फ़तह अता फ़रमा दी।*

4342 मुस्तद्रक हाकिम

أَخْبَرَنَا أَحْمَدُ بْنُ جَعْفَرٍ الْقَطِيعِيُّ، ثنا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ أَحْمَدَ بْنِ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنِي أَبِي، ثنا عَبْدُ الصَّمَدِ بْنُ عَبْدِ الْوَارِثِ، ثنا عِكْرِمَةُ بْنُ عَمَّارٍ، ثنا إِيَاسُ بْنُ سَلَمَةَ، قَالَ: حَدَّثَنِي أَبِي قَالَ: «شَهِدْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَيْبَرَ حِينَ بَصَقَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي عَيْنَيْ عَلِيٍّ، فَبَرَأَ فَأَعْطَاهُ الرَّايَةَ» فَبَرَزَ مَرْحَبٌ وَهُوَ يَقُولُ:
[البحر الرجز]
قَدْ عَلِمَتْ خَيْبَرُ أَنِّي مَرْحَبُ … شَاكِي السِّلَاحِ بَطَلٌ مُجَرَّبُ
إِذَا الْحُرُوبُ أَقْبَلَتْ تَلَهَّبُ
قَالَ: فَبَرَزَ لَهُ عَلِيٌّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ وَهُوَ يَقُولُ:
[البحر الرجز]
أَنَا الَّذِي سَمَّتْنِي أُمِّي حَيْدَرَهْ … كَلَيْثِ غَابَاتٍ كَرِيهِ الْمَنْظَرَهْ
أُوَفِّيكُمْ بِالصَّاعِ كَيْلَ السَّنْدَرَهْ
قَالَ: فَضَرَبَ مَرْحَبًا فَفَلَقَ رَأْسَهُ فَقَتَلَهُ، وَكَانَ الْفَتْحُ «هَذَا حَدِيثٌ صَحِيحٌ عَلَى شَرْطِ مُسْلِمٍ، وَلَمْ يُخَرِّجَاهُ بِهَذِهِ السِّيَاقَةِ»
[التعليق – من تلخيص الذهبي] 4343 – على شرط مسلم
तर्जुमा👉

हज़रत अयास बिन सलमा र अ अपने वालिद का ये बयान नक़्ल करते हैं : हमने रसूलअल्लाह स अ व स के हमराह ग़ज़वा ए ख़ैबर में शिरकत की।तो रसूलअल्लाह स अ व स ने हज़रत अली र अ की आँखों मैं अपना लोआबे दहन लगाया तो उनकी आंखें ठीक हो गईं।आप अलैहिस्सलाम ने हज़रत अली र अ को अलम अता फ़रमाया।

*मरहब (दुश्मन की तरफ़ से सबसे खतरनाक और ताक़तवर लड़ाकू) ने यूँ कहते हुए मुबारीज़त तलब की : “ख़ैबर जानता है कि मैं मरहब हूँ,हथियार बन्द,तजुर्बेकार योद्धा हूँ, जब जंग शुरू हो जाये तो ये शोलाज़न होता है।*

*हजरत अली र अ ने यूँ कहते हुए उसको जंग के लिए बुलाया: ” मैं वो हुँ जिसका नाम उसकी माँ ने हैदर रखा है जैसा कि जंगल का शेर,रौबदार वजाहत वाला,मैं तुम में वसीअ पैमाने पर तबाही फैला दूँगा।”*

*फिर हज़रत अली ने मरहब पर एक ज़र्ब लगायी और उसका सर चीर कर रख दिया और उसको(एक ही वार मैं) क़त्ल कर दिया तो ख़ैबर फ़तह हो गया।*