अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 24

विरोध का तीसरा तरीक़ा

पहलों की घटनाओं और कहानियों से क़ुरआन का मुक़ाबला करना और लोगों के कुरआन सुनने का अवसर न मिलने देना।

मुश्कि अपने उपरोक्त सन्देहों को फैलाने के अलावा हर संभव तरीक़े से लोगों को क़ुरआन सुनने से दूर रखने की कोशिश भी करते थे, चुनांचे वे लोगों को ऐसी जगहों से भगाते और जब देखते कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दावत व तब्लीग़ से उठा चाहते हैं या नमाज़ में कुरआन की तिलावत फ़रमा रहे हैं तो शोर करते और तालियां और सीटियां बजाते। अल्लाह फ़रमाता है, कुफ़्फ़ार ने कहा, यह कुरआन न सुनो और इसमें शोर मचाओ, ताकि तुम ग़ालिब रहो। इस स्थिति का नतीजा यह था कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनके मज्मों और महिफ़लों के अन्दर पहली बार कुरआन तिलावत करने का मौक़ा पांचवें सन् नुबूवत के आखिर में मिल सका, वह भी इस तरह कि आपने अचानक खड़े होकर क़ुरआन की तिलावत शुरू कर दी और पहले किसी को इसका अन्दाज़ा न हो सका।

1 नज बिन हारिस कुरैश के शैतानों में से एक शैतान था। वह हियरा गया। वहां बादशाहों की कहानियां और रुस्तम व स्फ़न्दयार के क़िस्से सीखे, फिर वापस आया, तो जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी जगह बैठकर अल्लाह की बातें करते और उसकी पकड़ से लोगों को डराते तो आपके बाद यह आदमी वहां पहुंच जाता और कहता कि अल्लाह की क़सम ! मुहम्मद सल्ल० की बातें मुझसे बेहतर नहीं। इसके बाद वह फ़ारस के बादशाहों और रुस्तम व स्फन्दयार की कहानियां सुनाता, फिर कहता, आखिर किस वजह से मुहम्मद की बात मुझसे बेहतर है ?1

इब्ने अब्बास की एक रिवायत है कि नज्र ने एक लौडी खरीदी थी, जब वह किसी आदमी के बारे में सुनता कि यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तरफ़ मायल है तो उस लौंडी के पास ले जाकर कहता कि इसे खिलाओ-पिलाओ और गाने सुनाओ। यह तुम्हारे लिए उससे बेहतर है जिसकी तरफ़ तुमको मुहम्मद बुलाते हैं। उसके बारे में अल्लाह का यह इर्शाद उतरा-

‘कुछ लोग ऐसे हैं जो खेल की बात खरीदते हैं, ताकि अल्लाह की राह से भटका दें। 2

अत्याचार और दमन चक्र

सन् 04 नुबूवत में इस्लामी दावत के सामने आने के बाद मुश्किों ने उसके खात्मे के लिए पिछली कार्रवाइयां धीरे-धीरे अंजाम दीं। महीनों इससे आगे क़दम नहीं बढ़ाया और ज़ुल्म व ज़्यादती शुरू नहीं की, लेकिन जब देखा ये तरीके इस्लामी दावत को नाकाम बनाने में असरदार साबित नहीं हो रहे हैं तो आपसी मश्विरे से तै किया कि मुसलमानों को सज़ाएं दे-देकर उनको उनके दीन से बाज़ रखा जाए। इसके बाद हर सरदार ने अपने क़बीले के मातहत लोगों को, जो मुसलमान हो गए थे, सज़ाएं देनी शुरू कीं और हर मालिक अपने ईमान लाने

सार इब्ने हिशाम 1/299, 300, 358, अद्-दुर्रुल मन्सूर, तफ्सीर सूरः लुकमान आयत 6/5/317

वाले गुलामों पर टूट पड़ा और यह बात तो बिल्कुल स्वाभाविक थी कि दुमछल्ले और गुंडे अपने सरदारों के पीछे दौड़ें और उनकी मर्जी और ख्वाहिशों के मुताबिक़ हरकत करें। चुनांचे मुसलमानों और खास तौर से कमज़ोरों पर ऐसी-ऐसी मुसीबतें तोड़ी गईं और उन्हें ऐसी-ऐसी सज़ाएं दी गईं, जिन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं और दिल फट जाता है। नीचे केवल एक झलक दी जा रही है—

अबू जहल जब किसी प्रतिष्ठित और शक्तिशाली आदमी के मुसलमान होने की खबर सुनता तो उसे बुरा-भला कहता, ज़लील व रुसवा करता और माल को बड़े घाटे से दोचार करने की धमकियां देता और अगर कोई कमज़ोर आदमी मुसलमान होता तो उसे खुद भी मारता और दूसरों को भी भड़का देता। 1

हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु का चचा उन्हें खजूर की चटाई में लपेट कर नीचे से धुवां देता 12

हज़रत मुसअब बिन उमैर रज़ियल्लाहु अन्हु की मां को उनके इस्लाम लाने की जानकारी हुई तो उनका दाना-पानी बन्द कर दिया और घर से निकाल दिया। बड़े लाड़-प्यार से पले थे, जब परेशानियों से दोचार हुए तो खाल इस तरह उधड़ गई, जैसे सांप केंचुली छोड़ता है।

सुहैब बिन सिनान रूमी रज़ियल्लाहु अन्हु को इतनी सजा दी जाती कि होश व हवास जाता रहता और उन्हें यह पता न चलता कि वह क्या बोल रहे हैं। 4

हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु उमैया बिन खल्फ़ जुमही के गुलाम थे । उमैया उनकी गरदन में रस्सी डालकर लड़कों के हवाले कर देता और वह उन्हें मक्का के पहाड़ों में घुमाते और खीचते फिरते, यहां तक कि गरदन पर रस्सी का निशान पड़ जाता फिर भी वह ‘अहद-अहद’ कहते रहते। खुद उमैया भी उन्हें बांधकर डंडे से मारता और चिलचिलाती धूप में जबरन बिठाए रखता, खाना-पानी भी न देता, बल्कि भूखा-प्यासा रखता और इन सबसे बढ़कर यह काम करता कि जब दोपहर की गर्मी बहुत ज़्यादा होती, तो मक्का के पथरीले कंकरों पर लिटाकर सीने पर भारी पत्थर रखवा देता, फिर कहता, अल्लाह की क़सम ! तू इसी तरह पड़ा रहेगा, यहां तक कि मर जाए या मुहम्मद के साथ कुपर

इब्ने हिशाम, 1/220 2. रहमतुल्लिल आलमीन 1/57 3. असदुल ग़ाबा 4/406, तलकीहुल फ्रहूम पृ० 60 अल-इसाबा 3, 4/255, इब्ने साद 3/248,

करे और लात व उज़्ज़ा की पूजा करे। हज़रत बिलाल रज़ि० इस हालत में भी कहते, अहद, अहद और फ़रमाते, अगर मुझे कोई ऐसा कलिमा मालूम होता, जो तुम्हें इससे भी ज़्यादा नागवार होता, तो मैं उसे कहता। एक दिन यही कार्रवाई जारी थी कि हज़रत अबूबक्र रज़ियल्लाहु अन्हु का गुज़र हुआ। उन्होंने हज़रत बिलाल रज़ि० को एक काले गुलाम के बदले और कहा जाता है कि दो सौ दिरहम (735 ग्राम चांदी) या दो सौ अस्सी दिरहम (एक किलो से ज्यादा चांदी) के बदले खरीद कर आज़ाद कर दिया। 1

हज़रत अम्मार बिन यासिर रज़ियल्लाहु अन्हु बनू मख्ज़ूम के गुलाम थे। उन्होंने और उनके मां-बाप ने इस्लाम कुबूल किया, तो उन पर क़ियामत टूट पड़ी। मुश्कि, जिनमें अबू जहल पेश-पेश था, कड़ी धूप के वक़्त, पथरीली ज़मीन पर ले जाकर उसके तपन से सज़ा देते। एक बार उन्हें इस तरह सज़ा दी जा रही थी कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का गुज़र हुआ। आपने फ़रमाया, आले यासिर! सब्र करना, तुम्हारा ठिकाना जन्नत है। आखिरकार यासिर जुल्म की ताब न लाकर वफ़ात पा गए और हज़रत सुमैया रज़ि० जो हजरत अम्मार रज़ि० की मां थीं, अबू जहल ने उनकी शर्मगाह में नेज़ा मारा और वह दम तोड़ गईं। यह इस्लाम में पहली शहीदा हैं। उनके बाप का नाम खय्यात था और यह अबू हुज़ैफ़ा बिन मुग़ीरह बिन अब्दुल्लाह की लौंडी थीं। बहुत बूढ़ी और कमज़ोर थीं।

हज़रत अम्मार रज़ि० पर सख्ती का सिलसिला जारी रहा। उन्हें कभी में धूप तपाया जाता, तो कभी उनके सीने पर पत्थर रख दिया जाता और कभी पानी में डुबोया जाता, यहां तक कि वह होश व हवास खो बैठते। उनसे मुश्कि कहते थे कि जब तक तुम मुहम्मद को गाली न दोगे या लात व उज़्ज़ा के बारे में कलिमा खैर न कहोगे, हम तुम्हें न छोड़ेंगे। मजबूर होकर उन्होंने मुश्रिकों की बात मान ली, फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास रोते हुए और माज़रत करते हुए आए, इस पर यह आयत उतरी-

‘जिसने अल्लाह पर ईमान लाने के बाद कुपर किया, उस पर अल्लाह का गुस्सा और अज़ाब ज़बरदस्त है), लेकिन जिसे मजबूर किया जाए और उसका दिल अल्लाह पर मुतमइन हो (उस पर कोई पकड़ नही) 2

1. इब्ने हिशाम 1/317, 318, तलकीहुल फ्रहम, पृ० 11, तफ्सीर इब्ने कसीर, सूरः नम्ल

2. इब्ने हिशाम 1/319, 320, तबक़ात इब्ने साद 3/248, 249, इब्ने कसीर और अद्दुर्रुल मंसूर, तफ्सीर सूरः नल, आयत 106,

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