
*जंग-ए-सिफ़्फ़ीन – हक़ और बातिल का टकराव*
जंग-ए-सिफ़्फ़ीन इस्लामी तारीख़ की वो जंग है जिसने उम्मत-ए-मुसलिमा को दो हिस्सों में बाँट दिया। ये जंग 37 हिजरी (सन् 657 ई.) में हज़रत अली अलैहिस्सलाम और मुआविया इब्ने अबी सुफ़ियान के दरमियान हुई। हकीकत में ये जंग हुकूमत की हवस, नस्लपरस्ती, और बुग़्ज़-ए-अहले-बैत का नतीजा थी।
*पस-ए-मंज़र:*
हज़रत उस्मान बिन अफ़्फान के क़त्ल के बाद मुसलमानों ने इत्तेफ़ाक़ से हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बैअत की (हवाला: तारीख़-ए-तबरी, जिल्द 4, सफ़ा 427; अल-कामिल इब्ने असीर, जिल्द 3, सफ़ा 220).
लेकिन मुआविया, जो उस वक्त शाम का गवर्नर था, बैअत से इंकार कर बैठा। उसने बहाना बनाया कि “पहले उस्मान के क़ातिलों से इंसाफ़ करो”, जबकि असल में वो ख़िलाफ़त हासिल करने की साज़िश में था।
इब्ने असीर लिखते हैं:
*“मुआविया ने उस्मान के क़ातिलों का बहाना बना कर अपनी गवर्नरी बचाने और हुकूमत पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की।”*
(अल-कामिल फ़ी तारीख़, जिल्द 3, सफ़ा 226)
*मुआविया का बुग़्ज़ और लालच:*
मुआविया और उसके बाप अबू सुफ़ियान इस्लाम के पुराने दुश्मन थे। अबू सुफ़ियान वही था जिसने बद्र, उहुद, और अहज़ाब में इस्लाम के ख़िलाफ़ जंगें लड़ीं। इस्लाम के बाद भी उनके दिलों में अहले बैत के लिए नफरत बाक़ी रही।
इमाम इब्ने अबिल हदीद (शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 1, सफ़ा 159) लिखते हैं:
*“बनू उमय्या का बुग़्ज़ रसूलुल्लाह ﷺ और अहले बैत के खिलाफ़ दिलों में हमेशा रहा, और मुआविया ने उसी अदावत की बुनियाद पर अली अलैहिस्सलाम से जंग की।”*
*अली अलैहिस्सलाम की हिकमत:*
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कई बार मुआविया को खत लिखे और कहा:
*“तू उस्मान के क़ातिलों का बहाना बना रहा है, मगर हक़ में तेरा कोई हिस्सा नहीं। तू गवर्नर था, और उस्मान की मदद तुझ पर वाजिब थी, जो तूने नहीं की।”*
(नहजुल बलाग़ा, ख़त 6, ख़त 14, ख़त 54)
मगर मुआविया ने ये बातें सुनने से इंकार किया। वो शाम में बैठकर अपने क़बीले वालों से हुकूमत की तलब में मदद मांगता रहा।
*जंग का आग़ाज़:*
जब तमाम कोशिशें नाकाम हुईं, तो सिफ़्फ़ीन (जो आज के इराक़ और शाम की सरहद पर है) में दोनों फौजें आमने-सामने हुईं।
अली अलैहिस्सलाम की फौज में सहाबा-ए-किराम जैसे अम्मार बिन यासिर, मालिक अश्तर, खुज़ैमा ज़ुल-शहादतैन, अबू अयू़ब अंसारी और बहुत से मुहाजरीन-अंसार मौजूद थे।
मुआविया की तरफ़ ज़्यादातर शामी और बनू उमय्या के लोग थे – न तो सहाबा, न तबी’ईन।
इब्ने कसीर (जो सुन्नी आलिम हैं) भी मानते हैं:
*“हज़रत अली की फौज में रसूलुल्लाह के साथ रहने वाले सहाबा थे, जबकि मुआविया की फौज में ऐसा कोई नहीं था।”*
(अल-बिदाया वन् निहाया, जिल्द 7, सफ़ा 241)
*अम्मार बिन यासिर की शहादत:*
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया था:
*“अम्मार को बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा, जो जहन्नम की तरफ बुलाने वाला होगा।”*
(बुख़ारी हदीस 2812)
*क़ुरआन को नुकीलों पर उठाना:*
जब मुआविया की हार तय हो गई तो उसने अम्र इब्ने आस के मशवरे पर क़ुरआन को नेजो पर बाँध दिए।
ये धोखा था ताकि लोग रुक जाएँ और हक़ की फतह अधूरी रह जाए।
इब्ने अबिल हदीद लिखते हैं:
*“मुआविया ने क़ुरआन को हथियार बनाया ताकि तलवार से हारने के बाद चालाकी से जीत सके।”*
(शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 2, सफ़ा 327)
*हुकूमत की हवस और बग़ावत का हुक्म:*
सुन्नी इस्लाम में खलीफा राशिद मौला अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ़ तलवार उठाना खुली बग़ावत है।
कुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
*“अगर मोमिनों के दो गिरोह लड़ पड़ें, तो उनके दरमियान सुलह कराओ। लेकिन अगर उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़ुल्म करे, तो जो ज़ालिम है उससे लड़ो, यहाँ तक कि वो हुक्म-ए-ख़ुदा की तरफ़ लौट आए।”*
(सूरह अल-हुजुरात, आयत 9)
इस आयत की तफ़्सीर में इमाम फख़रुद्दीन राज़ी लिखते हैं:
*“इस आयत के मुताबिक़ जो गिरोह अली के खिलाफ़ लड़ा, वो ‘बाग़ी’ था।”*
(तफ़्सीर कबीर, जिल्द 6, सफ़ा 491)
नतीजा:
जंग-ए-सिफ़्फ़ीन का अंजाम ये हुआ कि हक़ की जंग को मुआविया ने फरेब से रोका, मगर वो अली अलैहिस्सलाम की हिकमत और इमानदारी का मुकाबला न कर सका।
उसका मकसद न उस्मान का इंसाफ़ था, न उम्मत की भलाई — बल्कि ख़ालिस तख़्त व ताज की हवस थी।
ख़ुलासा:
मुआविया इब्ने अबी सुफ़ियान ने अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ़ बग़ावत की, जो शरीअत में हराम है।
उसके साथ कोई बड़े सहाबी न थे — सब शामी या उमय्यद लोग थे।
अली अलैहिस्सलाम के साथ हक़ था, जैसा कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
*“अल अलीयो म’अल हक़ वल हक़्क़ो म’अल अली।”*
अली हक़ के साथ हैं और हक़ अली के साथ
*अम्मार बिन यासिर की शहादत ने साबित कर दिया कि मुआविया की फौज ही बाग़ी गिरोह थी।*
*मुआविया की हुकूमत की तलब ने बाद में उमय्यद मलकियत की बुनियाद रखी – जो इस्लामी शूरा-ए-ख़िलाफ़त के नक़्शे को मिटाने वाला निज़ाम साबित हुआ।*
(शेयर ज़रूर करें तमाम मवाली ए हैदर ए क़रार अलैहिस्सलाम को)

