अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 72 ग़ज़वा अहज़ाब पार्ट 2

इन्हीं दिनों में इन दोनों घटनाओं से कहीं बढ़कर एक और घटना घटी, जिसे इमाम बुखारी ने हज़रत जाबिर रजि० से रिवायत की है। हज़रत जाबिर का बयान है कि हम लोग खंदक खोद रहे थे कि एक बड़ा पत्थर मिला, टुकड़ा आड़े आ गया। लोग नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि यह चट्टाननुमा टुकड़ा खंदक़ में रुकावट बन गया है। आपने फ़रमाया, मैं उतर रहा हूं। इसके बाद आप उठे। आपने पेट पर पत्थर बांधा हुआ था— हमने तीन दिन से कुछ चखा न था— फिर नबी सल्ल० ने कुदाल लेकर मारा, तो वह चट्टाननुमा टुकड़ा भुरभुरे ढेर में बदल गया। 2

हज़रत बरा रज़ि० का बयान है कि खंदक़ (की खुदाई) के मौक़े पर कुछ हिस्सों में एक बड़ी चट्टान आ पड़ी, जिससे कुदाल उचट जाती थी, कुछ टूटता ही न था । हमने रसूलुल्लाह से इसकी शिकायत की। आप तशरीफ़ लाए, कुदाल ली और बिस्मिल्लाह कहकर एक चोट मारी, (तो एक टुकड़ा टूट गया) और फ़रमाया, अल्लाहु अक्बर ! मुझे शामदेश की कुंजियां दी गई हैं। अल्लाह की क़सम ! मैं इस वक़्त वहां के लाल महलों को देख रहा हूं ।

फिर दूसरी चोट लगाई तो एक और टुकड़ा कट गया और फ़रमाया, अल्लाहु अक्बर ! मुझे फ़ारस दिया गया है। अल्लाह की क़सम ! मैं इस वक़्त मदाइन का सफ़ेद महल देख रहा हूं ।

फिर तीसरी चोट लगाई और फ़रमाया, बिस्मिल्लाह ! तो बाक़ी चट्टान भी कट गई, फिर फ़रमाया अल्लाहु अक्बर ! मुझे यमन की कुंजियां दी गई हैं। अल्लाह की क़सम ! मैं इस वक़्त अपनी इस जगह से सनआ के फाटक देख रहा हूं ।

इब्न इस्हाक़ ने ऐसी ही रिवायत हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु से ज़िक्र की है।

चूंकि मदीना उत्तर के अलावा बाक़ी दिशाओं से हरें (लावे की चट्टानों) पहाड़ों और खजूर के बाग़ों से घिरा हुआ है और नबी सल्ल० एक माहिर और

1. इब्ने हिशाम, 2/218

2. सहीह बुखारी 2/588

3. सुनने नसई 2/56, मुस्नद अहमद। ये शब्द नसई के नहीं हैं और नसई में ‘सहाबा में से किसी एक व्यक्ति’ का उल्लेख है। 4. इब्ने हिशाम 2/219
अनुभवी फ़ौजी की हैसियत से यह जानते थे कि मदीना पर इतनी बड़ी फ़ौज का हमला केवल उत्तर ही से हो सकता है। इसलिए आपने सिर्फ उत्तर दिशा ही में खंदक़ खुदवाई ।

मुसलमानों ने खंदक खोदने का काम बराबर जारी रखा। दिन भर खुदाई करते और शाम को घर पलट आते, यहां तक कि मदीने की दीवारों तक कुफ़्फ़ार की भारी फ़ौज के पहुंचने से पहले निश्चित प्रोग्राम के मुताबिक़ खंदक तैयार हो गई। 1

उधर कुरैश अपनी चार हज़ार की फ़ौज लेकर मदीना पहुंचे तो रौमा, जर्फ़ और ज़ग़ाबा के बीच मजमउल अस्याल में पड़ाव डाला और दूसरी ओर ग़तफ़ान और उनके नज्दी साथी छ: हज़ार की फ़ौज लेकर आये, तो उहुद के पूर्वी किनारे पर स्थित जंब नक़मी में पड़ाव डाल दिया।

‘और जब ईमान वालों ने इन जत्थों को देखा, तो कहा, यह तो वही चीज़ है जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वायदा किया था और अल्लाह और उसके रसूल ने सच ही फ़रमाया था और इस (हालत) ने उनके ईमान और आज्ञापालन – भाव को और बढा दिया।’ (33/22)

लेकिन मुनाफ़िक़ों और कमज़ोर नफ़्स लोगों की नज़र उस फ़ौज पर पड़ी तो उनके दिल दहल गए-

‘और जब मुनाफ़िक़ और वे लोग जिनके दिलों में बीमारी है, कह रहे थे कि अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वायदा किया था, वह मात्र धोखा था ।’

(33/12)

बहरहाल उस फ़ौज से मुक़ाबले के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तीन हज़ार मुसलमानों की फ़ौज लेकर तशरीफ़ लाए और सलअ पहाड़ी की ओर पीठ करके क़िलाबन्दी की शक्ल अख्तियार कर ली। सामने खंदक़ थी, जो मुसलमानों और कुफ़्फ़ार के बीच रुकावट थी। मुसलमान का कोड शब्द यह था ‘हामीम! इनकी मदद न की जाए।’

मदीने का प्रबन्ध हज़रत इब्ने उम्मे मक्तूम के हवाले किया गया था और औरतों और बच्चों को मदीने के क़िलों और गढ़ियों में सुरक्षित कर दिया गया था ।

जब मुश्कि हमले की नीयत से मदीने की ओर बढ़े तो क्या देखते हैं कि एक चौड़ी-सी खंदक उनके और मदीना के बीच रोक बन गई है। मजबूर होकर उन्हें घेराव डालना पड़ा, हालांकि वे घरों से चलते वक़्त इसके लिए तैयार होकर

इब्ने हिशाम 3/220, 2 21नहीं आए थे, क्योंकि प्रतिरक्षा की यह योजना, खुद उनके कहने के मुताबिक़, एक ऐसी चाल थी जिसे अरब जानते ही न थे, इसलिए उन्होंने इस मामले को सिरे से अपने हिसाब में दाखिल ही न किया था ।

मुश्रिक खंदक़ के पास पहुंच कर गुस्से में भरे हुए चक्कर काटने लगे। उन्हें ऐसे कमज़ोर बिन्दु की खोज थी जहां से वे उतर सकें।

इधर मुसलमान उनकी चलत-फिरत पर पूरी-पूरी नज़र रखे हुए थे और उन पर तीर बरसाते रहते थे, ताकि उन्हें खंदक़ के क़रीब आने की हिम्मत न हो, वे इसमें न कूद सकें और न मिट्टी डालकर पार करने के लिए रास्ता बना सकें ।

उधर कुरैश के घुड़सवारों को गवारा न था कि खंदक़ के पास घेराव के नतीजों के इंतिज़ार में वे बे-फ़ायदा पड़े रहें। यह उनकी आदत और शान के खिलाफ़ बात थी। चुनांचे उनकी एक टीम ने, जिनमें अम्र बिन अब्दे वुद्द, इक्रिमा बिन अबू जहल और जुरार बिन खत्ताब वग़ैरह थे एक तंग जगह से खंदक़ पार कर ली और उनके घोड़े खंदक और सलअ के बीच चक्कर काटने लगे ।

इधर से हज़रत अली रज़ि० कुछ मुसलमानों के साथ निकले और जिस जगह से उन्होंने घोड़े कुदाए थे, उसे क़ब्ज़े में लेकर उनकी वापसी का रास्ता बन्द कर दिया। इस पर अम्र बिन अब्दे वुद्द ने लड़ने के लिए ललकारा। हज़रत अली रज़ि० दो-दो हाथ करने के लिए मुक़ाबले में पहुंचे और एक ऐसा जुमला फेंका कि वह गुस्से में आकर घोड़े से कूद पड़ा और उसकी कूचें काटकर, चेहरा मारकर हज़रत अली के आमने-सामने आ गया। बड़ा बहादुर और शहज़ोर था । दोनों में जोरदार टक्कर हुई। एक ने दूसरे पर बढ़-चढ़कर वार किए, आखिर में हज़रत अली रज़ि० ने उसका काम तमाम कर दिया। बाक़ी मुश्कि भाग कर खंदक़ पार चले गए। वे इतने आतंकित थे कि इक्रिमा ने भागते हुए अपना नेज़ा भी छोड़ दिया ।

मुश्किों ने किसी-किसी दिन खंदक़ पार करने या उसे पाट कर रास्ता बनाने की बड़ी ज़बरदस्त कोशिश की, लेकिन मुसलमानों ने बड़ी अच्छी तरह उन्हें दूर रखा और उन्हें इस तरह तीरों से छीला और ऐसी हिम्मत से उनकी तीरंदाज़ी का मुक़ाबला किया, कि उनकी हर कोशिश नाकाम हो गई।

इसी तरह के ज़ोरदार मुक़ाबलों के बीच अल्लाह के रसूल सल्ल० और सहाबा किराम रज़ि० की कुछ नमाज़ें भी फ़ौत हो गई थीं।

चुनांचे बुखारी-मुस्लिम दोनों में हज़रत जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत की गई है कि हज़रत उमर बिन खत्ताब रजि० खंदक़ के दिन आए और कुफ़्फ़ार को सख्त-सुस्त कहने लगे कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! आज मैं बड़ी

मुश्किल से सूरज डूबते-डूबते नमाज़ पढ़ सका ।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, और मैंने तो अल्लाह की क़सम ! अभी नमाज़ पढ़ी ही नहीं है। इसके बाद हम लोग नबी सल्ल० के साथ बुतहान में उतरे। आपने नमाज़ के लिए वुज़ू फ़रमाया और हमने भी वुज़ू किया। फिर आपने अस्त्र की नमाज़ पढ़ी। यह सूरज डूब चुकने की बात है। इसके बाद मरिब की नमाज़ पढ़ी। 1

नबी सल्ल० को इस नमाज़ के फ़ौत होने का इतना मलाल था कि आपने मुश्किों के लिए बद- दुआ कर दी। चुनांचे सहीह बुखारी में हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्ल० ने खंदक़ के दिन फ़रमाया, अल्लाह इन मुश्किों समेत इनके घरों और क़ब्रों को आग से भर दे। जिस तरह इन्होंने हमको बीच की नमाज़ को अदा करने से रोके रखा, यहां तक कि सूरज डूब गया 12

मुस्नद अहमद और मुस्नद शाफ़ई में रिवायत है कि मुश्किों ने आपको जुहर, अस्र, मरिब और इशा की नमाज़ों के वक़्त लड़ाई में लगाए रखा, चुनांचे आपने ये सारी नमाज़ें इकट्ठा पढ़ीं।

है इमाम नववी फ़रमाते हैं कि इन रिवायतों में मेल की शक्ल यह है कि खंदक़ की लड़ाई का सिलसिला कई दिन तक जारी रहा। पस किसी दिन एक स्थिति का सामना करना पड़ा और किसी दिन दूसरी ।

यहीं से यह बात भी निकलती है कि मुश्किों की ओर से खंदक़ पार करने की कोशिश और मुसलमानों की ओर से लगातार प्रतिरक्षा कई दिन तक चलती रही, मगर चूंकि दोनों फ़ौजों के बीच खंदक़ रोक थी, इसलिए आमने-सामने की खूनी लड़ाई की नौबत न आ सकी, बल्कि सिर्फ़ तीरंदाज़ी होती रही ।

इसी तीरंदाज़ी में दोनों फ़रीक़ों के कुछ लोग मारे भी गए, लेकिन उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है यानी छः मुसलमान और दस मुश्रिक, जिनमें से एक या दो आदमी तलवार से क़त्ल किए गए थे I

इसी तीरंदाज़ी के दौरान हज़रत साद बिन मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु को भी एक तीर लगा, जिससे उनके दस्ते की शह रग कट गई। उन्हें हबान बिन अरका नामी एक कुरैशी मुश्कि का तीर लगा था।

1. सहीह बुखारी 2/590

2. सहीह बुखारी 2/590 3. मुख्तसरुस्सीर:, शेख अब्दुल्लाह पृ० 287, शरह मुस्लिम, नववी 1/227

Sayyid ul Aabideen

Hazrat Zaid bin Arqam Se Riwayat Karte Hain Ke RasoolAllah (SallAllahu Alaihi wa Aalaehi wa Sallam) Ne irshad Farmaya:
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“Mere is Bete (Hussain) Ke Haan Ek Ladka Paida Hoga Jiska Naam ALI Hoga. Jab Qayamat Ka Din Hoga To Ek Nida Dene Wala Arsh Ki Pehnaayiyo Se Nida Dega Ke Sayyid ul Aabideen (Saare Aabid’on Ke Sardar) Khada Hojaye, Toh Woh Ladka Khada Hojayega.”
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Subhan Allah Allahu Akbar
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As Salaam Ya Sayyid us Sajideen
As Salaam Ya Imam Zain ul Abideen
As Salaam Ya Ali ibn Hussain ibn Ali ibn Abi Talib
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References :

Ibne Asakir, Taarikh Madina ad-Damishq, 54:276

Ibne Jauzi, Tazkiratul Khawaas, 303,

Ibne Taimiya, Minhaj us Sunna al-Nabawiyyah, 4:11

Ibne Hajar Makki, As sawa aqal mahraqah, 2:586

Shablanji, Noor al Absar fee Manaqib Aale Baytin Nabi al-Mukhtar: 288
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Jinke Saqde Se Aaj India o Pakistan Mein Islam Hai, Wo Sayyid Hasan Khwaja Gareeb Nawaz Moinuddin Chishti Ke Jadde Amjad Hai Imam Zain ul Abideen Alaihis Salaam
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اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی سَیِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَ عَلَی اٰلِ سَیِّدِنَا م