चौदह सितारे हज़रत इमाम अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.स) पार्ट- 5

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के साथ उम्मे फ़ज़ल का अक़्द और ख़़ुत्बा ए निकाह

इस अज़ीमुश्शान मनाज़रा में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की शान दार कामयाबी ने मामून को आपका और गिरवीदा बना दिया , और उसकी मंज़िले एतराफ़ में इन्तेहाई बुलन्दी पैदा हो गई , इसके हर क़िस्म के हुस्ने ज़न में यक़ीन की रूह दौड़ गई।

उलमा लिखते हैं कि ‘‘ मामून ने इसके बाद फ़ौरन ही अपनी दिली मुराद को अमली जामा पहनाने का तहय्या कर लिया और ज़रा भी ताख़ीर मुनासिब न समझते हुए इसी जलसे में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने ख़ुतबा और निकाह पढ़ा और यह तक़रीब पूरी कामयाबी के साथ अन्जाम पज़ीर हुई , मामून ने ख़ुशी में बड़ी फ़य्याज़ी से काम लिया , लाखों रूपए ख़ैरो ख़ैरात में तक़सीम किए गए और तमाम रेआया को इनामात व अतीया के साथ माला माल किया गया। ’’(सफ़र नामा हज व ज़्यारत पृष्ठ 434 प्रकाशित पेशावर 1972 0 )

अल्लामा शेख़ मुफ़ीद और अल्लामा शिब्लंजी लिखते हैं कि हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह पढ़ा वह यह था। ‘‘ अलहम्दो लिल्लाह अक़रार अब्नाहताह व आलाल्लाहा अख़्लासन लौहदा नैहतेही अलख़. ’’ और जो महर किया वह महरे फ़ातमी मुब्लिग़ पाँच सौ ( 500) दिरहम था।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 477 नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मालूम होना चाहिये इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने जो ख़ुत्बा ए निकाह अपनी ज़बाने मुबारक पर जारी किया था वह वही है जो इस वक़्त भी निकाह के मौक़े पर पढ़ा जाता है। मेरी नज़र में इस ख़ुत्बे के होते हुए दूसरे ख़ुत्बे को पढ़ना मुनासिब नहीं है।

अल्लामा शिबलन्जी का बयान है कि हर क़िस्म की ख़ुश्बू की बास में अक़दे निकाह हुआ , और हाज़ेरीन की हलवे से तवाज़ो की गई।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146, सवाएक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 123 शवाहेदुन नबूवत पृष्ठ 204, रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 17, इरशाद पृष्ठ 477, कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 116 )

अल्लामा शेख़ मुफ़ीद तहरीर फ़रमाते हैं कि शादी के बाद शबे उरूस की सुबह को जहां और लोग हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की खि़दमत में मुबारक बाद अदा करने के लिए आए , एक शख़्स मोहम्मद बिन अली हाशमी भी पहुँचे। उनका बयान है कि मुझे दफ़तन सख़्त प्यास महसूस हुई , मैं अभी पासे अदब में पानी मांगने न पाया था कि आपने हुक्म दिया और आबे खुनक आ गया , थोड़ी देर बाद फिर ऐसा ही वाक़ेया दर पेश हुआ। मैं हज़रत के इस इल्मे ज़माएर से बहुत मुताअस्सिर हुआ , और मुझे यक़ीन हो गया कि इमामिया आपके जुमला उलूम में माहिर होने का जो अक़ीदा रखते हैं बिल्कुल दुरूस्त है।(इरशाद पृष्ठ 481 )


उम्मुल फ़ज़ल की रूख़सती , इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कर मदीने को वापसी और हज़रत के इख़्लाक़ो औसाफ़ आदातो ख़साएल

इस शादी का पस मंज़र जो भी हो लेकिन मामून ने निहायत अछूते अन्दाज़ से अपनी लख़्ते जिगर उम्मुल फ़ज़ल को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के हबलए निकाह में दे दिया। तक़रीबन एक साल तक इमाम (अ.स.) बग़दाद में मुक़ीम रहे , मामून ने दौराने क़याम बग़दाद में आपकी इज़्ज़तो तौक़ीर में कोई कमी नहीं की। ‘‘ इला अन तवज्जो बेज़ैवजता उम्मुल फ़ज़ल इलल्ल मदीनता अलमुशरफ़ता ’’ यहां तक आप अपनी ज़ौजा उम्मुल फ़ज़ल समेत मदीना ए मुशर्रे़फ़ा तशरीफ़ ले आए।(नूरूल अबसार पृष्ठ 146 ) मामून ने बहुत ही इन्तेज़ाम और एहतिमाम के साथ उम्मुल फ़ज़ल को हज़रत के साथ रूख़सत कर दिया। अल्लामा शेख़ मुफ़ीद , अल्लामा तबरसी , अल्लामा शिब्लन्जी , अल्लामा जामी अलैहिम अलरहमता तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम (अ.स.) अपनी एहलिया को लिए हुए मदीना तशरीफ़ लिये जा रहे थे , आप के हमराह बहुत से हज़रात भी थे। चलते चलते शाम के वक़्त आप वारिदे कुफ़ा हुए। वहां पहुँच कर आपने जनाबे मसीब के मकान पर क़याम फ़रमाया और नमाज़े मग़रिब पढ़ने के लिये एक निहायत क़दीम मस्जिद में तशरीफ़ ले गए। आपने वज़ू के लिये पानी तलब फ़रमाया , पानी आने पर आप एक ऐसे दरख़्त के थाले में वज़ू करने लगे जो बिल्कुल ख़ुश्क था और मुद्दतों से सर सब्ज़ी और शादाबी से महरूम था। इमाम (अ.स.) ने उस जगह वज़ू किया , फिर आप नमाज़े मग़रिब पढ़ कर वहां से वापस तशरीफ़ लाए और अपने प्रोग्राम के मुताबिक़ वहां से रवाना हो गए।

इमाम (अ.स.) तो तशरीफ़ ले गए लेकिन एक अज़ीम निशानी छोड़ गए और वह यह थी कि जिस ख़ुश्क दरख़्त के थाले में आपने वज़ू फ़रमाया था वह सर सब्ज़ शादाब हो गया , और रात ही भर में तैय्यार फलों से लद गया। लोगों ने उसे देख कर बे इंतेहा ताज्जुब किया।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 479, आलामु वुरा पृष्ठ 205, नूरूल अबसार पृष्ठ 147, शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 205 ) कूफ़े से रवाना हो कर तय मराहेल व क़ता मनाज़िल करते हुए आप मदीने मुनव्वरा पहुँचे। वहां पहुँच कर आप अपने फ़राएज़े मन्सबी की अदाएगी में मुनहमिक़ व मशग़ूल हो गए। पन्दो नसाए , तबलीग़ व हिदायत के अलावा आपने इख़्लाक़ का अमली दर्स देना शुरू कर दिया। ख़ानदानी तुर्रए इम्तेयाज़ के बामोजिब हर एक से झुक कर मिलना , ज़रूरत मन्दों की हाजत रवाई करना मसावात और सादगी को हर हाल में पेश नज़र रखना। ग़ुर्बा की पोशीदा तौर पर ख़बर लेना। दोस्त के अलावा दुश्मनों तक से अच्छा सुलूक करते रहना। मेहमानों की ख़ातिर दारी में इन्हेमाक और इल्मी व मज़हबी प्यासों के लिये फ़ैज़ के चश्मे जारी रखना , आपकी सीरते ज़िन्दगी का नुमाया पहलू था। अहले दुनियां जो आपकी बुलन्दीये नफ़्स का ज़्यादा अन्दाज़ा न रखते थे उन्हें यह तस्वर ज़रूर होता था कि एक कमसिन बच्चे का अज़ीमुश्शान मुसलमान सलतनत के शहनशाह का दामाद हो जाना , यक़ीनन इसके चाल ढाल , तौर तरीक़े को बदल देगा और उसकी ज़िन्दगी दूसरे सांचे में ढल जायेगी। हक़ीक़त में यह एक बहुत बड़ा मक़सद हो सकता है जो मामून की कोता निगाह के सामने भी था। बनी उमय्या या बनी अब्बास के बादशाहों को आले रसूल (स अ व व ) की ज़ात से इतला इख़्तेलाफ़ न था , जिनका उनकी सिफ़ात से था। वह हमेशा इसके दरपए रहते थे कि बुलन्दी इख़्लाक़ और मेराजे इन्सानियत का वह मरकज़ जो मदीना ए मुनव्वरा में क़ायम है और जो सलतनत के माद्दी इक़तिदार के मुक़ाबले में एक मिसाली रूहानियत का मरकज़ बना हुआ है , यह किसी तरह टूट जाए। इसी के लिये घबरा घबरा कर वह मुख़्तलीफ़ तदबीरें करते रहे। इमाम हुसैन (अ.स.) से बैअत तलब करना , इसी की एक शक्ल थी और फिर इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाना इसी का दूसरा तरीक़ा था। फ़क़त ज़ाहेरी शक्ल सूरत में एक का अन्दाज़ा मआन्दाना और दूसरा तरीक़ा इरादत मन्दी के रूप् में था। मगर असल हक़ीक़त दोनों सूरतों की एक थी , जिस तरह इमाम हुसैन (अ.स.) ने बैअत न की , तो वह शहीद कर डाले गए , इसी तरह इमाम रज़ा (अ.स.) वली अहद होने के बवजूद हुकूमत के मादीम क़ासिद के साथ साथ न चले तो आपको ज़हर के ज़रिए से हमेशा के लिये ख़ामोश कर दिया गया , अब मामून के नुक़ता ए नज़र से यह मौक़ा इन्तेहाई क़ीमती था कि इमाम रज़ा (अ.स.) का जा नशीन एक आठ नौ बरस का बच्चा है जो तीन चार बरस पहले ही बाप से छुड़ा लिया जा चुका था। हुकूमते वक़्त की सियसी सूझ बूझ कह रही थी कि इस बच्चे को अपने तरीक़े पर लाना निहायती आसान है और इसके बाद वह मरकज़ जो हुकूमते वक़्त के खि़लाफ़ साकिन और ख़ामोश मगर इन्तेहाई ख़तरनाक क़ाएम है हमेशा के लिये ख़त्म हो जायेगा।

मामून रशीद अब्बासी , इमाम रज़ा (अ.स.) के वली अहद की मोहिम में अपनी नाकामी को मायूसी का सबब नहीं तसव्वुर करता था , इस लिये कि इमाम रज़ा (अ.स.) की ज़िन्दगी एक उसूल पर क़ाएम रह चुकी थी , इमसें तबदीली नहीं हुई तो यह ज़रूरी नहीं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) जो आठ नौ बरस के सिन से क़सरे हुकूमत में नशोनुमा पा कर बढे वह भी बिल्कुल अपने बुज़ुर्गों के उसूले ज़िन्दगी पर बरक़रार हैं।

सिवाए उन लोगों के जो इन मख़सूस अफ़राद के ख़ुदा दाद कमालात को जानते थे इस वक़्त का हर शख़्स यक़ीनन मामून ही का हम ख़्याल होगा , मगर दुनियां को हैरत हो गई , जब यह देखा कि नौ बरस का बच्चा जैसे शहंशाहे इस्लाम का दामाद बना दिया गया। इस उमर में अपने ख़ानदानी रख रखाओ और उसूल का इन्तेहाई पा बन्द है कि वह शादी के बाद महले शाही में क़याम से इन्कार कर देता है , और इस वक़्त भी जब बग़दाद में क़याम रहता है तो एक अलाहदा मकान किराए पर ले कर इसमें क़याम फ़रमाते हैं। इसी से भी इमाम (अ.स.) की मुस्तहकम क़ूव्वते इरादी का अन्दाज़ा किया जा सकता है। उमूमन माली एतबार से लड़के वाले जो कुछ भी बड़ा दर्जा रखते होते हैं तो वह यह पसन्द करते हैं कि जहां वह रहे वहीं दामाद भी रहे। इस घर में न सही कम अज़ कम इसी शहर में इसका क़याम रहे , मगर इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) ने शादी के एक साल बाद ही मामून को हिजाज़ वापस जाने की इजाज़त पर मजबूर कर दिया। यक़ीनन यह अमर एक चाहने वाले बाप और मामून ऐसे ब इक़तिदार के लिये इन्तेहाई ना गवार था। मगर उसे लड़की की जुदाई गवारा करना पड़ी और इमाम मय उम्मुल फ़ज़ल के मदीना तशरीफ़ ले गए।

मदीना तशरीफ़ लाने के बाद डयोढ़ी का वही आलम रहा जो इसके पहले था , न पहरे दार न कोई ख़ास रोक टोक , न तुज़ुक व एहतिशाम , न औक़ाते मुलाक़ात , न मुलाक़ातियों के साथ बरताओ में कोई तफ़रीक़ ज़्यादा तर नश्शित मस्जिदे नबवी में रहती थी जहाँ मुसलमान हज़रत के वाज़ व नसीहत से फ़ाएदा उठाते थे। रावीयाने हदीस , इख़बार व अहादीस दरियाफ़्त करते थे। तालिबे इल्म मसाएल पूछते थे , साफ़ ज़ाहिर था कि जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ही का जां नशीन और इमाम रज़ा (अ.स.) का फ़रज़न्द है जो इसी मसनदे इल्म पर बैठा हुआ हिदायत का काम अन्जाम दे रहा है।

Shab e Meraj Ka Waqia || By. Dr. Syed Shah Shamimuddin Ahmad Munemi.

■ Mi’raj is the Miracles of the Prophet ﷺ:

Allama Ibn Qayyim explains that one of the miracles of the Prophet Muhammad ﷺ was that Allah ﷻ suddenly called him for the divine meeting (Mi’raj) without prior notice. This was so the Prophet ﷺ would not experience the anxiety of waiting, unlike Prophet Musa (Moses) عليه السلام, who waited for 40 nights for his meeting with Allah ﷻ.

Additionally, the Prophet ﷺ traveled the distance of two months in a single night while riding on Buraq, a miraculous creature. In comparison, Prophet Sulaiman عليه السلام covered a similar distance in an entire day and night, even though he traveled with the help of the wind. Traveling by wind is relatively easier since it naturally carries things. However, the Prophet ﷺ completing this journey on a creature like Buraq was a far greater miracle.

(Tafsir Ibn Al-Qayyim)

● FJ 28.1.25