चौदह सितारे हज़रत इमाम अबु जाफ़र हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.स) पार्ट- 4

हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से उलमाए इस्लाम का मनाज़ेरा और अब्बासी हासिदों की शिकस्ते फ़ाश

उलमाए इस्लाम का बयान है कि बनी अब्बास को मामून की तरफ़ इमाम रज़ा (अ.स.) को वली अहद बनाया जाना ही ना क़ाबिले बर्दाश्त था। इमाम रजा़ (अ.स.) की वफ़ात से एक हद तक उन्हें इतमीनान हासिल हुआ था और उन्होंने मामून से अपने हस्ब दिलख़्वाह तसलीम कर लिया गया। इसके अलावा इमाम रज़ा (अ.स.) की वली अहदी के ज़माने में अब्बासीयों का मख़सूस शुमार यानी काला लिबास तर्क हो कर जो सब्ज़ लिबास का रवाज हो रहा था उसे मन्सूख़ करके फिर स्याह लिबास की पाबन्दी आएद कर दी गई ताकि बनी अब्बास के रवायाते क़दीम मख़सूस रहे। यह सब बातें अब्बासीयों के यक़ीन दिला रहीं थी कि वह मामून पर पूरा क़ाबू पा चुके हैं , मगर अब मामून का यह इरादा कि वह इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को अपना दामाद बनाऐ। उन लोगों के लिये तशवीश का बाएस बना और इस हद तक बना कि वह अपने दिली रूझान को दिल में न रख सके और एक वफ़द की शक्ल में मामून के पास आ कर अपने जज़बात का इज़हार कर दिया। उन्होंने साफ़ साफ़ कहा कि इमाम रज़ा (अ.स.) के साथ जो आपने तरीख़ा इख़्तेयार किया , वही हम को ना पसन्द था। मगर वह ख़ैर कम अज़ कम औसाफ़ व कमालात के लेहाज़ से ना क़ाबिले इज़्ज़त भी समझे जा सकते थे , मगर यह उन के बेटे मोहम्मद तो अभी बिल्कुल कम सिन हैं। एक बच्चे को बड़े बड़े उलमा , मुवज़्ज़ेज़ीन पर तरजीह देना और इस क़दर इसकी इज़्ज़त करना हर गिज़ ख़लीफ़ा के लिए ज़ेबा नहीं है फिर उम्मे हबीबा का निकाह जो इमाम रज़ा के साथ किया गया था , उससे हम को क्या फ़ायदा पहुँचा जो उम्मे अफ़ज़ल का निकाह मोहम्मद बिन अली के साथ किया जा रहा है।

मामून ने तमाम तक़रीर का यह जवाब दिया कि मोहम्मद कमसिन ज़रूर हैं मगर मैंने ख़ूब अन्दाज़ा कर लिया है , औसाफ़ और कमालात में वह अपने बाप के पूरे जानशीन हैं और आलमे इस्लाम के बडे़ बड़े उलमा जिनका तुम हवाला दे रहे हो वह इल्म में उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते। अगर तुम चाहो तो इम्तेहान ले कर देख लो फिर तुम्हे भी फ़ैसले से मुत्तफ़िक़ होना पडे़गा।

यह सिर्फ़ मुन्सेफ़ाना जवाब ही नहीं , बल्कि एक तरह का चैलेन्ज था जिस पर मजबूरन उन लोगों को मनाज़िरा की दावत मंज़ूर करनी पड़ी हालांकि ख़ुद मामून तमाम सलातीन बनी अब्बास में यह ख़ुसूसीयत रखता है कि मोर्वेख़ीन इसके लिये यह अल्फ़ाज़ लिख देते हैं। ‘‘ काना यादा मन कबारल फ़ुक़ाहा ’’ यानी इनका शुमार बड़े बड़े फ़क़ीहों में है। इस लिये इसका फ़ैसला ख़ुद कुछ कम वक़त न रखता था , मगर इन लोगों ने इस पर इक़्तेफ़ा नहीं की बल्कि बग़दाद के सब से बड़े आालिम यहया बिने अक्सम को इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) से बहस के लिये मुन्तख़ब किया। मामून ने एक अज़ीमुश्शान जलसा इस मनाज़िरे के लिये मुनअक़िद किया और आम ऐलान करा दिया। हर शख़्स इस अजीब और बज़ाहिर ग़ैर मुतावाज़िन मुक़ाबले के देखने का मुश्ताक़ हो गया। जिस में एक तरफ़ एक नौ बरस का बच्चा था और दूसरी तरफ़ एक आमूदाकार आरै शोरा ए अफ़ाक़ क़ाज़िउल कुज़्ज़ाज़त। इस का नतीजा था कि हर तरफ़ से ख़लाएक़ का हुजूम हो गया।

मुवर्रेख़ीन का बयान है कि अरकाने दौलत और मोअज़्ज़ेज़ीन के अलावा इस जलसे में नव सौ कुर्सियां फ़क़त उलमा व फ़ुज़ला के लिये मख़सूस थीं और इसमें कोई ताज्जुब भी नहीं इस लिये कि यह ज़माना अब्बासी सलतनत के शबाब और बिल ख़ुसूस इल्मी तरक़्क़ी के ऐतबार से ज़री दौर था और बग़दाद दारूल सलतनत था जहां तमाम अतराफ़े मुख़्तलिफ़ उलूम और फ़ुनून के माहेरीन खिंच कर जमा हो गए थे। इस ऐतबार से यह तादात किसी मुबालग़े पर मुबनी नहीं होती।

मामून ने हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के लिये अपने पहलू में मसनद बिछवाई थी और हज़रत के सामने यहया बिने अक़सम के लिये बैठने की जगह थी। हर तरफ़ कामिल सन्नाटा था मजमा हमातन चश्म व गोश बना हुआ गुफ़्तुगू शुरू होने के वक़्त का मुन्तज़िर ही था िकइस ख़ामोशी को यहिया के इस सवाल ने तोड़ दिया जो उसने मामून की तरफ़ मुख़ातिब हो कर किया था आप इजाज़त देते हैं मैं आपसे कुछ दरयाफ़्त करूँ।

हज़रत ने फ़रमाया ऐ याहिया ऐ याहिया तुम जो पूछना चाहते हो पूछ सकते हो। यहिया ने कहा यह फ़रमाईये कि हालते एहराम में अगर कोई शख़्स शिकार करे तो इसका क्या हुक्म है ? इस सवाल से अन्दाज़ा होता है कि यहिया हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की इल्मी पाबन्दी से बिल्कुल वाक़िफ़ न था। वह अपने ग़ुरूरे इल्म और जिहालत से यह समझता था कि यह कमसिन साहब ज़ादे तो हैं ही रोज़मर्रा के रोज़े नमाज़ के मसाएल से वाक़िफ़ हों तो हों। मगर हज वग़ैरा के अहकाम और हालते अहराम में जिन चीज़ों की मुमानियत है उनके कफ़्फ़ारों से भला कहां वाक़िफ़ होंगे।

इमाम (अ.स.) ने इसके जवाब में इस तरह सवाल के गोशों की अलग अलग तहलील फ़रमाई जिससे बग़ैर कोई जवाब अस्ल मसले का दिए हुए आपके इल्म की गहराईयों का यहिया और तमाम अहले महफ़िल को अन्दाज़ा हो गया। यहिया ख़ुद भी अपने को सुबुक पाने लगा और तमाम मजमे को भी इसका सुबुक होना महसूस होने लगा। आपने जवाब में फ़रमाया: यहिया तुमहारा सवाल बिल्कुल मुबहम है और मोहमल है। सवाल के ज़ैल में यह देखने की ज़रूरत है कि शिकार हिल में था कि हरम में। शिकार करने वाला मसले से वाक़िफ़ था या ना वाक़िफ़ था। इसने अमदन जानवर को मार डाला या धोखे से क़त्ल हो गया। या वह शख़्स आज़ाद था या ग़ुलाम , कमसिन था या बालिग़ , पहली मरतबा ऐसा किया था या इसके पहले भी ऐसा कर चुका था। शिकार परिन्द का था या कोई और , छोटा था या बड़ा। वह अपने फ़ेल पर इसरार रखता है या पशेमान है। रात को या पोशीदा तरीक़े पर उसने यह शिकार किया या दिन दहाड़े और एलानियाँ। एहराम उमरे का था या हज का। जब तक यह तमाम तफ़सीलात न बताए जाएं इस मसले का कोई मोअय्यन हुक्म नहीं बताया जा सकता।

यहिया कितना ही नाक़िस क्यों न होता। बहरहाल फ़िक़ही मसाएल पर कुछ उसकी नज़र थी। इन कसीउत्ताए दाद शिक़ों के पैदा ही करने से ख़ूब समझ गया कि उनका मुक़ाबेला मेरे लिए आसान नहीं है उसके चेहरे पर ऐसी शिकस्तगी के आसार पैदा हुए जिनका तमाम देखने वालों ने अन्दाज़ा कर लिया उसकी ज़बान ख़ामोश थी और वह कुछ जवाब न देता था।

मामून उसकी कैफ़ियत का सही अन्दाज़ा कर के उससे कुछ कहना बेकार समझा और हज़रत से अर्ज़ किया कि फिर आप तमाम शिकों के एहकाम बयान फ़रमा दीजिए ताकि हम सब को इस्तेफ़ादे का मौक़ा मिल सके। इमाम (अ.स.) ने तफ़सील के साथ तमाम सूरतो से जुदागाना जो एहकाम थे फ़रमा दिये। आपने फ़रमाया कि ‘‘ अगर एहराम बांधने के बाद ‘‘ हिल ’’ में शिकार करे और वह शिकार परिन्दा हो और बड़ा भी हो तो उस पर कफ़्फ़ारा एक बकरी है और अगर ऐसा शिकार हरम में किया है तो दो बकरियां हैं और अगर किसी छोटे परिन्दे को हिल में शिकार किया है तो दुम्बे का एक बच्चा जो अपनी मां का दूध छोड़ चुका हो। कफ़्फ़ारा देगा , और अगर हरम में शिकार किया हो तो उस परिन्दे की क़ीमत और एक दुम्बा कफ़्फ़ारा देगा और अगर वह शिकार चौपाया हो तो उसकी कई क़िस्में हैं। अगर वह वहशी गधा है तो एक गाय और अगर शुतुरमुर्ग़ है तो एक ऊंट और अगर हिरन है तो एक बकरी कफ़्फ़ारा देगा। यह कफ़्फ़ारा तो जब है कि हिल में शिकार किया हो लेकिन अगर हरम में किया हो तो यही कफ़्फ़ारे दुगने देने होंगे और उन जानवरों को जिन्हें कफ़्फ़ारे में देगा , अगर एहराम उमरे का था तो ख़ाना ए काबा तक पहुँचायेगा और मक्के में क़ुर्बानी करेगा और अहराम हज का था तो मिना में क़ुर्बानी करेगा और इन कफ़्फ़ारों में आलिम व जाहिल दोनों बराबर हैं और इरादे से शिकार करने में कफ़्फ़ारा देने के अलावा गुनाहगार भी होगा। हां भूले से शिकार करने में गुनाह नहीं होगा। और आज़ाद अपना कफ़्फ़ारा ख़ुद देगा और ग़ुलाम का कफ़्फ़ारा उसका मालिक देगा और छोटे बच्चे पर कोई कफ़्फारा नहीं है और बालिग़ पर कफ़्फ़ारा देना वाजिब है और जो शख़्स अपने इस फ़ेल पर नादिम हो आख़ेरत के अज़ाब से बच जायेगा लेकिन अगर इस फ़ेल पर इसरार करेगा तो आख़ेरत में भी इस पर अज़ाब होगा। ’’

यह तफ़सीलात सुन कर यहिया हक्का बक्का रह गया और सारे मजमे से अहसन्त अहसन्त की आवाज़ बुलन्द होने लगी। मामून को भी क़द थी कि वह यहिया की रूसवाई को इन्तेहाई दर्जे तक पहुँचा दे। उसने इमाम से अर्ज़ की कि अगर मुनासिब मालूम हो तो आप यहिया से सवाल फ़रमाएं। हज़रत ने एख़लाकन यहिया से दरियाफ़्त फ़रमाया कि क्या मैं भी तुम से कुछ पूछ सकता हूँ। यहिया अपने मुताअल्लिक़ किसी धोखे में मुब्तिला न था। उसने कहा ‘‘ कि हुज़ूर दरियाफ़्त फ़रमायें ! अगर मुझे मालूम होगा तो अर्ज़ करूगां वरना खुद भी हुज़ूर से मालूम कर लूगां ’’ हज़रत ने सवाल किया।

उस शख़्स के बारे में क्या कहते हो जिसने सुबह को एक औरत की तरफ़ नज़र की वह उस पर हराम थी। दिन चढ़े हलाल हो गई , ग़ुरूबे आफ़ताब पर फिर हराम हो गई। असर के वक़्त फिर हलाल हो गई , आधी रात को हराम हो गई सुबह के वक़्त हलाल हो गई। बताओ एक ही दिन में इतनी दफ़ा वह औरत उस शख़्स पर किस तरह हराम व हलाल होती रही। इमाम (अ.स.) की ज़बाने मोजिज़बयान से इस सवाल को सुन कर क़ाज़िउल क़ुज़्ज़ात यहिया बिन अक़सम मबहूत हो गए और जवाब न दे सके , बिल आखि़र इन्तेहाई आजज़ी के साथ कहा फ़रज़न्दे रसूल आप ही इसकी वज़ाहत फ़रमा दें और मसले को हल कर दें।

इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया , सुनो ! वह औरत किसी की लौंड़ी थी। उसकी तरफ़ सुबह के वक़्त एक अजनबी शख़्स ने नज़र की तो वह उसके लिये हराम थी , दिन चढ़े उसने वह लौड़ी ख़रीद ली वह हलाल हो गई। जौहर के वक़्त उसको आज़ाद कर दिया वह हराम हो गई , असर के वक़्त उसने निकाह कर लिया फिर हलाल हो गई , मग़रिब के वक़्त उससे ज़हार किया तो फिर हराम हो गई , इशा के वक़्त ज़हार का कफ़्फ़ारा दे दिया , तो फिर हलाल हो गई , आधी रात को उस शख़्स ने उसको तलाक़े रजई दी , जिससे फिर हराम हो गई और सुबह के वक़्त उस तलाक़ से रूजू कर लिया ‘’ हलाल हो गई ’’

मसले का हल सुन कर सिर्फ़ यहिया ही नहीं बल्कि सारा मजमा हैरान रह गया और सब में मर्सरत की लहर दौड़ गई। मामून को अपनी बात के ऊँचा रहने की ख़ुशी थी , उसने मजमे की तरफ़ मुख़ातिब हो कर कहा मैं न कहता था कि यह वह घराना है जो क़ुदरत की तरफ़ से मालिक क़रार दिया गया है। यहां के बच्चों का भी कोई मुक़ाबला नहीं कर सकता। मजमे में जोशो ख़रोश था सब ने यही एक ज़बान हो कर कहा कि बेशक जो आपकी राय है वह बिल्कुल ठीक है और यक़ीनन अबू जाफ़र मोहम्मद बिने अली (अ.स.) का कोई मिस्ल नहीं है। (सवाऐक़े मोहर्रेक़ा पृष्ठ 122 रवाहिल मुस्तफ़ा 191 नूरूल अबसार पृष्ठ 142 शरा इरशाद 478 से 479, तारीख़े आइम्मा 485, सवानह मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पृष्ठ 6)