
कुरआन-ए-पाक में अहलेबैत (अलैहिमुस्सलाम) की मुवद्दत (मुहब्बत) को फर्ज (वाजिब) करार दिया गया है — और ये हुक्म हर मुसलमान के लिए है, चाहे वो किसी भी मसलक से हो: शिया, सुन्नी या देवबन्दी या कोई और।
📖 कुरआन से दलील:
सूरा अश-शूरा (42), आयत 23:
> ذَٰلِكَ ٱلَّذِى يُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۗ قُل لَّآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا ٱلْمَوَدَّةَ فِى ٱلْقُرْبَىٰ ۗ
“(ऐ रसूल!) कह दीजिए कि मैं इस (रसालत) के बदले तुमसे कोई अज्र नहीं माँगता सिवाय अपने ‘क़ुरबा’ (नज़दीकी रिश्तेदारों) की मुहब्बत के।”
— (सूरा शूरा 42:23)
💠 तफ़्सीर के मुताबिक “क़ुरबा” कौन हैं?
इमाम रज़ा (अ) और दूसरे इमामों से रिवायत है कि “क़ुरबा” से मुराद अहलेबैत अ.स. हैं — यानी:
हज़रत अली (अ), सैय्यदा फ़ातिमा (स), इमाम हसन (अ), इमाम हुसैन (अ) और इनकी औलाद।
अहले सुन्नत के बड़े मुफस्सिरीन ने भी इस आयत में “क़ुरबा” से मुराद अहलेबैत लिया है:
✍️ सुन्नी तफसीर व हवालात:
1. तफ़्सीर दुर्रे मंसूर (इमाम जलालुद्दीन सुयूती):
कई सहाबा जैसे अब्दुल्लाह इब्न अब्बास से रिवायत है कि इस आयत में क़ुरबा से मुराद हैं:
> “अली, फातिमा, हसन और हुसैन (अलैहिमुस्सलाम)।”
2. सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम में मौजूद हदीस-ए-किसा (कंबल वाली हदीस) — जिसमें रसूल अल्लाह (ﷺ) ने इन्हें अहलेबैत करार दिया और इन पर दुआ की।
3. इमाम शाफ़ई (सुन्नी फिक्ह के बानी) कहते हैं:
> “إذا كان رفض حب آل محمدٍ، فليشهد الثقلان أنّي رافضي”
“अगर मोहब्बत-ए-आले-मुहम्मद को राफ़िज़ियत कहते हैं, तो दोनों आलम गवाह रहें कि मैं राफ़िज़ी हूँ।”
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📌 नतीजा:
ये कुरआनी हुक्म है कि रसूल ﷺ के क़ुरबा / अहलेबैत से मोहब्बत करना फर्ज़ है।
इसमें कोई मसलकी इख्तिलाफ नहीं — तमाम शिया, सुन्नी व सूफ़ी उलमा इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि मोहब्बत-ए-अहलेबैत वाजिब है।
यह मोहब्बत सिर्फ ज़बानी नहीं, बल्कि उनकी पैरवी और इज़्ज़त के साथ होनी चाहिए।

