नबी करीम ﷺ ने नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज — इन सब इबादात पर ज़रूर ज़ोर दिया, क्योंकि ये इस्लाम के अरकान हैं। मगर साथ ही अहलेबैत अलैहिस्सलाम की मुहब्बत को भी दीनी बुनियाद और निजात का जरिया करार दिया।
📜 कुरआन की आयत:
> قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ “कह दो (ऐ नबी), मैं तुमसे अपनी रिसालत का कोई अज्र (इनाम) नहीं मांगता सिवाए इस के कि तुम मेरे क़रीबी रिश्तेदारों से मोहब्बत करो।” 📖 (सूरा शूरा 42:23)
📜 हदीस ए रसूल ﷺ:
1. हदीस-ए-सक़लैन:
> “मैं तुम में दो भारी चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूँ, एक कुरआन और दूसरी मेरी इतरत (अहलेबैत), जब तक इन दोनों से वाबस्ता रहोगे, कभी गुमराह नहीं होगे।”
2. हदीस:
> “अली से मोहब्बत सिर्फ मोमिन करता है और अली से अदावत सिर्फ मुनाफ़िक़ करता है।” 📖 (सहीह मुस्लिम)
3. हदीस:
> “जिसने अली को गाली दी, उसने मुझे गाली दी, और जिसने मुझे गाली दी उसने अल्लाह को गाली दी।” 📖 (मुसनद अहमद बिन हम्बल, जिल्द 6, पेज 323
📌 नतीजा:
रसूलुल्लाह ﷺ ने नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज — सबकी अहमियत बताई, मगर अहलेबैत की मोहब्बत को ईमान की अलामत, निजात की शर्त, और हिदायत का रास्ता बताया। इसलिए कहा जा सकता है:
> “नबी ﷺ ने अहलेबैत की मोहब्बत पर जितना जोर दिया, वो महज़ एक रिश्ते की मोहब्बत नहीं थी, बल्कि वो दीनी निजात और हिदायत का रास्ता है।”
आज उम्मत मुसलमान तो सब हैं, नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात सब अदा कर रहे हैं, मगर…
> जहाँ अहलेबैत अ.स. का नाम लिया जाए — वहीं फिरका, मसलक, तौहीन, राफ़ज़ी, काफिर जैसे फतवे सामने आने लगते हैं
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🔥 अफ़सोस की हालत:
नबी ﷺ के घराने का नाम लिया जाए तो कुछ लोग कहते हैं: “ये शिया लोग हैं, राफ़ज़ी हैं, बिदअत कर रहे हैं।”
या अली, या हुसैन कहना — उनके लिए गुनाह बन गया है।
कर्बला का ज़िक्र — इबादत नहीं, बल्कि “फिरकावाराना जलसा” समझ लिया गया है।
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📌 जबकि हक़ ये है:
1. अहलेबैत की मोहब्बत हर मुसलमान पर फर्ज़ है:
> “قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ” “मैं तुमसे अपनी रिसालत की कोई मजदूरी नहीं चाहता, सिवाय इसके कि मेरे क़रीबों से मोहब्बत करो।” 📖 (सूरा शूरा 42:23)
2. हदीस ए सक़लैन से भी साबित:
> “मैं दो भारी चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ — क़ुरआन और मेरी अहलेबैत, जब तक इनसे वाबस्ता रहोगे गुमराह न होगे।”
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💔 तो फिर ये हालत क्यों?
क्योंकि कई मसलक अहलेबैत की मोहब्बत को सिर्फ़ “शिया पहचान” मानते हैं, इस्लामी फर्ज़ नहीं।
राजनीति, दुश्मनी, और गुमराही ने अहलेबैत के ज़िक्र को भी तक्सीम कर दिया।
मुहब्बत का मामला भी फिरका बन गया।
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✅ हकीकत ये है:
> हर वो मुसलमान जो रसूल ﷺ से मोहब्बत करता है — वो अहलेबैत से मोहब्बत किये बिना सच्चा आशिक नहीं हो सकता।
इमाम शाफ़ई (सुन्नी इमाम) का शेर भी गवाह है:
> إن كان رفضًا حب آل محمدٍ فليشهد الثقلان أني رافضي
> अगर अहले मुहम्मद से मोहब्बत राफ़ज़ियत है, तो दो जहाँ गवाही दें कि मैं राफ़ज़ी हूँ।
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🔚 आख़िर में:
आपका जुमला पूरी उम्मत के लिए एक आईना है:
> “आज हर कोई नमाज़ रोज़ा कर रहा है, मगर अहलेबैत का नाम लिया जाए तो फतवे दिए जा रहे हैं — ये कैसी उम्मत है?”
✅ 1. सूरा शूरा (42:23) – मुहब्बत-ए-अहलेबैत फ़र्ज़
> قُلْ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ “(ऐ नबी ﷺ कह दो) मैं तुमसे अपनी रिसालत का कोई बदला नहीं चाहता, सिवाय इसके कि तुम मेरे क़रीबी रिश्तेदारों से मोहब्बत करो।” 📖 सूरा अश-शूरा 42:23
🔹 इस आयत की तफ्सीर में इमाम फख़रुद्दीन राज़ी, इब्न अब्बास, इमाम शाफ़ई, इब्ने हजर अस्कलानी जैसे बडे मफ़्सिरीन लिखते हैं कि:
> “क़ुरबा” से मुराद अहलेबैत हैं — यानी अली, फातिमा, हसन, हुसैन।
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✅ 2. सूरा अल-अहज़ाब (33:33) – तहारत-ए-अहलेबैत
> إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ ٱلرِّجْسَ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا “अल्लाह तो यही चाहता है कि ऐ अहलेबैत! तुमसे हर किस्म की गन्दगी को दूर रखे और तुम्हें पूरी तरह पाक व पाकीज़ा कर दे।” 📖 सूरा अल-अहज़ाब 33:33
🔹 ये आयते तातहीर कहलाती है। इस आयत में रसूलुल्लाह ﷺ ने चादर के नीचे हज़रत अली, हज़रत फ़ातिमा, इमाम हसन, इमाम हुसैन को लेकर यह आयत पढ़ी और दुआ की।
📚 हदीस के हवाले:
सहीह मुस्लिम, किताब फज़ाइलुस्सहाबा
मुस्नद अहमद, हदीस-24305
तफ़्सीर इब्न कसीर, सूरा अहज़ाब के तहत
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✅ 3. सूरा दाहर / इंसान (76:8-9) – इमाम अली व सय्यदा फ़ातिमा स. की इनफाक़
> “और वो लोग अल्लाह की मुहब्बत में मिस्कीन, यतीम और कैदी को खाना खिलाते हैं। (और कहते हैं) हम तुम्हें सिर्फ अल्लाह के लिए खिलाते हैं, न कोई बदला चाहते हैं, न शुक्रिया।” 📖 सूरा दाहर / सूरा इंसान 76:8-9
🔹 इस आयत के शाने-नुज़ूल में दर्जनों तफ़सीरें (तफ़्सीर दुरी मंसूर, कश्शाफ, इब्ने कसीर, इब्ने जरीर, आदि) बताती हैं कि ये आयत:
> अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम (अली, फ़ातिमा, हसन, हुसैन) के बारे में नाज़िल हुई, जब उन्होंने तीन दिन तक रोज़ा रख कर अपना इफ्तार गरीबों को दे दिया।
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📌 नतीजा:
कुरआन में:
1. मुहब्बत-ए-अहलेबैत को फ़र्ज़ करार दिया गया (42:23)
Main ilm ka Sheher Hoon, Aur Ali Alehissalam us ka Darwaza Hai,
Tasawwuf ke Roshni me, *Ana Madinat-ul-ilm Wa Ali’un Babu’ha*
ilm se Murad – Hidayat se Talluq hai, Aur Haqeeqat e Hidayat Marifat e ilaahi hai, Aur Haqiqi ilm e Hidayat hai *La ilaha illallah* Aur iski Marifat hai *Muhammadur Rasulullahe ﷺ* Aur iski Tariqat hai *Moula Ali Alehissalam* Aur iski Shariyat hai, *Imam Hasan/ Hussain Alehissalam*
Yani Shahr ki Buniyaad, *La ilaha illallahu, Jo ilm e Haqeeqat hai,* Aur Shahr *Muhammadur Rasulullahe ﷺ,* Jo ilm e Marifat hai, Aur Shahr ka Darwaza, *Moula Ali Alehissalam* Jo ilm e Tariqat hai, Aur Rasta *Imam Hasan/Hussain Alehissalam hai* Jo ilm e Shariyat hai, Jis Par Chal kar Wilayat e Moula Ali Alehissalam ka Darwaza Haasil Hoti hai, Aur Us Darwaza Se Risalat e Muhammadur Rasulullahe ﷺ ki Sheher Mein Dakhil hota hai, Aur Sheher Risalat e Muhammadur Rasulullahe ﷺ me, Tauheed ka Jalwa Hai,
Yani *Imam Hasan/Hussain Alehissalam ki* Ita’at o Pairwi A’mal e Shariyat hai, *Moul Ali Alehissalam ki* ita’at o Pairwi A’mal e Tariqat hai, *Muhammadur Rasulullahe ﷺ ki* ita’at o Pairwi A’mal e Marifat hai, Aur *La ilaha illallahu* A’mal e Haqeeqat hai,
Yani Jo Shakhs *Imam Hasan/Hussain Alehissalam* Ki Tajim o Mohabbat Aur Ita’at o Pairwi Ka Munkar hai, Wo Shakhs Gumrah Shaitaan ki Manind Hai,