Junayd Baghdadi and Barber

Junayd Baghdadi once said, “I learned sincerity from a barber.”

One day, his teacher told him, “Your hair has grown too long; go get a haircut.”
He had no money in his pocket. When he reached the barber’s shop, the barber was cutting another customer’s hair.
Junayd said, “Uncle, will you cut my hair for the sake of Allah?”

The moment the barber heard this, he set his customer aside and said,
“I cut hair every day for money. Today, someone has come for the sake of Allah.”

He kissed Junayd’s head, seated him on the chair, and started cutting his hair while crying.

Junayd thought to himself, “One day, when I have money, I will definitely give something to this man.”

Years passed. He became a great Sufi saint. One day, he went to meet the barber and reminded him of the incident, offering him some money.

The barber replied, “Junayd, you have become such a great Sufi, yet you still haven’t understood that when something is done for the sake of Allah, its reward is not taken from His creation.”

अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 66


1. सरीया अबू सलमा

उहुद की लड़ाई के बाद मुसलमानों के खिलाफ सबसे पहले बनू असद बिन खुज़ैमा का क़बीला उठा। उसके बारे में मदीना में यह खबर पहुंची कि खुवैलद के दो बेटे तलहा और सलमा अपनी क़ौम और अपने मानने वालों को लेकर बनू असद को रसूलुल्लाह पर हमले की दावत देते फिर रहे हैं।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने झट डेढ सौ अंसार और मुहाजिरों का एक दस्ता तैयार फ़रमाया और हज़रत अबू सलमा रज़ि० को उसका झंडा देकर सेनापति बनाकर रवाना कर दिया।

हज़रत अबू सलमा ने बनू असद के हरकत में आने से पहले ही उन पर इतना अचानक हमला किया कि वे भाग कर इधर-उधर बिखर गए। मुसलमानों ने उनके ऊंटों और बकरियों पर क़ब्ज़ा कर लिया और सकुशल मदीना वापस आ गए। उन्हें आमने-सामने की लड़ाई भी नहीं लड़नी पड़ी।

यह सरीया मुहर्रम 04 हि० के चांद निकलने पर रवाना किया गया था । वापसी के बाद हज़रत अबू सलमा का एक घाव, जो उन्हें उहुद में लगा था, फूट पड़ा और उसकी वजह से वह जल्द ही वफ़ात पा गए। 1

2. अब्दुल्लाह बिन उनैस रज़ि० की मुहिम

इसी माह मुहर्रम सन् 04 हि० की 5 तारीख को यह ख़बर मिली कि खालिद बिन सुफ़ियान हुज़ली मुसलमानों पर हमला करने के लिए फ़ौज जमा कर रहा है। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसके खिलाफ़ कार्रवाई के लिए अब्दुल्लाह बिन उनैस रज़ि० को रवाना फ़रमाया।

अब्दुल्लाह बिन उनैस रज़ियल्लाहु अन्हु मदीना से 18 दिन बाहर रहकर 23 मुहर्रम को वापस तशरीफ़ लाए। वह खालिद को क़त्ल करके उसका सर भी साथ लाए थे। जब नबी सल्ल० की सेवा में हाज़िर होकर उन्होंने यह सर आपके सामने पेश किया तो आपने उन्हें एक डंडा दिया और फ़रमाया कि यह मेरे और तुम्हारे दर्मियान क़ियामत के दिन निशानी रहेगा। चुनांचे जब उनकी वफ़ात का

1. जादुल मआद, 2/108

वक़्त आया तो उन्होंने वसीयत की कि यह डंडा भी उनके साथ उनके कफ़न में लपेट दिया जाए।’

3. रजीअ का हादसा

इसी साल 04 हि० के सफ़र महीने में अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास अज्ल और क़ारा के कुछ लोग हाज़िर हुए और ज़िक्र किया कि उनके अन्दर इस्लाम की कुछ चर्चा है, इसलिए आप उनके साथ कुछ लोगों को दीन सिखाने और कुरआन पढ़ाने के लिए रवाना फ़रमा दें।

आपने इब्ने इस्हाक़ के अनुसार 6 लोगों को और सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक़ दस लोगों को रवाना फ़रमाया और इब्ने इस्हाक़ के अनुसार मुर्सद बिन अबी मुर्सद ग़नवी को और सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक़ आसिम बिन उमर बिन खत्ताब के नाना हज़रत आसिम बिन साबित को उनका अमीर मुक़र्रर फ़रमाया ।

जब ये लोग राबिग़ और जद्दा के बीच क़बीला हुज़ैल के रजीअ नामी एक चश्मे पर पहुंचे, तो उन पर अल और क़ारा के उक्त लोगों ने क़बीला हुज़ैल की एक शाखा बनू लह्यान को चढ़ा दिया और बनू लह्यान के कई सौ तीरंदाज़ उनके पीछे लग गए और पद-चिह्नों को देख-देखकर उन्हें जा लिया। ये सहाबा किराम एक टीले पर चढ़ गए।

बनू लह्यान ने उन्हें घेर लिया और कहा, तुम्हारे लिए वचन है कि अगर हमारे पास उतर आओ, तो हम तुम्हारे किसी आदमी को क़त्ल नहीं करेंगे ।

हज़रत आसिम ने उतरने से इंकार कर दिया और अपने साथियों समेत उनसे लड़ाई शुरू कर दी। सात आदमी शहीद हो गए और सिर्फ़ तीन आदमी हज़रत खुबैब, जैद बिन दस्ना और एक और सहाबी बाक़ी बचे ।

अब फिर बनू लह्यान ने अपना वचन दोहराया और उस पर तीनों सहाबी उनके पास उतर कर आए, लेकिन उन्होंने क़ाबू पाते ही वचन भंग कर दिया और उन्हें अपनी कमानों की तांत से बांध लिया ।

इस पर तीसरे सहाबी ने यह कहते हुए कि पहली बार ही वचन भंग कर दिया गया है, उनके साथ जाने से इंकार कर दिया। उन्होंने खींच घसीट कर ले जाने की कोशिश की, लेकिन कामियाब न हुए, तो उन्हें क़त्ल कर दिया। हज़रत वक़्त आया तो उन्होंने वसीयत की कि यह डंडा भी उनके साथ उनके कफ़न में लपेट दिया जाए।

1. ज़ादुल मआद, 2/109, इब्ने हिशाम 2/619, 620

Biography Of Imam Muhammad Baqir AS | Mufti Fazal Hamdard

*1 रज्जब उल मुरज्जब यौम ए जहुर ए पुरनूर 5वे इमाम, इमाम मोहम्मद बाकिर इब्ने इमाम जैनुल आबेदीन (अलयहिस्सलाम)*🎂🎂

नाम:- मोहम्मद
लकब:- बाकिर उल उलुम (ज्ञान का विभाजक)
कुन्नियत:- अबू जाफर
वालिद:- अली इब्ने हुसैन, जैनुल आबेदीन
वालिदा:- फातिमा बिन्त अल-हसन
वीलादात:- 1 रज्जब 57 हिजरी (मदीना शरीफ)
सहादत:- 7 जुल हिज्जा 114 हिजरी,, अब्बासि खलीफा हिशाम द्वारा ने जहर दिए जाने के बाद शहादत  हूवी,,
मजार शरीफ:- जन्नतुल बकी कब्रिस्तान (मदीना शरीफ)

*इमाम मोहम्मद बाकिर (अलैहिस्सलाम) को रसूलल्लाह ﷺ ने सलाम भेजा है*

*इमाम जाफर सादिक (अलैहिस्सलाम) फरमाते है: एक दिन रसूलल्लाह ﷺ ने हजरत जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी (राजी अल्लाह अन्हो) से कहा तुम तब तक जिंदा रहोगे जब तक तुम मेरे बेटे मोहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली इब्न-ए-अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) से नहीं मिलोगे, तुम उससे मिलो तो उसे मेरा सलाम (सलाम) देना” एक दिन जब हजरत जाबिर (राजी0) इमाम ज़ैनउल आबेदीन (अलैहिस्सलाम) से मिलने गए, तो उन्होंने देखा कि एक छोटा लड़का इमाम (अलैहिस्सलाम) के बगल में बैठा है। उन्होंने छोटे लड़के को सलाम क्या और उसे पास आने और अपनी पीठ दिखाने के लिए कहा। फिर उन्होंने इमाम जैनुल आबेदीन (अलैहिस्सलाम) से पूछा कि वो छोटा लड़का कौन था और इमाम जैनुल आबेदीन (अलैहिस्सलाम) ने कहा कि वो मेरा बेटा और इमामत का वारिस  और उसका नाम मोहम्मद बाकिर है ये सुनकर, जाबिर (राजी0) उठे और  इमाम को चूमा और कहा “रसूलल्लाह ﷺ  के बेटे, क्या मैं तुम्हारे लिए रसूल अल्लाह ﷺ का सलाम लाया हु कुबूल करो। उन्होंने मुझे इसे तुम तक पहुँचाने के लिए कहा है”। इमाम जाफ़र सादिक (अलैहिस्सलाम) कहते हैं कि ये सुनकर मेरे वालिद ज़ारो कतार रो पड़े और कहा “जाबिर (राजी0) मेरे दादा को मेरा सलाम है जब तक ये आसमान और जमीन बाकी रहे।, आपने मेरे दादा का सलाम मुझे पहुँचाया इसलिए मैं भी आपको अपना सलाम पहुँचाता हूँ*

*12 इमामो के नाम*
(1) इमाम अली इब्ने अबु तालिब (अलयहिस्सलाम)
(2) इमाम हसन इब्ने अली (अलयहिस्सलाम)
(3) इमाम हुसैन इब्ने अली (अलयहिस्सलाम)
(4) इमाम जैन उल आबेदीन इब्ने हुसैन (अलयहिस्सलाम)
(5) इमाम मोहम्मद बाकिर इब्ने जैन उल आबेदीन (अलयहिस्सलाम)
(6) इमाम जफर इब्ने मोहम्मद बाकिर (अलयहिस्सलाम)
(7) इमाम मूसा काजिम इब्ने जफर (अलयहिस्सलाम)
(8) इमाम अली रीजा इब्ने मूसा काजिम (अलयहिस्सलाम)
(9) इमाम मोहम्मद तकी इब्ने अली रीजा (अलयहिस्सलाम)
(10) इमाम अली अल नकी इब्ने मोहम्मद तकी (अलयहिस्सलाम)
(11) इमाम हसन अल असकरी इब्ने अली तकी (अलयहिस्सलाम)
(12) इमाम महदी इब्ने हसन अल असकरी (अलयहिस्सलाम)

अल्लाहुम्मा सल्ले अला सैयेदिना मोहम्मद वा आला आले सैयेदिना मोहम्मद वबारीक वसल्लम,,🙏🏻

इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर (अ.स.)
पाँचवें इमाम – अहलेबैत (अ.स.)

1. परिचय
इमाम मुहम्मद अल-बाक़िर (अ.स.) इस्लाम के महानतम विद्वानों में से एक और अहलेबैत (अ.स.) की इल्मी विरासत के प्रमुख स्तंभ हैं। उन्हें “अल-बाक़िर” कहा गया, जिसका अर्थ है—ज्ञान के गूढ़ रहस्यों को खोलने वाले। आपने ऐसे समय में इस्लामी ज्ञान को पुनर्जीवित किया जब उम्मवी शासन के कारण दीन की वास्तविक शिक्षाएँ धुंधली हो रही थीं।

2. जन्म और वंश
पूरा नाम: मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन (अ.स.)
कुनियत: अबू जाफ़र
जन्म: 1 रजब 57 हिजरी, मदीना
पिता: इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (अ.स.)
माता: फ़ातिमा बिन्ते इमाम हसन (अ.स.)
इमाम बाक़िर (अ.स.) एकमात्र ऐसे इमाम हैं जो इमाम हसन (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.)—दोनों की नस्ल से हैं। यह उन्हें विशेष आध्यात्मिक और ऐतिहासिक स्थान प्रदान करता है।

3. बचपन और करबला से संबंध
इमाम बाक़िर (अ.स.) करबला की त्रासदी के प्रत्यक्ष साक्षी थे। उस समय उनकी आयु लगभग 4 वर्ष थी।
आपने इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत
अहलेबैत की क़ैद
और यज़ीदी अत्याचार
को अपनी आँखों से देखा।
इस अनुभव ने उनके व्यक्तित्व में गंभीरता, धैर्य और सत्य के लिए अडिगता भर दी।

4. इमामत का दौर
इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स.) की शहादत के बाद 95 हिजरी में इमाम बाक़िर (अ.स.) इमाम बने।
उनका इमामत काल लगभग 19 वर्ष रहा।
यह दौर उम्मवी हुकूमत की आंतरिक लड़ाइयों और कमजोरी का समय था। इमाम (अ.स.) ने इस स्थिति का उपयोग इल्मी और वैचारिक पुनर्निर्माण के लिए किया, न कि सशस्त्र विद्रोह के लिए।

5. इल्मी क्रांति और योगदान
इमाम बाक़िर (अ.स.) को इस्लामी ज्ञान की अकादमिक नींव रखने वाला कहा जाता है।
प्रमुख योगदान:
क़ुरआन की तफ़सीर को व्यवस्थित रूप दिया
हदीस को राजनीतिक मिलावट से अलग किया
फ़िक़्ह-ए-अहलेबैत को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया
अक़ीदा, तौहीद, नबूवत और इमामत पर गहन शिक्षाएँ दीं
उनके विद्यार्थियों में शामिल थे:
ज़ुरारा बिन अ‘यन
मुहम्मद बिन मुस्लिम
अबू बसीर
जाबिर बिन यज़ीद अल-जुफ़ी
इन्हीं की बदौलत बाद में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) का महान इल्मी दौर संभव हो सका।

6. अख़लाक़ और इबादत
इमाम बाक़िर (अ.स.) उच्च कोटि के इंसान-ए-कामिल थे।
अत्यंत विनम्र और धैर्यशील
रातों को लंबी इबादत
ग़रीबों की गुप्त सहायता
विरोधियों से भी उच्च नैतिक व्यवहार
कहा जाता है कि वे स्वयं खेतों में काम करते थे और कहते थे:
“मैं अल्लाह की इताअत में रोज़ी कमाना पसंद करता हूँ।”

7. उम्मवी शासकों से टकराव
उम्मवी ख़लीफ़ा हिशाम बिन अब्दुल मलिक इमाम (अ.स.) की लोकप्रियता और इल्मी प्रभाव से भयभीत था।
इमाम को बार-बार दरबार में बुलाकर अपमानित करने की कोशिश की
लेकिन हर बार इमाम (अ.स.) ने ज्ञान और गरिमा से उसे पराजित किया

8. शहादत
शहादत: 7 ज़िलहिज्जा 114 हिजरी
तरीक़ा: ज़हर देकर
स्थान: मदीना
मज़ार: जन्नतुल बक़ी (इमाम हसन, इमाम सज्जाद और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) के साथ)