मेरे दीन पर नहीं मरेगा।

किताब है, “किताबुल जुमल मिन अन्साबिल अशराफ” जिल्द नंबर,5 और सफा नंबर 134 पर बलाज़री सहीह रिवायत लाये हैं।

अम्र बिन आस कहते हैं कि, “मैं रसूलुल्लाह के पास बैठा हुआ था, तभी रसूलुल्लाह ने मुझसे एक बात कही। ए अम्र! इस जगह से, इस कोने से, इस रास्ते से एक ऐसा शख्स आने वाला है जो मेरी उम्मत पर, मेरी मिल्लत पर, मेरी क़ौम पर, मेरे दीन पर नहीं मरेगा।
अम्र बिन आस कहते हैं, “मैं डर गया। मुझे लगा कहीं वह शख्स मेरा बाप न हो! क्योंकि उसी तरफ़ अम्र बिन आस के वालिद मोहतरम वज़ू कर रहे थे।”
“रजुलुन यमूतू अला गैर मिल्लती”
सब के सब इस तजस्सुस में पड़ गए, आखिर कौन है वो शख्स?
फ़-तल्ला मावियाह (तो मावियाह आ गया) यानी मावियाह ज़ाहिर हुआ।

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