मुआविया की करतूत सुन्नी किताबों से।

मुआविया की करतूत सुन्नी किताबों से।
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अब्दुल रहमान बीन अब्दे रब्बे काबा ने अब्दुल्लाह बीन उमरो बीन आस से कहा

“तुम्हारे चाचा का बेटा मुआविया हमें ना हक़ माल लुटने और ना हक़ क़त्ल करने का हुक्म देता है जब की अल्लाह ने तो ये फ़रमाया है की ऐ इमान वालो एक दूसरे का माल ना हक़ तरीके से ना खाओ”

सही मुस्लिम जिल्द 3, हदीस नं 4776, सफा नं 713 से 715
क़ुरान ऐ करीम में अल्लाह ने ना हक़ क़त्ल करने वालो की सजा जहन्नम फरमायी हैं।

जिसे अल्लाह जहन्नमी केहता हैं, मुल्ला उसे सहाबी और जन्नती केहता हैं।

आप फैसला करे की अल्लाह का कलाम सही है, या मुल्ला का फ़तवा।

अकरमा बयान करते है की

“मैं अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हु के साथ मुआविया के पास था, मुआविया ने एक रकात नमाज़ पढ़ी तो इब्ने अब्बास ने फ़रमाया की इस गधे से पुछो ये तरीका इसने कहा से सीखा।”

किताब शरह ऐ मुआनियुल आसार अल मारूफ,
तहवी शरीफ जिल्द 1, हदीस न. 1678, सफा न. 828

मुआविया ने साद इब्ने अबी वकास को हुक्म दिया की वो मौला अली अलैहिस्सलाम को गालिया दे। नऊज़ुबिल्लाह मीन ज़ालिक।

सही मुस्लिम – जिल्द 4, हदीस No 6220, सफा No 559

अगर एहलेबैत से मुहब्बत करते हो तो उनको गालिया दिलवाने वालो का साथ छोड़ना होगा।

“मुआविया के दौर ऐ हुकूमत में आल ऐ मारवान में से एक शख्श ने हज़रत सहल बीन साद रदियल्लाहो अन्हु से कहा की वो मौला अली अलैहिसालाम को गाली दे।

जब उन्हों ने इंकार कर दिया तो कहा की ये कह दो की अबू तुराब पर अल्लाह की लानत”

नउज़ोबिल्लाह मीन ज़ालिक ! ! ! ! !

सही मुस्लिम जिल्द 4 , हदीस नं 6229, सफा नं 565

खुदा जाने उन लोगो की अक़्लो पर कौन से पत्थऱ पड़े थे की मौला से इस कदर दुश्मनी थी, लोगो को मज़बूर किया जाता था की वो मौला पर लानत करे और जब अकीदतमंद इंकार करते थे तो उन्हें क़त्ल कर दिया जाता था जैसा हाजर बीन आदी और साथिओ के साथ किया गया।

रसूलल्लाह सल्ललाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “अल्लाह, मुआविया का कभी पेट ना भरे”

सही मुस्लिम हदीस न. 6628
और रसूलल्लाह सल्ललाहो अलैहि वसल्लम का ये फरमान हमेशा की तरह सच साबित हुवा और मुआविया का कभी पेट न भरा।

तारीख इबने कसीर हिस्सा 8, सफा न. 455
मुआविया को रसूलल्लाह सल्ललाहो अलैहि वसल्लम की हदीस सुन कर अच्छा ना लगा।

इस पर हज़रत अबादा बिन सामित रदियल्लो अन्हु ने कहा “हम तो रसूलल्लाह सल्ललाहो अलैहि वसल्लम की हदीस ज़रुर बयान करेंगे चाहे मुआविया ना पसंद करे या मुआविया की नाक खाक आलूद हो। “

सही मुस्लिम – जिल्द 3, हदीस No 4061, सफा No ३२३

रसूलअल्लाह सल्ललाहो अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “अम्मार इब्ने यासिर रदियल्लाहो अन्हु को एक बागी जमात क़त्ल करेगी, अम्मार उन्हें जन्नत की तरफ बुलाएंगे और वो अम्मार को जहन्नम की तरफ बुलाएंगे”

सही बुखारी जिल्द न. 3, हदीस न 2812 सफ़ा न. 227
सिर्फ इसी एक हदीस को बंदा अपना जहन साफ कर के पढ़ ले तो पता चल जायेगा की मुआविया जहन्नमी था।

जंग ऐ सिफ़्फ़ीन में मुआविया ने हुकूमत की लालच में जंग कर के अम्मार बिन यासीर को क़त्ल किया, और ये साबित कर दिया की अम्मार बिन यासिर को क़त्ल करने वाला ये मुआविया का गिरोह जहन्नम की तरफ बुलाने वाला था।

ये मेरा या किसी मुल्ला का फरमान नहीं पर हुज़ूर सल्ललाहो अलैहि वसल्लम का फरमान है।

हम सब ने ये तो सुना और जाना है की यज़ीद लानती शराबी था पर शराब पीना कहा से सिखा ये मैं आज बताता हूँ।

इमाम अहमद इब्ने हम्बल लिखते है की अपने दौर ऐ हुकूमत में मुआविया शराब पीता था।

जब हम कहते है तो हम को राफ़जी, गुमराह, क़ाफ़िर, सहाबा का गुस्ताख़, ख़ारजी जैसे लफ़्ज़ों से नवाजा जाता है, वही मोलवी अब इब्ने हम्बल के बारे में क्या कहेगा???!!

सहाबी वो हैं जो ईमान की हालत मैं मौत पाये, ये कैसा सहाबी जो शराब पीता था और इमान में मरा???!!!

अगर अब भी मुआविया को इमान में माना तो मतलब शराब को हराम नहीं समझा।

हवाला

मुसनद अहमद बीन हम्बल, जिल्द 10, हदीस न. 23329, सफ़ा न. 661
सईद बीन ज़ुबैर रिवायत करते है की

“मैं अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास के साथ अराफात में था

और उन्हों ने कहा “मैं लोगो को तलबिया पढ़ते क्यों नहीं सुन रहा हु?”

मैंने कहा “ये लोग मुआविया से डरे हुवे है”

तो इब्ने अब्बास अपने खेमे से बहार आये और कहा “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैक! और कहा मुआविया ने सिर्फ अली से नफरत में सुन्नत को छोड़ दिया है”

Sunan Nisai Jild No. 4, Hadis No 3009, Safa No 628
मुआविया खुद को हज़रत उमर से भी ज्यादा खिलाफत का हक़दार समझता था, मुआविया ने अब्दुल्लाह इब्ने उमर की तरफ इशारा कर के कहा “मैं उसके बाप से भी ज्यादा खिलाफत का हक़दार हूँ”।

सही बुखारी जिल्द न. 4, हदीस न. 4108, सफा न. 259
मैं लिख के देता हूँ की तुम्हे आज तक किसी भी अत्तारी बरेलवी ने ये रिवायत नहीं बताई होगी। इस लिए की अब तक तो आप ने सुना था की मुआविया मौला अली अलैहिसलाम का गुस्ताख़ था, पर इस हदीस से साबित होता है की उसने हज़रत उमर को भी नहीं छोड़ा।

उन्ही के बेटे की तरफ इशारा कर के कहता है “वो अपना सर उठाये, मैं उसके बाप से भी ज्यादा खिलाफत का हक़दार हूँ।”

अगर शिया हज़रात हज़रत उमर को कुछ कहे तो वो काफिर हो जाते है और मुआविया कुछ भी कहे, रहेगा वो रदिअल्लह ही। वाह मुसलमान वाह।

इमाम अब्दुल रज़्ज़ाक के सामने जब मुआविया का जिक्र हुवा तो आप ने फ़रमाया

“हमारी मेहफ़िलों को अबू सुफियान के बेटे के जिक्र से गन्दा ना करो”

मीज़ान अल एतदाल जिल्द 4, सफा 343
सायरे आलम अल नुबाला जिल्द 9, सफा 580
किताब अल जुआफा जिल्द 1, सफा 859
जो बन्दे सोच रहे है की इमाम अब्दुल रज़्ज़ाक कौन है तो ये कोई चंदा खोर मौलवी नहीं बता पायेगा, उस शक्श को चाहिए की मुसन्नफ़ अब्दुल रज़्ज़ाक पढ़े जो की हदीस का मजमुआ है तब पता चलेगा की कितने बड़े एहले सुन्नत के मुहद्दिस थे।

मुआविया ने अपने दौर ए हुकूमत में खुद भी मौला अली अलैहिसलाम को गालिया दी है और अपने हुक्मरानो से भी मौला अली अलैहिसलाम को गालिया दिलवाई है।
तारीख इ तबरी जिल्द 4, हिस्सा 1, सफा 82
खिलाफत व मुलुकियत सफा 174
फ़तहुल बारी जिल्द 7, सफा 88
अल मफ़हीम जिल्द 1, सफा 231
ये एक हकीकत है और इसका एक नहीं सुन्नी मोतबर किताब और सियासित्ता के अनेक हवाले मौजूद है फिर भी इस हकीकत से मुँह फेर लेना आलीमो की हाथ धर्मी मक्कारी और अपनी दुकान चलाने के लिए आदत बन चुकी है।

अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास ने फ़रमाया की

“मौला अली अलैहिसलाम को गाली देना अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को गाली देना है।”

तारीख ऐ मसूदी जिल्द 1, हिस्सा 2, सफा न. 359
जाबिर बिन अब्दुल हमीद जो की सियासित्ता की हदीस के रिजाल लिखने वालो में से है मुआविया को ऐलानिया तौर पर गालिया देते थे।

तहज़ीब अल तहज़ीब जिल्द 1, सफा 297-298
जब हम कुछ कहते है तो फ़ौरन राफ्ज़ी और काफिर के फतवे ठोक देते है, अब इन मोलविओ से पूछना चाहता हु, जाबिर बिन अब्दुल हामिद साहब के बारे में क्या कहेंगे???

उम्मुल मोमिनीन बीबी उम्मे सल्मा सलामुल्ला अलैहा से रिवायत है, फरमाती है की
“मौला अली अलैहिसलाम को गाली देना दर असल रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को गाली देना है।”

कंज़ुल उम्माल जिल्द 7, हदीस न 36460, सफा न. 74

याद रहे की ये वाक़िया मुआविया लानतुल्लाह की दौर ए हुकूमत का है और उस दौर में लोग मुआविया की तक़लीद में इतने अंधे हो चुके थे की उन्हें ये भी नहीं पता था की वो मौला को गाली दे कर कितना बड़ा गुनाह कर रहे थे।

मुआविया और बनु उमैया के हुक्मरानो को कब तक बचाते रहोगे, खुद उम्मुल मोमिनीन गवाही दे रही है की मौला अली पर शब्बो सितम हुवे है।

मुआविया की नमाज़ ऐ जनाज़ा पढ़ाने वाला यज़ीद मलऊन था।

तारीख इब्न इ कसीर जिल्द 8, सफा न. 188
इस पर इमाम शाफ़ई का कॉल है की “यज़ीद अपने बाप की वफ़ात से क़ब्ल (पहले) दमिश्क में दाखिल हुवा और आप ने (मुआविया) ने उसे (यज़ीद को) वसी मुक़र्रर किया”

और यही कॉल इब्ने इश्हाक और दीगर मुअर्रिख़ीन का है।

मौला अली अलैहिस्सलाम का क़ौल बनु उमैया के लिए।

मौला अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया की दो सबसे बड़े फासिक और फ़ाजिर कबीले बनु उमैया और बनु मुग़ीरा है।

और बनु उमैया के मान ने वाले भी फासिक होंगे चाहे वो बड़े से बड़ा मौलवी हो या मुफ़्ती हो।

अल मुस्तदरक लील हाकिम जिल्द 3, सफा न 273, हदीस न. 3343
मुआविया के नाम का मतलब !

एहले सुन्नत के मशहूर आलिम अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती अलैहि रेहमा ने अपनी किताब में लिखा की

“मुआविया नाम के माने उस कुत्ते के है जो दुसरो पर भोंकता है”

अर-रहीकुल मख़्तूम पार्ट 17



नुबूवत व दावत

का मक्की दौर

हम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैग़म्बराना ज़िंदगी को दो भागों में बांट सकते हैं, जो एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न, स्पष्ट और विख्यात थे। वे दोनों भाग ये हैं-

1. मक्की ज़िंदगी—-लगभग 13 साल,

2. मदनी ज़िंदगी-दस साल

फिर इनमें से हर भाग कई मरहलों पर सम्मिलित है और ये मरहले भी अपनी विशेषताओं की दृष्टि से एक दूसरे से भिन्न और स्पष्ट हैं। इसका अन्दाज़ा आपकी पैग़म्बराना ज़िंदगी के दोनों भागों में पेश आने वाले अलग-अलग हालात का गहराई से जायज़ा लेने के बाद हो सकता है।

मक्की ज़िंदगी तीन महरलों पर सम्मिलित थी-

1. छिप-छिपाकर दावत देने का मरहला—तीन वर्ष

2. मक्का वासियों में खुल्लम खुल्ला प्रचार-प्रसार का मरहला-नुबूवत के चौथे साल के शुरू से मदीना की हिजरत तक।

3. मक्का के बाहर इस्लाम की दावत की लोकप्रियता और फैलाव का मरहला-नुबूवत के दसवें साल के शुरू से यह मरहला मदनी दौर को भी शामिल है और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़िंदगी के आखिर तक फैला हुआ है।

मदनी ज़िंदगी के मरहलों का विवरण अपनी जगह पर आ रहा है।

नुबूवत व रिसालत की छांव में

हिरा की गुफा में

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्र जब चालीस वर्ष के क़रीब हो चली और इस बीच आपकी अब तक की ज़िन्दगी ने क़ौम से आपकी सोच और विचार की दूरी बहुत बढ़ा दी थी, तो आपको ठंहाई बहुत प्रिय रहने लगी, चुनांचे आप सत्तू और पानी लेकर मक्का से कोई दो मील दूर हिरा पहाड़ी की एक गुफा में जा रहते—यह एक छोटी-सी गुफा है, जिसकी लम्बाई चार गज़ और चौड़ाई पौने दो गज़ है। यह नीचे की ओर गहरी नहीं है, बल्कि एक छोटे-से रास्ते की बग़ल में ऊपर की चट्टानों के आपस में मिलने से एक कोतल की शक्ल लिए हुए है।

आप पूरे रमज़ान उस गुफा में ठहरते, अल्लाह की इबादत करते, सृष्टि और उसकी अनेक वस्तुओं पर चिन्तन-मनन करते। आपको अपनी क़ौम के लचर, पोच, शिर्क भरे अक़ीदे (विश्वास) और अंधविश्वासी विचारों पर तनिक भर इत्मीनान न था, लेकिन आपके सामने कोई स्पष्ट रास्ता, निश्चित तरीक़ा और अतियों से हटी हुई कोई ऐसी राह न थी, जिस पर आप इत्मीनान और सुकून के साथ आगे बढ़ सकते।

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह एकान्तप्रियता भी वास्तव में अल्लाह की तद्बीर का एक हिस्सा थी कि धरती की व्यस्तताओं, ज़िंदगी के शोर और लोगों के छोटे-छोटे दुख-दर्द की दुनिया से आपका कटना उस ‘बड़े काम’ की तैयारी के लिए पलटने का बिन्दु हो, जिसका दुनिया को इन्तिज़ार था ।

और आप बड़ी अमानत का बोझ उठाने, धरती के रहने वालों को दिशा देने और इतिहास के रुख को मोड़ने के लिए तैयार हो जाएं। अल्लाह ने रिसालत की ज़िम्मेदारी डालने से तीन साल पहले आपके लिए एकान्तप्रियता तै कर दी। आप एकान्त में एक माह तक सृष्टि की स्वच्छन्द आत्मा के साथ यात्रा करते रहते और इस वजूद के पीछे छिपे हुए अनदेखे के भीतर चिन्तन करते, ताकि जब अल्लाह का हुक्म हो तो उस अनदेखे के साथ ताल-मेल बिठाने के लिए मुस्तैद रहें

1. असल घटना के लिए देखिए सहीह बुखारी, भाग 3, इब्ने हिशाम 1/235, 236, और तफ़्सीर, सुन्नत व सीरत की दूसरी किताबें। कहा जाता है कि अब्दुल मुत्तलिल पहले

जिब्रील वा लाते हैं

जब आपकी उम्र चालीस वर्ष हो गई— और यही परिपक्वता की उम्र है  तो आप महसूस करने लगे, जैसे मक्का में एक एक पत्थर आपको सलाम कर रहा है, साथ ही आपको सच्चे सपने भी नज़र आने लगे। आप जो भी सपना देखते, वह सुबह के उजालं की तरह प्रकट होता । इस दशा पर छः माह की मुद्दत बीत गई— जो नुबूवत की मुद्दत का 46वां हिस्सा है और इसके बाद जब हिरा में एकान्तवास का तीसरा वर्ष आया  हज़रत जिबील अलैहिस्सलाम कुरआन मजीद कुछ आयतें लेकर आपके पास तशरीफ़ लाए।

ALI, THE MAGNIFICENT part 27

THE FINAL PILGRIMAGE OF THE HOLY PROPHET AND THE LAST DECLARATION AT GHADIR-E-KHUM

It was in the month of Zilhajj 10 A.H. when the Holy Prophet becoming intuitively aware of his approaching end. decided to make a farewell Pilgrimage to Mecca. As the time for the Pilgrimage approached, he started to make preparations for the journey. Hazrat Ali who was in Yemen was asked to complete his work and join the Prophet in Mecca.

The Prophet reached Mecca on Sunday the 4th of Zilhajj 10 A.H. Soon after his arrival. Ali, who hastened back from Yemen ahead of his men, joined the Prophet, who was very glad to see him and affectionately embracing him asked what vow he had taken for the pilgrimage. Ali replied, “I have taken upon me a vow to perform the same pilgrimage as the Prophet, whatever that might be, and I have brought thirty-four camels for the sacrifice”. The Prophet joyfully exclaimed, “Allah-o-Akbar’, (Great is the Lord), and said he had brought sixty-six. He added, that in all the rites of the Pilgrimage, as well as in the sacrifice, he (Ali) would be his partner. Thus Ali also performed the Greater Pilgrimage along with the Prophet.

Before completing the rites of the Pilgrimage, the Holy Prophet addressed the assembled multitude from the top. of the Jabal-ul-Arafat in words which yet live in the hearts of Muslims. As the various ceremonies were to be treated as models for future guidance, the Prophet observed rigorously each rite, whether in compliance with revelations or in accordance with the patriarchal usage. Thus,

when the hundred camels were to be sacrificed, they were offered by him and Ali conjointly. A repast, prepared from the meat of the sacrificed camels was served, the Prophet sat down with no other but Ali to partake of it. The ceremonies of the pilgrimage ended with shaving of the heads and paring of the nails after the sacrifice of animals. The pilgrim’s garb was then removed and Ali, who rode on the Prophet’s Duldul, proclaimed that the restrictions of Pilgrimage were over.