Yaum e Wiladat of Imam Ali Reza

🌹 *यौमे विलादत हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम मुबारक (11 ज़िलक़द 148 हिजरी)*

  इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के बहुत अलक़ाब (उपाधियां) हैं जिनमें सबसे प्रसिद्ध रज़ा है जिसका अर्थ है राज़ी व प्रसन्न रहने वाला। इस उपाधि का बहुत बड़ा कारण यह है कि इमाम अलैहिस्सलाम ख़ुदा की हर इच्छा पर प्रसन्न रहते थे और इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के साथी एवं अनुयाई भी आप से प्रसन्न रहते थे और इमाम के दुश्मन उनकी अप्रसन्नता का कोई कारण नहीं ढूंढ पाते थे।

  इसी प्रकार इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का एक लक़ब (उपाधि) ग़रीब भी है जिसका अर्थ है अपने देश से दूर। क्योंकि इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम को अब्बासी शासक मामून रशीद ने विवश करके उनकी मातृभूमि मदीना से अपनी सरकार की राजधानी मर्व (मशहद) बुलाया था और वहीं पर उन्हें शहीद कर दिया था।

  अत्याचारी शासक मामून रशीद यह सोचता था कि जब वह इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी बना देगा तो इस प्रकार वह अपनी अवैध सरकार के विरुद्ध पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत (पवित्र परिजनों) के चाहने वालों के आंदोलन को रोक सकेगा और साथ ही वह इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम पर पूर्ण निगरानी रख सकेगा और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह अपनी अवैध सरकार को वैध दर्शा सकेगा परंतु इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अपनी दूरगामी सोच से इस ख़तरे को इस्लाम को जीवित करने और मुसलमानों के मार्गदर्शन के अवसर में परिवर्तित कर दिया।

  इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम जब अपने पैतृक नगर मदीना से ख़ुरासान के मर्व नगर के लिए रवाना होने वाले थे तब वे इस प्रकार मदीना से निकले कि लगभग समस्त लोग इस बात से अवगत हो गये कि इमाम विवशतः मदीना छोड़कर मर्व (ईरान) जा रहे हैं। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम जब पवित्र नगर मदीना छोड़ रहे थे तब उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पावन समाधि पर इस प्रकार विलाप किया और दुआ की जिससे वहां मौजूद लोगों ने समझ लिया कि यह उनके जीवन की अंतिम यात्रा है और इसके बाद फिर कभी वे पवित्र नगर मदीना लौटकर नहीं आयेंगे। इसी तरह इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने उस समय तक उत्तराधिकारी के पद को स्वीकार नहीं किया जब तक उन्हें जान से मार देने की धमकी नहीं दी गयी। जब इमाम को उत्तराधिकारी बनने का प्रस्ताव दिया गया तो उन्होंने पहले तो उसे स्वीकार नहीं किया और जब स्वीकार करने के लिए बार बार कहा गया तो उन्होंने स्वीकार न करने पर इतना आग्रह किया कि सब लोग इस बात को समझ गये कि मामून रशीद उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने पर आग्रह कर रहा है। काफ़ी आग्रह के बाद इमाम ने कुछ शर्तों के साथ मामून रशीद का उत्तराधिकारी बनना स्वीकार कर लिया। इमाम ने इसके लिए एक शर्त यह रखी कि सरकारी पद पर किसी को रखने और उसे बर्ख़ास्त करने, युद्ध का आदेश देने और शांति जैसे किसी भी मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इस प्रकार जब इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने मामून रशीद का उत्तराधिकारी बनना स्वीकार कर लिया तब भी मामून अपने अवैध कार्यों का औचित्य नहीं दर्शा सकता था।

  इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का यह व्यवहार न केवल इस बात का कारण बना कि मामून की चालों व षडयंत्रों पर पानी फिर जाये बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत (पवित्र परिजनों) और उनके अनुयाइयों के लिए वह अवसर उत्पन्न हो गया जो उससे पहले नहीं था। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम द्वारा मामून का उत्तराधिकारी बन जाने से पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत (पवित्र परिजनों) के चाहने वालों का मनोबल ऊंचा हो गया और उन पर डाले गये दबावों में कमी हो गयी। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत को सरकारें सदैव ख़तरे के रूप में देखती और उन्हें प्रताड़ित करती थीं परंतु इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के मामून का उत्तराधिकारी बन जाने से सभी स्थानों पर उन्हें अच्छे नामों के साथ याद किया गया और जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत (पवित्र परिजनों) की विशेषताओं एवं उनके सदगुणों से अवगत नहीं थे वे परिचित हो गये और शत्रुओं ने अपनी कमज़ोरी एवं पराजय का आभास कर लिया।

  लोगों की दृष्टि में इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की जो गरिमा व महत्व था मामून रशीद ने उसे ख़त्म करने के लिए एक चाल चली और वह चाल धार्मिक सभाओं एवं शास्त्राथों (मुनाज़रे) का आयोजन था। मामून ऐसे लोगों को मुनाज़रों में आमंत्रित करता था जिससे थोड़ी से भी उम्मीद होती थी कि वह मुनाज़रा (शास्त्रार्थ) में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को हरा देगा। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम इन मुनाज़रों में विभिन्न धर्मों के लोगों को हरा देते थे और दिन- प्रतिदिन इमाम की प्रसिद्धि चारों ओर फैलती जा रही थी। ऐसे समय में मामून को अपनी पराजय और घाटे का आभास हुआ और उसने सोचा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अहलेबैत (पवित्र परिजनों) से मुक़ाबले के लिए मुझे भी वही रास्ता अपनाना होगा जो अतीत के अत्याचारी शासकों ने अपनाया है। यानी इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को शहीद कर देने का। इस प्रकार मामून का उत्तराधिकारी बने हुए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को एक वर्ष का समय ही हुआ था कि उसने एक षडयंत्र रचकर उन्हें शहीद करवा दिया।

  इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम यद्यपि अपनी मातृभूमि से दूर शहीद हुए परंतु ख़ुदा ने उनके पावन अस्तित्व से मार्गदर्शन का जो चिराग़ प्रज्वलित किया था वह कभी भी बुझने वाला नहीं है। इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम ने कथन के रूप में जो अनमोल मोती छोड़े हैं वह बहुत ही मूल्यवान हैं और आज इस लेख में इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के एक कथन की व्याख्या करेंगे जिसमें इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने अच्छे बंदों की पांच विशेषताएं बयान की हैं:

  इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की दृष्टि में अच्छे इंसानों की पहली विशेषता यह है कि जब वे अच्छा कार्य अंजाम देते हैं तो ख़ुश होते हैं। इतिहास में आया है कि एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से कहा कि मैं अपने अमल को गोपनीय रखता हूं और इस बात को पसंद नहीं करता हूं कि कोई उससे अवगत हो परंतु लोग मेरे गोपनीय कार्य को जान जाते हैं और जब मुझे पता चलता है कि लोग मेरे अमल से अवगत हो गये हैं तो यह जानकर मुझे ख़ुशी होती है। इस पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया: इसके तुम्हें दो सवाब (पुण्य) मिलेंगे एक गुप्त रखने का और दूसरे स्पष्ट होने का।

  हां! अगर यह ख़ुशहाली दिखावे के कारण हो तो अमल अकार्य है और यह भी संभव है कि यह अच्छा कार्य कभी भी स्पष्ट न हो परंतु यदि मोमिन की प्रसन्नता का कारण ख़ुदा की प्रसन्नता के कारण है तो प्रसन्नता न तो दिखावा है और न ही अहंकार बल्कि एक आध्यात्मिक स्थिति है जो अच्छा कार्य करने के बाद इंसान में पैदा होती है।

  अच्छे इंसानों की दूसरी विशेषता इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की दृष्टि में यह है कि जब भी उनसे कोई बुरा कार्य हो जाता है तो वे ख़ुदा से क्षमा याचना करते हैं। ख़ुदावंदे करीम पवित्र क़ुरआन में फ़रमाता है: “और जिन लोगों से पाप हो जाते हैं या वे स्वयं पर अत्याचार कर बैठते हैं तो उन्हें अल्लाह की याद आ जाती है और वे अपने पापों के लिए क्षमा याचना करते हैं और अल्लाह के अतिरिक्त कौन है जो पापों को क्षमा करे वे पाप करने पर आग्रह नहीं करते हैं जबकि वे जानते भी हैं।”

  पवित्र क़ुरआन की इस आयत में जो बात कही गयी है उससे स्पष्ट होता है कि भले आदमी से भी पाप हो जाता है और जब वह पाप कर बैठता है तो उसे ख़ुदा की याद आ जाती है और अपने किये हुए पापों से अल्लाह से क्षमा याचना करता है और ख़ुदावंदे करीम के अतिरिक्त कोई भी इंसान के पापों को क्षमा नहीं कर सकता।

  हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के अनुसार भले इंसानों की तीसरी विशेषता यह है कि जब उन्हें कोई नेअमत दी जाती है तो वे ख़ुदा का शुक्र (आभार) करते हैं। वास्तव में ख़ुदा के वास्तविक सच्चे बंदे वे हैं जो ज़बान के अतिरिक्त दिल से भी उसके आभारी होते हैं यानी दिल से वे उसके शुक्रगुज़ार होते हैं और उन्हें इस बात का विश्वास होता है कि उन्हें जो भी नेअमत प्रदान की जाती है वह अल्लाह की ओर से है। जब उन्हें इस बात का विश्वास होता है कि उन्हें जो कुछ प्रदान किया जा रहा है वह अल्लाह की ओर से है तो वे अपनी समस्त शक्ति व संभावना का प्रयोग ख़ुदा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करते हैं जो महान व सर्वसमर्थ ख़ुदा का आभार व्यक्त करने का एक उच्च चरण यह है कि इंसान नेअमतों को केवल ख़ुदावंदे करीम की प्रसन्नता प्राप्त करने के मार्ग में ख़र्च करे। उदाहरण स्वरूप अपने शरीर के अंगों का प्रयोग जिसे ख़ुदा ने ही प्रदान किया है, उसकी उपासना में और पापों से दूरी में करना चाहिये।

  हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की दृष्टि में भले इंसान की चौथी विशेषता यह है कि वह दुनिया की कठिनाईयों पर धैर्य करता है। ख़ुदावंदे करीम पवित्र क़ुरआन में कहता है कि निश्चित रूप से हम तुम सबकी भूख, जानी व माली नुक़सान और कम पैदावार के माध्यम से परीक्षा लेंगे और ऐ पैग़म्बर! आप धैर्य करने वालों को शुभ सूचना दे दीजिये कि जो मुसीबत पड़ने पर कहते हैं कि हम अल्लाह की ओर से हैं और उसी की ओर पलट कर जायेंगे। यह वही लोग हैं जिन पर ख़ुदा की कृपा हुई है और वे सहीह मार्ग पाने वाले हैं।

  हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की दृष्टि में भले लोगों की एक अन्य विशेषता यह है कि वे क्रोध के समय दूसरों को क्षमा कर देते हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: कोई बंदा नहीं है कि जो अपने क्रोध को पी जाये मगर यह कि ख़ुदा दुनिया और आख़ेरत में उसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि कर देगा।

  दूसरों को माफ़ कर देना क्षमा का चरम शिखर है क्योंकि माफ़ कर देने से शांति की सुरक्षा होती है और माफ़ कर देने वाला व्यक्ति उस मामले को अल्लाह के हवाले कर देता है कि इसका जो भी दंड होगा उसे ख़ुदा देगा परंतु दूसरे की ग़लती को इस प्रकार माफ़ कर देना कि ख़ुदा भी उसे माफ़ कर देगा और क़यामत में उसे दंडित नहीं करेगा यह क्षमा का चरम शिखर है।

  हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के ज्ञान के अथाह सागर के यह कुछ मोती है जो इंसान को हिदायत के लिए काफ़ी है।

🤲 *अल्लाह हुम्मा अज्जिल ले वलियेकल फ़रज…*

अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 29

हब्शा की दूसरी हिजरत

इसके बाद उन मुहाजिरों पर खास तौर पर और मुसलमानों पर आम तौर पर कुरैश का अन्याय और अत्याचार और बढ़ गया और उनके परिवार वालों ने उन्हें खूब सताया, क्योंकि कुरैश को उनके साथ नजाशी के सद्व्यवहार की जो खबर मिली थी, उस पर वे बहुत रुष्ट थे। मजबूर होकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा किराम रजि० को फिर हब्शा की हिजरत का मश्विरा दिया, लेकिन यह दूसरी हिजरत पहली हिजरत के मुक़ाबले में ज़्यादा परेशानियों और कठिनाइयों से भरी हुई थी, क्योंकि इस बार कुरैश पहले ही से चौकन्ना थे और ऐसी किसी कोशिश को विफल करने का संकल्प किए हुए थे, लेकिन मुसलमान उनसे कहीं ज़्यादा मुस्तैद साबित हुए और अल्लाह ने उनके लिए सफ़र आसान बना दिया, चुनांचे वे कुरैश की पकड़ में आने से पहले ही हब्श के बादशाह के पास पहुंच गए।

इस बार कुल 82 या 83 मर्दों ने हिजरत की। (हज़रत अम्मार की हिजरत में मतभेद है) और अठारह या उन्नीस औरतों ने । अल्लामा मंसूरपुरी ने पूरे विश्वास के साथ औरतों की तायदाद अठारह लिखी है। 3

हब्शा के मुहाजिरों के विरुद्ध कुरैश का षड्यंत्र

मुश्किों को बड़ा दुख था कि मुसलमान अपनी जान और अपना दीन बचाकर एक शांतिपूर्ण जगह पहुंच गए हैं, इसलिए उन्होंने अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को, जो गहरी सूझ-बूझ के मालिक थे और अभी मुसलमान नहीं हुए थे, दूत बनाकर एक अहम मुहिम पर भेजने को सोचा और इन दोनों को नजाशी और बितरीक़ों (दरबारियों) की सेवा में भेंट और उपहार देने के लिए हब्शा रवाना किया। इन दोनों ने पहले हब्शा पहुंचकर बितरीक़ों को उपहार दिए, फिर उन्हें अपनी वे दलीलें बताईं, जिनको आधार बनाकर वे मुसलमानों को हब्शा से निकलवाना चाहते थे। जब बितरीक़ों ने इसे मान लिया कि वे नजाशी

1. ज़ादुल मआद 1/24, 2/44, इब्ने हिशाम 1/364
जादुल मआद 1/24,

2 वही, रहमतुल लिल आलमीन

को मुसलमानों के निकाल देने का मश्विरा देंगे तो ये दोनों नजाशी के दरबार में हाज़िर हुए और भेंट उपहार देकर अपनी बात इस तरह रखी-

‘ऐ बादशाह ! आपके देश मे हमारे कुछ नासमझ नवजवान भाग आए हैं, उन्होंने अपनी क़ौम का धर्म छोड़ दिया है, लेकिन आपके दीन में भी दाखिल नहीं हुए हैं, बल्कि एक नया दीन गढ़ लिया है, जिसे न हम जानते हैं, न आप। हमें आपकी सेवा में उन्हीं के बारे में उनके मां-बाप, चचा और कुंबे-क़बीले के सरदारों ने भेजा है। अभिप्राय यह है कि आप इन्हें उनके पास वापस भेज दें, क्योंकि वे लोग उन पर सबसे ऊंची निगाह रखते हैं और उनकी कमज़ोरी और खराबी को बेहतर तौर पर समझते हैं।

जब ये दोनों अपना उद्देश्य पेश कर चुके तो बितरीक़ों ने कहा, ‘बादशाह सलामत ! ये दोनों ठीक ही कह रहे हैं। आप इन जवानों को इन दोनों के सुपुर्द कर दें। ये दोनों इन्हें इनकी क़ौम और इनके देश में वापस पहुंचा देंगे।’

लेकिन नजाशी ने सोचा कि इस विवाद को गहराई में जाकर समझना और उनके तमाम पहलुओं को सुनना-जानना ज़रूरी है। चुनांचे उसने मुसलमानों को बुला भेजा ।

मुसलमान यह तै करके उसके दरबार में आए कि हम सच ही बोलेंगे, चाहे नतीजा कुछ भी हो। जब मुसलमान आ गए तो नजाशी ने पूछा-

‘यह कौन-सा दीन है जिसकी बुनियाद पर तुम अपनी क़ौम से अलग हो गए? और मेरे धर्म में भी दाखिल नहीं हुए और न इन समुदायों ही में से किसी के धर्म को अपनाया ? “

मुसलमानों के नुमाइंदे हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब ने कहा-

‘ऐ बादशाह ! हम ऐसी क़ौम थे, जो अज्ञानता में पड़ी हुई थी। हम बुत पूजते थे, मुरदार खाते थे, कुकर्म करते थे, नातेदारों से नाते तोड़ते थे, पड़ोसियों से दुर्व्यवहार करते थे और हम में से ताक़तवर कमज़ोर को खा रहा था। हम इसी हालत में थे कि अल्लाह ने हम ही में से एक रसूल भेजा। उसका श्रेष्ठ वंश का होना, उसकी सच्चाई, अमानतदारी और पाकदामनी हमें पहले से मालूम थी। उसने हमें अल्लाह की ओर बुलाया और समझाया कि हम सिर्फ़ एक अल्लाह को मानें और उसी की इबादत करें और उसके सिवा जिन पत्थरों और बुतों को हमारे बाप-दादा पूजते थे, उन्हें छोड़ दें। उसने हमें सच बोलने, अमानत अदा करने, रिश्ते-नाते जोड़ने, पड़ोसी से अच्छा व्यवहार करने और कुकर्मों से और खून बहाने से बचने का हुक्म दिया और बेहयाई में पड़ने, झूठ बोलने, यतीम का माल खाने और पाकदामन औरतों पर झूठी तोहमत लगाने से मना किया। उसने

हमें यह भी हुक्म दिया कि हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें, उसके साथ किसी को शरीक न करें, उसने हमें नमाज़, रोज़ा और ज़कात का हुक्म दिया।’

इसी तरह हज़रत जाफ़र रज़ि० ने इस्लाम के काम गिनाए, फिर कहा-

‘हमने उस पैग़म्बर को सच्चा माना, उस पर ईमान लाए और उसके लाए हुए खुदाई दीन का पालन किया, उसकी पैरवी की, चुनांचे हमने सिर्फ़ अल्लाह की इबादत की, उसके साथ किसी को शरीक नहीं किया और जिन बातों को उस पैग़म्बर ने हराम बताया उन्हें हराम माना और जिनको हलाल बताया, उन्हें हलाल जाना। इस पर हमारी क़ौम हमसे बिगड़ गई, उसने हम पर ज़ुल्म व सितम किया और हमें हमारे दीन से फेरने के लिए फ़िले और सज़ाओं से दो चार किया, ताकि हम अल्लाह की इबादत छोड़कर बुतपरस्ती की ओर पलट जाएं और जिन गन्दी चीज़ों को हलाल समझते थे, उन्हें फिर हलाल समझने लगें। जब उन्होंने हम पर अत्याचार के पहाड़ तोड़ दिए, जीना दूभर कर दिया, ज़मीन तंग कर दी और हमारे और हमारे दीन के बीच रोक बनकर खड़े हो गए तो हमने आपके देश का रास्ता पकड़ा और दूसरों पर प्रमुखता देते हुए आपकी शरण में रहना पसन्द किया और यह आशा की कि ऐ बादशाह ! आपके पास हमारे साथ अन्याय न किया जाएगा।’ नजाशी ने कहा, ‘वह पैग़म्बर जो कुछ लाए हैं, उसमें से कुछ

तुम्हारे पास है ?’ हज़रत जाफ़र ने कहा, ‘हां!’ ने

नजाशी ने कहा, ‘तनिक मुझे भी पढ़ कर सुनाओ।’

हज़रत जाफ़र ने सूरः मरयम की शुरू की आयतें तिलावत फ़रमाई। नजाशी इतना रोया कि उसकी दाढ़ी भीग गई। नजाशी के तमाम पादरी भी हज़रत जाफ़र की तिलावत सुनकर इतना रोए कि उनकी किताबें भीग गईं।

फिर नजाशी ने कहा कि यह कलाम और वह कलाम जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम लेकर आए थे, दोनों एक ही शमादान (ज्योति पुंज) से निकले हुए हैं ।

इसके बाद नजाशी ने अम्र बिन आस और अब्दुल्लाह बिन रबीआ को सम्बोधित करके कहा कि तुम दोनों चले जाओ। मैं इन लोगों को तुम्हारे सुपुर्द नहीं कर सकता और न यहां इनके खिलाफ़ कोई चाल चली जा सकती है।

इस हुक्म पर वे दोनों वहां से निकल गए, लेकिन फिर अम्र बिन आस ने अब्दुल्लाह बिन रबीआ से कहा, ‘ख़ुदा की क़सम ! कल इनके बारे में ऐसी बातें लाऊंगा कि उनकी हरियाली की जड़ काट कर रख दूंगा।

अब्दुल्लाह बिन रबीआ ने कहा, नहीं, ऐसा न करना। इन लोगों ने अगरचे हमारे

खिलाफ़ कुछ किया है, लेकिन हैं बहरहाल हमारे अपने ही कुंबे-क़बीले के लोग मगर अम्र बिन आस अपनी राय पर अड़े रहे। 1

अगला दिन आया, तो अम्र बिन आस ने नजाशी से कहा, ऐ बादशाह ! ये लोग ईसा बिन मरयम के बारे में एक बड़ी बात कहते हैं।

इस पर नजाशी ने मुसलमानों को फिर बुला भेजा। वह पूछना चाहता था कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में मुसलमान क्या कहते हैं ?

इस बार मुसलमानों को घबराहट हुई, लेकिन उन्होंने तै किया कि सच ही बोलेंगे, नतीजा भले ही कुछ निकले। चुनांचे जब मुसलमान नजाशी के दरबार में हाज़िर हुए और उसने सवाल किया, तो हज़रत जाफ़र रज़ि० ने फ़रमाया-

‘हम ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में वही बात कहते हैं, जो हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए हैं, यानी हज़रत ईसा अल्लाह के बन्दे, उसके रसूल, उसकी रूह और उसका वह कलिमा हैं, जिसे अल्लाह ने कुंवारी पाकदामन हज़रत मरयम अलैहस्सलाम की ओर डाला था।’

इस पर नजाशी ने ज़मीन से एक तिनका उठाया और बोला, ‘खुदा की क़सम ! जो कुछ तुमने कहा है, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम उससे इस तिनके के बराबर भी बढ़कर न थे। इस पर बितरीक़ों ने ‘हुंह’ की आवाज़ लगाई। नजाशी ने कहा, ‘अगरचे तुम लोग ‘हुंह’ कहो ।’

इसके बाद नजाशी ने मुसलमानों से कहा, ‘जाओ, तुम लोग मेरे राज्य में सुख-शान्ति से रहो। जो तुम्हें गाली देगा, उस पर जुर्माना लगाया जाएगा। मुझे गवारा नहीं कि तुम में से मैं किसी आदमी को सताऊं और उसके बदले मुझे सोने का पहाड़ मिल जाए।’

इसके बाद उसने अपने दरबारियों को सम्बोधित करके कहा, ‘इन दोनों को इनके उपहार वापस कर दो। मुझे इनकी कोई ज़रूरत नहीं। ख़ुदा की क़सम ! अल्लाह ने जब मुझे मेरा देश वापस किया था, तो मुझसे कोई रिश्वत नहीं ली थी कि मैं उसकी राह में रिश्वत लूं। साथ ही अल्लाह ने मेरे बारे में लोगों की बात स्वीकार न की थी कि मैं अल्लाह के बारे में लोगों की बात मानूं ।’

हज़रत उम्मे सलमा रजि०, जिन्होंने इस घटना का उल्लेख किया है, कहती हैं, इसके बाद वे दोनों अपने भेंट-उपहार लिए बे-आबरू होकर वापस चले गये और हम नजाशी के पास एक अच्छे देश में एक अच्छे पड़ोसी की छत्र-छाया में ठहरे रहे ।

इब्ने हिशाम (संक्षिप्त किया गया) 1/334-338

यह इब्ने इस्हाक़ की रिवायत है। दूसरे सीरत के रचनाकारों का मत है कि नजाशी के दरबार में हज़रत अम्र बिन आस की हाज़िरी बद्र की लड़ाई के बाद हुई थी। कुछ लोगों ने दोनों में ताल-मेल पैदा करने की यह शक्ल निकाली है कि हज़रत अम्र बिन आस नजाशी के दरबार में मुसलमानों की वापसी के लिए दो बार गए थे, लेकिन बद्र की लड़ाई के बाद की हाज़िरी के ताल्लुक़ से हज़रत जाफ़र रज़ि० और नजाशी के बीच सवाल व जवाब का जो विवरण दिया जाता है, वह लगभग वही है जो इब्ने इस्हाक़ ने हब्शा की हिजरत के बाद की हाज़िरी के सिलसिले में बयान की हैं। फिर इन सवालों के विषयों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि नजाशी के पास यह मामला अभी पहली बार आया था, इसलिए प्रमुखता इस बात को प्राप्त है कि मुसलमानों को वापस लाने की कोशिश केवल एक बार हुई थी और वह हब्शा की हिजरत के बाद थी।