
उमूरे ख़ाना दारी और अज़वाजी ज़िन्दगी में
आपके बुज़ुर्गों ने अपनी बीबीयों को जिन हुदूद में रखा हुआ था उन्हीं हुदूद में आपने उम्मुल फ़ज़ल को भी रखा आपने इसके मुतालिक़ परवाह ना की कि आप की बीवी एक शहनशाहे वक़्त की बेटी है। चुनान्चे उम्मुल फ़ज़ल के होते हुए आपने हज़रत अम्मार यासिर की नस्ल से एक मोहतरम ख़ातून के साथ अक़्द भी फ़रमाया और क़ुदरत को नस्ले इमामत इसी ख़ातून से बाक़ी रखना मन्ज़ूर थी। यही इमाम नक़ी (अ.स.) की माँ हुईं। उम्मुल फ़ज़ल ने इसकी शिकायत अपने बाप के पास लिख कर भेजी , मामून के दिल के लिये भी यह कुछ कम तकलीफ़ देह अमर न था , मगर अब उसे अपने किए को निभाना था इस लिये उम्मुल फ़ज़ल को जवाब में लिखा कि मैंने तुम्हारा अक़्द अबू जाफ़र के साथ इस लिये नहीं किया कि उन पर किसी हलाले ख़ुदा को हराम करूं। ख़बरदार ! मुझसे अब इस क़िस्म की शिकायत न करना। यह जवाब दे कर हक़ीक़त में उसने अपनी खि़फ़्फ़त मिटाई है। हमारे सामने इस की नज़ीरें मौजूद हैं कि अगर मज़हबे हैसीयत से कोई बाएहतेराम ख़ातून हुई हैं तो इस की ज़िन्दगी में किसी दूसरी बीवी से निकाह नहीं किया गया , जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स अ व व ) के लिये जनाबे ख़दीजा (अ.स.) और हज़रत अली ए मुर्तुज़ा (अ.स.) के लिये जनाबे फ़ात्मा ज़हरा (अ.स.) मगर शंहशाहे दुनियां की बेटी को यह इम्तेआज़े दुनियां सिर्फ़ इस लिये कि वह एक बादशाह की बेटी हैं। इस्लाम की उस रूह के खि़लाफ़ था जिसके आले मोहम्मद (अ.स.) मुहाफ़िज़ थे। इस लिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने इसके खि़लाफ़ तर्ज़े अमल इख़्तेआर करना अपना फ़रीज़ा समझा। (सवानेह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जिल्द 2 पृष्ठ 11)
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) और तैयुल अर्ज़
इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अगर चे मदीना में क़याम फ़रमाते थे लेकिन फ़राएज़ की वुस्अत ने आपको मदीना ही के लिये महदूद नहीं रखा था। आप मदीना में रह कर अतराफ़े आलम के अक़ीदत मन्दों की ख़बर गीरी फ़रमाते थे यह ज़रूरी नहीं कि जिसके साथ करम गुस्तरी की जाए। वह आपके कवाएफ़ व हालात से भी आगाह हो। अक़ीदे का ताअल्लुक़ दिल की गहराई से है कि ज़मीनों आसमान ही नहीं सारी काएनात उनके ताबे होती है। उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं पड़ती कि वह किसी सफ़र में तय मराहिल के लिये ज़मीन अपने क़दमों से नापा करें , उनके लिये यही बस है कि जब और जहां चाहें चश्में ज़दन में पहुँच जाएं और यह अक़लन मोहाल भी नहीं है। ऐसे ख़ासाने ख़ुदा के लिये इस क़िस्म के वाक़ियात क़ुरान मजीद में भी मिलते हैं। आसिफ़ बिन ख़्यावसी जनाबे सुलेमान (अ.स.) के लिए उलमा ने इस क़िस्म के वाक़िये का हवाला दिया है। उनमें से एक वाक़िया है कि आप मदीना मुनव्वरा से रवाना हो कर शाम पहुँचे , एक शख़्स को उस मुक़ाम पर इबादत में मसरूफ़ व मशग़ूल पाया जिस जगह इमाम हुसैन (अ.स.) का सरे मुबारक लटकाया गया था , आपने इससे कहा मेरे हमराह चलो वह रवाना हुआ अभी चन्द क़दम भी न चला था कि कूफ़े की मस्जिद में जा पहुँचा , वहीं नमाज़ अदा करने के बाद जो रवानगी हुई तो सिर्फ़ चन्द मिन्टों में मदीना मुनव्वरा जा पहुँचे और ज़्यारत व नमाज़ से फ़राग़त की गई , फिर वहां से चल कर चन्द लम्हों में मक्का ए मोअज़्ज़मा रसीदगी हो गई , तवाफ़ व दीगर इबादत से फ़राग़त के बाद आपने चश्मे ज़दन में उसे शाम की मस्जिद में पहुँचा दिया और ख़ुद नज़रों से ओझल हो कर मदीना ए मुनव्वरा जा पहुँचे , फिर जब दूसरा साल आया तो आप बदस्तूरे शाम की मस्जिद में तशरीफ़ ले गए और उस आबिद से कहा मेरे हम राह चलो चुनान्चे वह चल पड़ा , आपने चन्द लम्हों में उसे साले गुज़िश्ताा की तरह तमाम मुक़द्दस मक़ामात की ज़्यारत करा दी। पहले ही साल के वाक़िये से वह शख़्स बेइन्तेहा मुत्तअस्सिर था ही कि दूसरे साल भी ऐसा ही वाक़िया हो गया। अबकी मरतबा उसने मस्जिदे शाम वापस पहुँचते ही उनका दामन थाम लिया और क़सम दे कर पूछा कि फ़रमाईये आप इस करामात के मालिक कौन हैं ? आपने इरशाद फ़रमाया कि मैं मोहम्मद बिन अली इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) हूँ। इसने बड़ी अक़ीदत और ताज़ीम व तकरीम के मरासिम अदा किए। आपके वापस तशरीफ़ ले जाने के बाद यह ख़बर बिजली की तरह फैल गई। जब वालिये शाम मोहम्मद अब्दुल मलिक को इसकी इत्तेला मिली और यह भी पता चला कि लोग इस वाक़िये से इन्तेहाई मुताअस्सिर हो गए हैं तो आपने उस आबिद पर मुदयी नबूअत होने का इल्ज़ाम लगा कर उसे क़ैद करा दिया और फिर शाम से मुन्तक़िल कर के ईराक़ भिजवा दिया। उसने वाली को क़ैद ख़ाने से एक ख़त भेजा जिसमें लिखा की मैं बे ख़ता हूँ मुझे रिहा किया जाए , तो उसने ख़त की पुश्त पर लिखा कि जो शख़्स तूझे शाम से कूफ़े और कूफ़े से मदीने और वहां से मक्का और फिर वहां से शाम पहुँचा सकता है। अपनी रिहाई में उसी की तरफ़ रूजू कर। इस जवाब के दूसरे दिन यह शख़्स मुकम्मल सख़्ती के बवजूद सख़्त तरीन पहरे के होते हुए क़ैद ख़ाने से ग़ाएब हो गया। अली बिन ख़ालिद रावी का बयान है कि जब मैं क़ैद ख़ाने के फाटक पर पहुँचा तो देखा की तमाम ज़िम्मे दारान हैरान व परेशान हैं और कुछ पता नहीं चलता कि आबिदे शामी ज़मीन में समा गया या आसमान पर उठा लिया गया। अल्लामा मुफ़ीद (अ. र.) लिखते हैं कि इस वाक़िये से अली बिन ख़ालिद जो दूसरे मज़हब का पैरो था , इमामिया मसलक़ का मोतक़िद हो गया।(शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 146, आलामु वुरा पृष्ठ 731, इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 481 )

