कुरआनी उसूल: जब उम्मत हक़ से रुख मोड़ती है तो आज़ाब आता है

🌩️ 1️⃣ कुरआनी उसूल: जब उम्मत हक़ से रुख मोड़ती है तो आज़ाब आता है

📖 क़ुरआन कहता है:

> وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ وَأَنتَ فِيهِمْ ۚ وَمَا كَانَ اللَّهُ مُعَذِّبَهُمْ وَهُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
(सूरा अल-अनफ़ाल, 8:33)

“अल्लाह उन्हें अज़ाब नहीं देगा जब तक तुम (ऐ रसूल) उनके दरम्यान मौजूद हो, और जब तक वो इस्तिग़फ़ार करते हैं।”



🕊️ यानी जब उम्मत रसूलुल्लाह ﷺ और उनके घराने से वफ़ा करती है, तो रहमतें बरक़रार रहती हैं,
लेकिन जब उनसे बुग़्ज़ और दुश्मनी करती है — तो रहमत हट जाती है, और मुसिबतें आना शुरू हो जाती हैं।




🌙 2️⃣ अहलेबैत से दुश्मनी पर हदीसें

📜 रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

> “अली से दुश्मनी मत रखना, वरना तुम तबाह हो जाओगे।”
(हदीस — तबरानी, मोज़मुल औसत)



और एक दूसरी रिवायत में:

> “ऐ अली, तुझसे मोहब्बत सिर्फ मोमिन करेगा, और तुझसे बुग़्ज़ सिर्फ मुनाफ़िक रखेगा।”
(सहीह मुस्लिम, हदीस 78)



📖 यानी जो लोग मौला अली और अहलेबैत से बुग़्ज़ रखते हैं,
वो इमान से दूर और अज़ाब के हक़दार बनते हैं।




⚡ 3️⃣ रूहानी असर: बरकतों का उठ जाना

इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम से रिवायत है:

> “जब लोग अहलेबैत से मोहब्बत छोड़ देंगे, तो अल्लाह उनकी जमीन से बरकतें उठाएगा,
बारिश का फायदा कम होगा, और मुसीबतें बढ़ जाएंगी।”
📚 (बिहारुल अनवार, जि. 52, स. 258)






🌧️ 4️⃣ नतीजा (सारांश):

हाँ —
अहलेबैत से बुग़्ज़ इस उम्मत की रूहानी तबाही की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।
उसका असर सिर्फ क़ियामत में नहीं,
बल्कि दुनिया में भी —
मौसमी बे-रहमी, बरकतों का उठ जाना, बे-इत्तेफ़ाक़ी, और फ़ितनों की शक्ल में ज़ाहिर होता है।

Leave a comment