
Hazrat Ali ka Zaboor aur Bible main zikr | حضرت علی کا زبور اور بائبل می…





इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) अपने आबाओ अजदाद की तरह , इमाम मन्सूस , मासूम , इमामे ज़माना और अफ़ज़ले काएनात थे। आप जुमला सिफ़ाते हुस्ना में यगाना रोज़गार और मुम्ताज़ थे। अल्लामा बिन तल्हा शाफ़ेई लिखते हैं , ‘‘ वइन कान सग़ीर अलसन फ़हू कबीर अल क़दर , रफ़ीह अलज़कर ’’ इमाम (अ.स.) अगरचे तमाम मासूमीन में सब से कम सिन और छोटे थे लेकिन आपकी क़दरो मन्ज़ेलत आपके आबाओ अजदाद की तरह निहायत ही अज़ीम थी और आपका बुलन्द तज़किरा बर सरे नोक ज़बान था।(मतालेबुस सूऊल पृष्ठ 195 )
अल्लामा हुसैन वाएज़ काशफ़ी लिखते हैं कि ‘‘ मुक़ामे वै बिसयार बुलन्द अस्त ’’ आपकी मन्ज़िलत और आपकी हस्ती नेहायत ही बुलन्द थी।(रौज़तुल शोहदा पृष्ठ 438 )
अल्लामा ख़विन्द शाह लिखते हैं ‘‘ दर कमाल फ़ज़ल व इल्म और हिकमत इमाम जवाद बा मरतबाबूदह कि ’’ हेच कसरा अज़ आज़मे सादात आन मरतबा ना बूदा ’’ इल्म व फ़ज़ल , अदब व हिकमत में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) को वह कमाल हासिल था जो किसी को भी नसीब ना था।(रौज़तुल पृष्ठ जिल्द 3 पृष्ठ 16 )
अल्लामा शिबलन्जी लिखते हैं कि इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) कम सिनी के बावजूद फ़ज़ाएल से भर पूर थे ‘‘ व मुनक़बये कसीरा ’’ और आपके मनाक़िब व मदायह बेशुमार हैं।(नूरूल अबसार पृष्ठ 145 )
अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि ‘‘ कान क़द बलग़ फ़ी कमाल अल अक़ल वल फ़ज़ल वा आलेम व अल हकम वा अलदाब व रिफ़अते माज़लतेही तम यसा व फ़ीहा अहद मन ज़ी अलसिन मन अलसादात वग़ैर हिम ’’ आप कमाले अक़ल और फ़ज़ल और इल्म व हिक्म व आदाब व बुलन्दी मनज़िलत में इन मदारिज पर फ़ाएज़ थे जिन पर आपके सिन और उमर के सादात और ग़ैर सादात में से कोई भी फ़ायज़ न था।(अलाम अल वरा पृष्ठ 202 ) अल्लामा शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) आपकी बुलन्दी ए मन्ज़ेलत का ज़िक्र करते हुए तहरीर फ़रमाते हैं। ‘‘ मशाययख़ अहले ज़बान बा उमसावी दरफ़ज़ल न बुलन्द ’’ िकइस अहद में दुनियां के बड़े बड़े लोग फ़ज़ाएल व कमालात में आपकी बराबरी नहीं कर सकते थे।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 474 )
उलमा का बयान है कि इमाम अल मुत्तक़ीन हज़रज इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) बा तारीख़ 10 रजबुल मुरज्जब 195 हिजरी में बा मुताबिक़ 811 ई 0 यौमे जुमा बामुक़ाम मदीना मुनव्वरा में मोतावल्लिद हुय ऐ।(रौज़ातुल अल पृष्ठ जिल्द 2 पृष्ठ 16 व शवाहेदुन नबूअत पृष्ठ 204 व अनवारे नोमानी पृष्ठ 127 )
अल्लामा यगाना जनाबे शेख़ मुफ़ीद (र. अ.) फ़रमाते हैं , चूंकि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) के कोई औलाद आपकी विलादत से क़ब्ल न थी इस लिये लोग ताना ज़नी करते हुए कहते थे कि शियों के इमाम मुन क़ता उल नस्ल हैं। यह सुन कर हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया कि औलाद का होना ख़ुदा की इनाएत से मुताअल्लिक़ है उसे मुझे साहेबे औलाद किया है और अंक़रीब मेरे यहां मस्नदे इमामत का वारिस पैदा होगा। चुनांचे आपकी विलादत बा साअदत हुई।(इरशाद मुफ़ीद पृष्ठ 473 )
अल्लामा तबरीसी लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) ने इरशाद फ़रमाया था कि मेरे यहां जो बच्चा अंक़रीब पैदा होगा वह अज़ीम बरकतों का हामिल होगा।(अलामुल वरा पृष्ठ 200 ) वाक़ए विलादत के मुताअल्लिक़ लिखा है कि इमाम रज़ा (अ.स.) की बहन हकीमा ख़ातून फ़रमाती हैं कि एक दिन मेरे भाई ने मुझे बुला कर कहा कि आज तुम मेरे घर में क़याम करो क्यों कि ख़ैज़रान के बतन से आज रात को ख़ुदा मुझे एक फ़रज़न्द अता फ़रमायेगा। मैंने ख़ुशी के साथ इस हुक्म की तामील की। जब रात आई तो हमसाया और चन्द औरतें भी बुलाई गईं , निस्फ़ शब से ज़्यादा गुज़रने पर यका यक वाज़ेह हमल के आसार नमूदार हुए। यह हाल देख कर मैं ख़ैज़रान को हुजरे में ले गई और मैंने चिराग़ रौशन कर दिया। थोड़ी देर में इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) पैदा हुए। मैंने देखा कि वह मख़तून और नाफ़ बुरीदा हैं। विलादत के बाद मैंने नहलाने के लिये तश्त में बैठाया। इस वक़्त जो चिराग़ रौशन था गुल हो गया मगर फिर भी उस हुजरे में रौशनी ब दस्तूर रही और इतनी रौशनी रही कि मैंने बच्चे को आसानी से नहला दिया। थोड़ी देर में मेरे भाई इमाम रज़ा (अ.स.) भी वहां तशरीफ़ ले आए। मैंने निहायत उजलत के साथ साहब ज़ादे को कपड़े में लपेट कर हज़रत की आग़ोश में दे दिया। आपने सर और आंखों पर बोसा दे कर फिर मुझे वापस कर दिया। दो दिन तक इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) की आंखें बन्द रहीं हैं तीसरे दिन जब आंखें खुली तो आपने सब से पहले आसमान की तरफ़ नज़र की , फिर दाहिने बाऐ देख कर कलमा ए शहादतैन ज़बान पर जारी किया। मैं यह देख कर सख़्त मुतअजिब हुई और मैंने सारा वाक़ेया अपने भाई से बयान किया। आपने फ़रमाया , ताअज्जुब न करो , यह मेरा फ़रज़न्द हुज्जते ख़ुदा और वसीए रसूल (स अ व व ) हादी है। इस से जो अजाएबात ज़हूर पज़ीर हों , उनमें ताअज्जुब क्या। मोहम्मद बिन अली नाक़ील हैं , हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी (अ.स.) के दोनों कंधों के दरमियान इसी तरह मोहरे इमामत थी जिस तरह दीगर आइम्मा (अ.स.) के दोनों कंधो के दरमियान मोहरें हुआ करती थीं।(मुनाक़िब)