
मक्की सेना की तायदाद
शुरू में मक्की सेना की तायदाद तेरह सौ थी, जिनके पास एक सौ घोड़े और छः सौ कवच थे। ऊंट बहुत ज़्यादा थे, जिनकी ठीक-ठीक तायदाद न मालूम हो सकी। सेना का सेनापति अबू जहल बिन हिशाम था। कुरैश के नौ बड़े आदमी उसकी रसद के ज़िम्मेदार थे। एक दिन नौ और एक दिन दस ऊंट ज़िब्ह किए जाते थे।
बनू बक्र क़बीले की समस्या
जब मक्की सेना चलने के लिए तैयार हुई, तो कुरैश को याद आया कि बनू बक्र के क़बीले से उनकी दुश्मनी और लड़ाई चल रही है, इसलिए उन्हें खतरा महसूस हुआ कि कहीं ये क़बीले पीछे से हमला न कर दें और इस तरह वे दो आग के बीच में न पड़ जाएं।
क़रीब था कि यह विचार उनको लड़ाई के इरादे से रोक दे, लेकिन ठीक उसी वक़्त इब्लीस बनू किनाना के सरदार सुराक़ा बिन मालिक बिन जासम मुदलजी के रूप में प्रकट हुआ और बोला, मैं भी तुम्हारा साथी हूं और इस बात की ज़मानत देता हूं कि बनू किनाना तुम्हारे पीछे कोई अप्रिय काम न करेंगे।
मक्की सेना की रवानगी
इस गारंटी के बाद मक्का वाले अपने घरों से निकल पड़े और जैसा कि इर्शाद है—’इतराते हुए, लोगों को अपनी शान दिखाते हुए और अल्लाह की राह से रोकते हुए’ मदीना की ओर चल पड़े, जैसा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है—
‘अपने धार और हथियार लेकर, अल्लाह से खार खाते हुए और उसके रसूल सल्ल० से खार खाते हुए, बदले की भावना से चूर और जोश और गुस्से से भरपूर, इस पर किचकिचाते हुए कि अल्लाह के रसूल सल्ल० और आपकेसहाबा रज़ि० ने मक्के वालों के काफ़िलों पर आंख उठाने की जुर्रात कैसे की।’ बहरहाल ये लोग बड़ी तेज़ रफ़्तारी से उत्तर के रुख पर बद्र की ओर चले जा रहे थे कि उस्फ़ान घाटी और कुदैद से गुज़र कर जोहफ़ा पहुंचे तो अबू सुफ़ियान का एक नया पैग़ाम मिला, जिसमें कहा गया था कि आप लोग अपने क़ाफ़िले, अपने आदमियों और अपने मालों की हिफ़ाज़त की ग़रज़ से निकले हैं और चूंकि अल्लाह ने इन सबको बचा लिया है, इसलिए अब वापस पलट जाइए ।
क़ाफ़िला बच निकला
अबू सुफ़ियान के बच निकलने की तफ्सील यह है कि वह शाम से कारवां चलते रहने वाले राजमार्ग पर चला तो आ रहा था, लेकिन बराबर चौकन्ना था और बेदार था। उसने सूचना प्राप्त करने की अपनी कोशिशें दो गुनी कर दी थीं ।
जब वह बद्र के क़रीब पहुंचा तो खुद क़ाफ़िले से आगे जाकर मज्दी बिन अम्र से भेंट की और उससे मदीना की सेना के बारे में मालूम किया।
मज्दी ने कहा, मैंने हमेशा के खिलाफ कोई आदमी तो नहीं देखा, अलबत्ता दो सवार देखे, जिन्होंने टीले के पास अपने जानवर बिठाए, फिर अपनी मश्कों में पानी भरकर चले गए।
अबू सुफ़ियान लपक कर वहां पहुंचा और उनके ऊंट की मेंगनियां उठा कर तोड़ी, तो उसमें खजूर की गुठली निकली। अबू सुफ़ियान ने कहा, ख़ुदा की क़सम ! यह यसरिब का चारा है।
इसके बाद वह तेज़ी से क़ाफ़िले की ओर पलटा और उसे पश्चिम की ओर मोड़ कर उसका रुख तट की ओर कर दिया और बद्र से गुज़रने वाले राजमार्ग को बाएं हाथ पर छोड़ दिया। इस तरह क़ाफ़िले को मदनी फ़ौज के क़ब्ज़े में जाने से बचा लिया और तुरन्त ही मक्की सेना को अपने बच निकलने की सूचना देतें हुए उसे वापस जाने का सन्देश दिया, जो उसे जोहफ़ा में मिल गया।
मक्की सेना का वापसी का इरादा और आपसी फूट
यह सन्देश पाकर मक्की सेना ने चाहा कि वापस चली जाए, लेकिन कुरैश का सबसे बड़ा उद्दंड व्यक्ति अबू जहल खड़ा हो गया और बड़े ही घमंड के साथ बोला-
‘खुदा की क़सम ! हम वापस न होंगे, यहां तक कि बद्र जाकर वहां तीन दिन
ठहरेंगे और इस बीच ऊंट ज़िब्ह करेंगे, लोगों को खाना खिलाएंगे और शराब पिलाएंगे, लौडियां हमारे लिए गाना गाएंगी और सारा अरब हमारे जमा होने और खाने-पीने और गाने-बजाने का हाल सुनेगा और इस तरह हमेशा के लिए उन पर हमारी धाक बैठ जाएगी।’
लेकिन अबू जहल के इस कहने के बावजूद अखनस बिन शुरैक ने यही मश्विरा दिया कि वापस चले चलो, मगर लोगों ने उसकी बात न मानी, इसलिए वह बनू जोहरा के लोगों को साथ लेकर वापस हो गया, क्योंकि वह बनू जोहरा का मित्र और इस सेना में उनका सरदार था। बनू जोहरा की कुल तायदाद कोई तीन सौ थी। उनका कोई भी आदमी बद्र की लड़ाई में हाज़िर न हुआ।
बाद में बनू जोहरा अखनस निब शुरैक़ की राय पर बड़े खुश थे और उनके भीतर उसका मान-सम्मान हमेशा बाक़ी रहा।
बनू जोहरा के अलावा बनू हाशिम ने भी चाहा कि वापस चले जाएं, लेकिन अबू जहल ने बड़ी सख्ती की और कहा कि जब तक हम वापस न हों, यह गिरोह हमसे अलग न होने पाए।
तात्पर्य यह कि सेना ने अपना सफ़र जारी रखा। बनू ज़ोहरा की वापसी के बाद अब उसकी तायदाद एक हजार रह गई थी और उसका रुख बद्र की ओर था। बद्र के क़रीब पहुंच कर उसने एक टीले के पीछे पड़ाव डाला। यह टीला बद्र की घाटी की सीमाओं पर दक्षिणी मुहाने के पास स्थित है।
इस्लामी सेना के लिए हालात की नज़ाकत
इधर मदीने के सूचना- सूत्रों ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को, जबकि अभी आप रास्ते ही में थे और ज़फ़रान घाटी से गुज़र रहे थे, क़ाफ़िले और सेना दोनों के बारे में सूचनाएं जुटाई। आपने इन सूचनाओं का गहराई से जायजा लेने के बाद यक़ीन कर लिया कि अब एक खूनी टकराव का वक़्त आ गया है और ऐसा क़दम उठाना ज़रूरी हो गया है जिसमें हिम्मत हो, हौसला हो, उमंग हो और सत्य के लिए लड़ने-मरने का जज्बा हो, तभी कामियाबी हाथ लग सकेगी।
क्योंकि यह बात क़तई थी कि अगर मक्की सेना को इस इलाक़े में यों ही दनदनाता हुआ फिरने दिया जाता, तो इससे कुरैश की फ़ौजी साख को बड़ी ताक़त पहुंच जाती और उनकी सियासी जीत का दायरा दूर तक फैल जाता, मुसलमानों की आवाज़ दबकर कमज़ोर हो जाती और उसके बाद इस्लामी दावत को एक बे-रूह ढांचा समझकर इस इलाक़े का हर व्यक्ति, जो अपने सीने में इस्लाम के खिलाफ़ कीना और दुश्मनी रखता था, शरारत पर उतर आता ।
फिर इन सब बातों के अलावा आखिर इसकी क्या गारंटी थी कि मक्के की सेना मदीना की ओर आगे नहीं बढ़ेगी और इस लड़ाई को मदीने की चारदीवारी तक पहुंचा कर मुसलमानों को उनके घरों में घुसकर तबाह करने की जुर्रत और कोशिश नहीं करेगी ? जी हां, अगर मदीना की फ़ौज की ओर से ज़रा भी ढील दी जाती, तो वह सब कुछ संभव था और ऐसा न भी होता तो मुसलमानों के रौब और दबदबे पर बहरहाल इसका बहुत बुरा असर पड़ता ।

